आश्रम, मेरी आत्मा के आश्रय का

मैं इस समय हूँ आत्म विस्मृति के युग में,
कोई है जो बना रहा है अपरिचित
मुझे स्वयं से!

कोई खींच रहा है किसी अंधेरी गुफा में,
रहस्यों से भरी,
आश्चर्यों से भरे क्षणों को जैसे कोई मेरी झोली में
डालने के लिए तत्पर है!

मेरे होंठों पर है एक जिज्ञासा,
एक ताप!
मैं समय से कर रही हूँ उपहास,

मैं चाहती हूँ इस रहस्य की सुरंग का कोई तो छोर आए,
मैं चाहती हूँ,
मेरी देह से परे जो चल रहा है,
उससे कोई मुझे परिचित कराए!

स्वयं के विस्तार के क्षणों की प्रतीक्षा में,
जैसे बैठी हुई हूँ,
सितारों के बीच, आकाशगंगा में!

मैं भोर के तारे सी अकेली,
अपना कोई आश्रम सा कर रही स्थापित!
आश्रम, मेरी आत्मा के आश्रय का,
देह का पता तो जानते ही हैं सब!
मगर देह के परिचय से कब परिचय युगों तक रहा है,
मात्र देह के स्पर्श से कब कौन पहुंचा है उस आश्रम में!

– सोनाली मिश्र

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