अब जब मेरा विज़न सच हो चुका, मैं ककनूज़ हो गई

पता नहीं क्यों और कब मेरे ज़हन में यह बैठ गया था
कि मैं बिलकुल भी बिलकुल आज़ाद नहीं हूँ
कि मेरे दिल में से रिसता है लहू बेबसी का
हालाँकि मैं सब की चहेती थी
शायद यह मेरी collective unconscious का हिस्सा था
Some archetypal images inherited from my ancestors

कि जब मैंने बनाई अपनी पहली ओयल पेंटिंग
तो उस में एक औरत थी
नीले आसमान के नीले रंग की साड़ी में लिपटी
साड़ी का नीला मिश्रित हो रहा था आसमान के नीले में
उसका सिर आसमान में जो था
और पाँव धरती पर…

पाँवों में बेड़ियाँ थी लोहे की
हाथों में हथकड़ियाँ
दिल में एक बड़ा सारा चाक़ू घुसा हुआ
वैसा जैसा माँस काटने वाले उपयोग करते हैं
चाक़ू पकड़े हुए हाथ अदृश्य
दिल में से टप-टप टपकता लहू
नीली साड़ी पे गिरते हुए छोटे-बड़े लाल धब्बे

फिर बाद में समझ आया
वो एक विज़न था जो मेरे हाथों एक पेंटिंग में उतरा था
आकाश के जितनी मेरी आकृति
फिर भी मैं बेबस थी
अपने ही हाथों
अपने मोह ममता प्यार और फ़र्ज़ के हाथों

हाथ बदलते रहे
शायद इसीलिए अदृश्य थे पेंटिंग में
ख़ून रिसता रहा दिल से
इतना रिसा के बदरंग हो गया
लाल रंग कम से कमतर होता गया
इतना कि कैन्सरस हो गए रेड सेल्ज़

पर अगर अब मैंने बनाई एक और पेंटिंग
तो मैं बनाऊँगी वो हाथ जो दृश्य में होंगे
हज़ारों सहयोगी, उत्साहजनक हाथ
मेरे पाँव के नीचे की ज़मीन को पकड़ कर रखने वाले
मेरा सिर आसमान तक ऊँचा करने वाले हाथ

मुझे तोड़ना है collective unconscious का चक्रव्यूह
मुझे रचनी है एक सशक्त औरत की तस्वीर
आज़ाद औरत की तस्वीर
आत्म निर्भर औरत की तस्वीर
प्यार से लबालब पर बेबस नहीं
करुणामयी पर हँसती मुस्कुराती

यूँ अब जब मेरा विज़न सच हो चुका है
तो मैं ककनूज़ हो गई हूँ

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY