बुरी तरह लतियाये जुतियाये जाने के लिए फिर से मचल रहा है मन!

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. 1998 से 2004 इस 6 वर्ष की समयावधि में अटल सरकार के कार्यकाल के दौरान महावीर हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों को लगातार यह लगता रहा था कि उनकी भावनाएं प्रचण्ड रूप से घायल/ आहत हो रहीं हैं.

अतः उनका रक्त अटल बिहारी वाजपेयी जी की कार्यशैली को लेकर रह रह कर लगातार उबलता भी रहता था.

उन महावीर हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों की वैचारिक एक्सरे मशीन उन 6 सालों की अवधि में हर 15-20 दिन बाद सार्वजनिक रूप से यह प्रमाणपत्र जारी करती रहती थी कि अटल जी अब राष्ट्रवादी/ हिन्दूवादी नहीं रहे, इसके बजाय वो एक कायर कुटिल सत्तालोलुप सेक्युलर नेता हो गए हैं.

इसका परिणाम यह हुआ था कि 6 साल बाद, 2004 में उन महावीर हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों की तथाकथित आहत/ घायल भावनाएं अटल जी की सत्ता में वापसी की संभावनाओं को बुरी तरह खा चबा गईं थीं.

उसके बाद मैंने यह भी देखा कि 2004 से 2014 तक की समयावधि में उन महावीर हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों की वही तथाकथित भावनाएं हर 2-4 दिन बाद सार्वजनिक रूप से बुरी तरह लतियायी जुतियायी जाती रहीं. सार्वजनिक रूप से रौंदी कुचली जाती रहीं.

इसके उदाहरण लिखूंगा तो दो चार दिन का समय लग जाएगा. आशा करता हूं कि ऐसे अनेकानेक असंख्य उदाहरण आप सभी को याद होंगे.

जिस तरह कहावत है कि 12 साल में कूड़े के भी दिन बहुर जाते हैं, उसी तरह उन महावीर हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों के दिन भी बहुरे.

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी नाम का एक शासक बैठा और 10 महीने पहले यूपी में योगी आदित्यनाथ. लेकिन 10-12 वर्षों बाद मिला यह घी एक बार फिर उन हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों के लिए अपचनीय सिद्ध हो रहा है.

कश्मीर से लेकर कासगंज तक उनकी तथाकथित भावनाएं फिर बुरी तरह आहत हो रहीं हैं. वैचारिक एक्सरे मशीन ने मोदी और योगी के कायर कुटिल सत्तालोलुप सेक्युलर नेता बन जाने का प्रमाणपत्र जारी करना प्रारम्भ कर दिया है.

क्योंकि उन हिन्दूवादियों/राष्ट्रवादियों के अनुसार तिरंगे की जय कहने पर कासगंज में एक युवक को मारी गयी गोली की घटना सूचना से योगी और मोदी को कोई फर्क नहीं पड़ा है. वहां कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. कासगंज की सारी चिन्ता और चिन्तन का ठेका उन महावीर हिन्दूवादियों/ राष्ट्रवादियों को ही सम्भालना पड़ रहा है.

आज यह सब इसलिए लिखा क्योंकि ऐसा होते हुए मैं पहली बार नहीं देख रहा हूं. और कम से कम अब मेरी समझ मे यह कड़वी सच्चाई आ चुकी है कि… 10-5 साल तक बुरी तरह जुतियाये-लतियाये जाने के बाद मिलने वाली सैद्धांतिक/ वैचारिक विजय लम्बी अवधि तक ना हजम होती है, ना मज़ा देती है.

मन फिर से बुरी तरह लतियाये जुतियाये जाने के लिए बुरी तरह मचलने लगता है. फिलहाल इसकी तैयारी ज़ोर-शोर से शुरू हो चुकी है.

अबतक का अनुभव यही कहता है कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं, यह लाइलाज है.

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