जलवा खिलाड़ी का

क्लास, पेशेंस, परफेक्शन… ये सिर्फ तीन शब्द नहीं हैं. यह पूरी कहानी हैं.

कहानी है उस महानतम टेनिस खिलाड़ी की जिसने कल 36 साल की उम्र में अपना 20वां ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लिया.

जी सही पहचाना आपने, मैं बात कर रहा टेनिस खिलाड़ी रॉजर फेडरर की.

स्विट्जरलैंड के इस खिलाड़ी ने पिछले एक दशक से ज्यादा खेलने के बाद भी सर्वश्रेष्ठ बने रहने की हिम्मत दिखाई है. वो अपनी काया से खेल बदलता रहा पर खुद नहीं बदला.

कल ऑस्ट्रेलियन ओपन के फाइनल में भी फेडरर ऐसे खेले कि जैसे मारिन सिलिच की जगह हिमालय भी होता, तो हार जाता.

कल के फाइनल में हमने जिसे देखा, वो शायद वही 21 साल पहले वाला हीरो था, जिसने विम्बलडन में अपना जलवा पहली बार दिखाया था.

उसे देखकर लगा कि 20 साल और खेलने पर भी फेडरर ऐसे ही खेलेंगे.

फेडरर शायद अपने जज्बे की वजह से महानतम बने हैं. 36 साल की उम्र में भी ऐसा शानदार खेल बहुत कम दिखाई देता है.

दुनिया सोचती है, अब खत्म हो गया. चुक गया. लौट नहीं पाएगा. खेल नहीं पाएगा. जीत नहीं पाएगा. मगर फेडरर सबको गलत साबित कर देते हैं. हर बार…

वो इंसान जब अपने उन दो हाथों में रैकेट थामे टेनिस कोर्ट पर उतरता है, तो देखने वाले उनकी जीत की दुआएं मांगते हैं.

कई बार फेडरर हार जाते हैं तब भी, वहां मौजूद लोग खड़े होकर उनके लिए तालियां बजाते हैं.

और जब फेडरर जीत जाते हैं, तब? तब कइयों की आंखें गीली हो जाती हैं. अभिभूत से रह जाते हैं. जैसे कल हुआ.

सलाम फेडरर, वी लव यू!!!

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