बौद्धिक आतंकवाद

यह बहुत बड़ी विडंबना ही नहीं बल्कि एक तरह का बौद्धिक आतंकवाद है… कि वैश्विक स्तर पर ‘आतंकवाद’ और ‘राष्ट्रवाद’ शब्दों की एक सर्वमान्य परिभाषा तक नहीं तय हो पाई है.

और यह दुर्भाग्य ही नहीं… राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि बौद्धिक विमर्श के नाम पर जयपुर लिटरेचर जैसे इस आयोजन में इंग्लैंड में पैदा हुए अमरीकी लेखक पीको अय्यर को न सिर्फ मुख्य वक्ता के तौर पर मंच दिया जाता है बल्कि यह कहला लेने की सहूलियत भी कि : “हम राष्ट्रवादियों और आतंकवादियों को मिटा नही सकते हैं, लेकिन हम हमारे शब्द, विचार, और कल्पना से दुनिया बदलने की कोशिश कर सकते हैं.”

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसे तथाकथित साहित्यिक आयोजनों में ‘राष्ट्रवाद’ की तुलना ‘आतंकवाद’ से कर देने सस्ती तुलनात्मक कोशिश अगर हो पाती है तो संभवतः उसका कारण इन दोनों शब्दों की परिभाषा या कहूं मायने तय न हो पाना ही है.

और ऐसी तुलनात्मक शातिराना चालों को “बौद्धिक आतंकवाद” कहना इसलिए जायज़ होगा, क्योंकि यहीं ये आयातित दर्शन वाले गिरोह राष्ट्रवाद शब्द को किसी देश की भौगोलिक सीमा, आकार का समर्थन भर से जोड़ देने की शातिरी सहूलियत ले पाने में सफल हो जाते रहे हैं.

जबकि भारत के संदर्भ में विशेष और वैश्विक स्तर पर भी राष्ट्रवाद शब्द… भूगोल की सीमा, आकार, उसका समर्थन, उससे प्रेम, उस पर श्रद्धा आदि से बहुत ऊपर “सांस्कृतिक” अवधारणा से रिश्ता रखता है.

राष्ट्रवाद की इसी सांस्कृतिक अवधारणा को मिटाना, इस पर सवाल उठाते हुए इसे जब-तब बेइज्जत करना गिरोहों की वैश्विक वैचारिक अवधारणा का हिस्सा रहा है.

जिसका प्रतिफल रहा कि एक तरफ ये तमाम वैचारिक-दार्शनिक-राजनैतिक गिरोह एक तरफ आतंकवाद की साफ परिभाषा की अनुपस्थिति में इसी देश में कभी अफजल जैसे सजायाफ्ता आतंकियों के समर्थन की हिम्मत और भारत तेरे टुकड़े होंगे, भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी… जैसे नारों की हिमायत करने जुर्रत… पैदा करते रहे हैं, तो दूसरी तरफ राष्ट्रवाद को भौगोलिक सीमाओं से जोड़ कर उसकी आतंकवाद से तुलना तक कर निकलने में सफल होते रहे हैं.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी बीते समय में कई अंतरराष्ट्रीय मंचों से पूरी दुनिया से अब आतंकवाद की परिभाषा तय कर लेने की बात कहते भी रहे हैं.

इस क्रम में… क्या जयपुर के साहित्य के नाम पर लगाया गया तमाशा ऐसे में एक बौद्धिक आतंकवाद का मंच नहीं है, जहां साहित्यिक विमर्श के नाम पर राष्ट्रवाद को आतंकवाद के सामने तुलना के लिए रखवा कर वैचारिक-राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति करने की कोशिश की जाती है?

अफसोस… भारत और वैश्विक स्तर पर राष्ट्रवाद… इसका प्रतिकार कर पाने में बौद्धिक स्तर पर सक्रियता और गंभीरता नहीं दिखा पाता… जबकि जयपुर जैसे आयोजनों के जरिये गिरोह अलगाववादी नारों के कैंपसों से आगे बढ़ तथाकथित बौद्धिक चरमपंथ की गिरोहबाजी के लिए पीको अय्यर जैसे बौद्धिक आतंकवादियों को मंच देते हुए अपने हित की बात कहलवा लेते हैं.

इस सबके बीच अफसोस तो ज़रूर… लेकिन दुख नहीं होता… जब इन जैसी बौद्धिक आतंकवाद की घटनाओं के समय में भारतीय राष्ट्रवाद का एक तबका… मनोरंजक पकौड़े तलने में व्यस्त दिखता है.

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