मुल्क में तिरंगा लेकर चलना गोली खाने का काम कबसे हो गया!

कासगंज पर इतना भी चुप मत रहिये जनाब कि चंदन गुप्ता की हत्या भी काबिले जिक्र न हो!

एक लड़के की जान गई है साहेब, और वो सड़क पर दंगा करते हुए किसी पुलिस की गोली से नहीं मरा.

वो गाय-बछड़ा काट कर खाने के बाद उन्मादी भीड़ की पिटाई से भी नहीं मरा.

राष्ट्रीय पर्व के दिन जब राजपथ से लेकर हर चौक-चौराहे तक राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे थे…. उस दिन चंदन को तिरंगे की कीमत पर क्यों मारा?

किस मानसिकता ने चंदन की हत्या की… किसने मारा से बड़ा सवाल है.

अपना कद मरहूम अखलाक से तनिक बड़ा करिये… पूछिये उन लीगी मानसिकताओं से कि मुल्क में तिरंगा लेकर चलना गोली खाने का काम कबसे हो गया!

चंदन की हत्या के सामने परमीशन लेकर राष्ट्रीय पर्व के दिन तिरंगा लेकर घूमने के बेहूदा और झूठा कुतर्क देने से पहले… एक बार इस झूठ को सही मानते हुए भी… इस बात पर शर्म खोजिये : क्या चंदन की मौत बिना परमिशन के तिरंगा लेकर घूमते हुए… उसे रोकती पुलिस की गोली से हुई?

किस मानसिकता ने तिरंगे की कीमत पर चंदन गुप्ता की हत्या की… के सच से मुंह चुराना… तिरंगे से दूरी बना मज़हबी आधार पर देश छोड़ गई मानसिकता को फिर जिंदा करने के बराबर है.

यहां धर्म कहाँ है? यहां तो राष्ट्र-धर्म है जिसको निभाते वह चंदन गुप्ता गोली खा बैठा! फिर भी अगर कोई धर्म को घुसाना ही चाहता हो, तो उस पर भी खुल के बोलिये तो सही!

पूछिये अपनी आत्मा से… कि चंदन की धार्मिक मानसिकता यदि उसे राष्ट्रीय पर्व के दिन अपने देश का झंडा लेकर सड़क पर घुमा रही थी… तो उसे इसी बिना पर रोक के किस मजहबी मानसिकता ने गोली मार दी?

एक मौत हुई है साहेब तिरंगे में लिपटी हुई.

ईश्वर के लिए इसे सांप्रदायिक दंगा न कहिएगा, दो समुदायों का मामला कह के उन मुसलमानों के जज़्बे को गाली भी मत दीजियेगा.. जिन्होंने तिरंगे और राष्ट्र की सेवा में जानें दी हैं, आज भी देते हैं.

किसी बच्चे को स्वेटर पहनाते बच्चे चंदन की तस्वीर देख पाने की हिम्मत जुटाइये और उस मानसिकता पर जुबान तो ज़रूर खोलिये जो तिरंगे की कीमत पर हत्या करता है.

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