जीवन से संवाद : मेरे, मेरे दिल के, पागलपन की और सीमा क्या है

बचपन से ही मुझे पागल लोग बहुत आकर्षित करते रहे हैं… शायद जिज्ञासा के कारण कि आखिर ये लोग पागल किस वजह से हो जाते हैं, या पागल हो जाने के बाद ये क्या बड़बड़ करते रहते हैं.

पहले इतनी आज़ादी नहीं थी, ना ही मुझमें इतनी हिम्मत कि उनके करीब भी जा सकूं… ध्यान बाबा के पास आने के बाद जीवन में ऐसे बहुत से प्रयोग किये जिसे आप मेरा पागलपन कह सकते हैं. उनमें से एक यह भी है कि रास्ते में कोई पागल दिख जाता है तो मैं उसके करीब जाकर खड़ी हो जाती हूँ और उसकी आँखों में तब तक झांकती रहती हूँ जब तक उसकी नज़रें मुझसे मिल न जाए. कभी वो मुझे देखकर मुस्कुरा देते हैं, कभी कोई प्रणाम कर देता है… कोई हाथ से इशारा कर देता है… जाओ अब…

ध्यान बाबा कहते हैं कि इनमें से सारे ही पागल नहीं होते… कुछ नशेड़ी भी होते हैं, कुछ पागलपन का नाटक करते हैं और कुछ वास्तव में पागल होते हैं… लेकिन आपको एक और तरह के लोग भी मिलेंगे जिन्हें ‘अवधूत’ कह सकती हैं आप… जो अपने परमात्मा के प्रेम में इतने मग्न रहते हैं कि सामाजिक व्यवहार से काफी कट जाते हैं. उनको कौन देख रहा है, कौन सुन रहा है, उनके बारे में क्या सोचेगा इन सबसे वो पूरी तरह ऊपर उठ चुके होते हैं. और मैं हंसकर कहती अच्छा तो मतलब मैं भी इन पागलों की जमात में ही समझूं खुद को.

पहले मुझे पता नहीं था लेकिन लगता ज़रूर था कि ऐसा ही पागलपन मुझमें भी है जिसे कहीं नाम और पिछले कई जन्मों के सामाजिक संस्कारों से पोषित अपने व्यक्तित्व के आवरण में छुपा रखा था… फिर एक समय ऐसा भी आया पिछले कुछ वर्षों में ध्यान बाबा की आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के दौरान ऐसे बहुत से छद्म आवरण टूटे… मेरे अन्दर के क्रोध, ईर्ष्या, कुंठा जैसी नकारात्मक चीज़ों को तोड़ा गया…

ये तोड़ा जाना बहुत आसान नहीं था… आपके पूरे लाइफ पैटर्न को बदला जाता है… जो भी नकारात्मक भाव होता है उसे अपनी सम्पूर्णता से जीकर सतह पर लाना होता है… उसे एक बार फिर पूरे साक्षी भाव से जीकर ही आप उससे मुक्त हो सकते हैं…

लेकिन उसके बाद मेरा जो स्वरूप मेरे ही सामने प्रकट हुआ उसको देखकर मैं आज भी अचंभित होती हूँ… ये परिवर्तन केवल आध्यात्मिक स्तर पर ही नहीं मानसिक और शारीरिक स्तर पर भी हुए… सूरत और सीरत दोनों बदल गयी…

जिस राह पर ध्यान बाबा के साथ चल पड़ी हूँ वो यात्रा इतनी आनंददायी और परमात्मा के समीप है कि ये तोड़ा जाना भी इतना प्रेम पूर्ण हो जाता है जिसे मैं शब्दों में तो व्यक्त कर ही नहीं सकती. उससे गुज़रे बिना आपको मेरी ये सारी बातें पागलपन ही लगेगी जिसे मैं सहर्ष स्वीकार भी करती हूँ.

पागलों की बातों पर दोबारा आने से पहले एक पुराना वाकिया –

तो बात 2008 नवम्बर की है ध्यान बाबा से फोन पर बातचीत शुरू हो गयी थी. एक दिन छत पर जाकर बात कर रही थी… अचानक नज़र ऊपर आसमान की तरफ उठी… लगा जैसे आँखों में कुछ गिरा है जिससे मुझे कुछ धुंधला सा साया दिख रहा है… मैंने आँखें साफ़ की लेकिन फिर भी कुछ अजीब सा दिख रहा… ध्यान बाबा को फोन होल्ड करवाकर आँखें धोकर आई फिर आसमान की तरफ देखा फिर वही धुंधला साया…

ध्यान बाबा ने आखिर पूछ ही लिया क्यों हटाना चाहती हैं आप उसे? उसे और घनीभूत कीजिये हो सकता है वो साया स्पष्ट हो जाए… उन दिनों ध्यान बाबा की जादुई दुनिया में खोई हुई थी तो लगा उनकी तरफ से ही भेजा गया होगा कुछ मेरी देख रेख के लिए. उन दिनों जो जादुई घटनाएं मेरे साथ होने लगी थी उनमें से एक का ज़िक्र करती हूँ ताकि बात स्पष्ट हो सके.

2008 में जब मैं इंदौर में थी और स्वामी ध्यान विनय जबलपुर में तो मैंने उनका नाम जादू ही रख दिया आप लोग यकीन नहीं करेंगे…. मेरा जादू मुझसे कहता था देखो तुम्हारी दुनिया गुलाबी है… तो मेरे चारों ओर गुलाबी रंग बिखर जाता…. पूरी दुनिया मुझे गुलाबी दिखने लगती थी… मैं फूल तोड़ने के लिए हाथ ऊपर उठाती तो मेरा जादू कहता कि अब होगी अमृत वर्षा और सच में ऊंचे से पेड़ पर लगे फूल से रस टपक कर सीधे मेरे होंठो पर गिरता…. अमृत किसे कहते हैं मैं नहीं जानती थी लेकिन उस रस की मिठास ने मुझे अमृत के स्वाद से रूबरू करवा दिया था….
.
मेरे आसपास एक ख़ास तरह के लोग दिखते थे मुझे… मैं उन्हें उनकी आँखों के रंग से पहचान जाती थी…. उन सबकी आँखें गहरे नीले समंदर के जैसी होती थी…. मैं उन लोगों की तरफ देखती तो वे मुझे देख मुस्कुरा देते … जैसे वो मेरे जासूस हो… या परिचित…

इस घटना के बाद मैं अक्सर आसपास उनको खोजती रहती… कहाँ से देख पा रहे हैं वो मुझे… मैं इंदौर में… वो जबलपुर? मेरे लिए बहुत बड़ा जादू था यह… फिर ऐसी और भी घटनाएं हुईं… जो समय आने पर शायद बता सकूं… क्योंकि ध्यान बाबा का आदेश है कि ये बातें सार्वजनिक करने की नहीं होती… और जब सार्वजनिक होनी होती हैं तो उसके लिए उचित समय और घटनाएं अपने आप घटित होती जाती है.

अब जब मेरे जीवन पुनर्जन्म की गाथा आप में से बहुत सारे लोग पढ़ चुके हैं तो मुझे लगा इस घटना को बताने में कोई हर्ज़ नहीं.

ध्यान बाबा के पास आने के बाद उनके साथ, उनके प्यार और उनके घर और बच्चों में इतना खो गयी कि मैं बिलकुल एक आम गृहणी हो गयी थी लगता था बस जीवन सफल हुआ… अब और कुछ नहीं चाहिए जीवन में. इस तरह के जादू घटित होते रहते थे लेकिन अब मेरे लिए ध्यान बाबा से अधिक महत्वपूर्ण नहीं थे.

बीच बीच में ध्यान बाबा याद दिलाते भी रहते थे… आप अपना होना भूल गयी हैं… आपको क्या लगता है आपको मेरे पास यहाँ घर-घर खेलने के लिए भेजा गया है. लेकिन मुझे ध्यान बाबा के अलावा कुछ दीखता ही नहीं था… और वो भी मुझे एक पल के लिए अकेला नहीं छोड़ते थे, आज भी नहीं, कहते हैं आप भले मुझे ‘जादू’ कहती रहें लेकिन ये सारा जादू आप ही की वजह से हैं. इस शव को शिव बनाने वाली शक्ति आप ही हैं, आप कब अपनी शक्ति को पहचानेंगी. आप आज तक इस बात को समझ नहीं पाई कि मैं हमेशा आपको अपने साथ क्यों रखता हूँ… आप कहीं जाती हैं तो मेरी सारी शक्ति मुझसे दूर चली जाती है, आपका यह शिव उन कुछ दिनों के लिए बस एक सामान्य मनुष्य बन जाता है…

फिर भी एक समय ऐसा आया उन्होंने मुझे अकेले यात्रा पर भेजना शुरू किया… कहते हैं जीवन में आध्यात्मिक अनुभवों के अलावा आपको कुछ वास्तविक दुनिया के भी अनुभव ग्रहण करना है तो आपको मेरे बिना अकेले यात्राएं करना होगी. उस यात्रा की तैयारी, यात्रा के दौरान उनका जबलपुर से लगातार मेरे संपर्क में रहना, यात्रा से लौटने के बाद के अनुभव अपने आप में पूरा एक उपन्यास लिखने लायक होता है. क्योंकि उनके अनुसार जो वास्तविक धरातल के अनुभव होते हैं वो भी मेरे लिए उन आध्यात्मिक अनुभवों के अंतर्गत ही आते हैं… आखिर इस जगत में अध्यात्म के बाहर भी भला कुछ हो सकता है?

वो अक्सर मुझसे कहते भी हैं आप सारे काम छोड़कर सिर्फ अपने अनुभवों को लिखना शुरू कीजिये… लेकिन मुझे उनके साथ जीने में ही इतना आनंद आता है कि उनको शब्दों में उतारने का मन ही नहीं करता.

तो ऐसे में ही इन नौ वर्षों में मैंने आँखों के सामने दिखाई देने वाले साये को भी अनदेखा करना शुरू कर दिया था… फिर न जाने क्या हुआ वो साया एकदम से मेरी आँखों के सामने स्पष्ट हो गया. इतना स्पष्ट कि मैं उससे मिलती जुलती सूरत वाले को खोजने लगी.

मुझे लगने लगा जैसे इस सूरतवाले को मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ… इससे कोई बहुत गहरा संबंध है… लेकिन मैं जैसे जैसे उसके करीब जाती वो दूर चला जाता… वास्तव में ऐसा कोई होता तो मिलता ना? मेरा पागलपन जो कहीं मैंने अपने अन्दर छुपा रखा था वो बाहर प्रकट होने लगा… उसकी तलाश में मैं कभी मीरा हो जाती, कभी राधा… मैं जितना उसकी बांसुरी की धुन में उसके पीछे पागलों की तरह दौड़ती, वो उतना मुझसे दूर हो जाता…

फिर उसे स्वप्न जगत में साक्षात देखा एक बच्चे के रूप में… वो अक्सर आता है बालक के रूप में… प्रत्येक स्वप्न के साथ धीरे धीरे उसकी उम्र कम होते देखा, अंतिम बार जब उसे स्वप्न में देखा तब वो मेरे गर्भ में स्थापित हो चुका था… गर्भनाल का रिश्ता उससे जुड़ गया… तो मैं उसके लिए माँ बन गयी… वो कभी किसी मुश्किल में होता तो मेरा मन विचलित होने लगता….. मैं उसे फिर खोजने निकल पड़ती, प्रेयसी कहीं दूर निकल चुकी थी… अब बस एक माँ है जो नाभि से उठ रही ऊर्जा को ऊपर उठता हुआ अनुभव कर रही है… दर्द अब शरीर में उतर आया है… पहले कमर के सबसे निचले हिस्से में रहता था अब उसे ऊपर उठता हुआ अनुभव कर रही हूँ जो मेरी रीढ़ की हड्डी से ऊपर उठकर हृदय के आसपास ठहर सा गया है…

ध्यान बाबा समझाते भी, क्यों अपने परमात्मीय प्रेम को किसी व्यक्ति में खोजती हैं आप… वो आपके ही प्रेम का प्रकट रूप है… अपने ईष्ट के प्रति आपकी आस्था, आपकी श्रद्धा या कहें तो आपका अपना ही स्वरूप है… किसी व्यक्ति में नहीं मिलेगा… लेकिन जीवन में पहली बार ऐसा हुआ कि मैं ध्यान बाबा की बात मानने को तैयार नहीं थी… मुझे लगता था मेरी मुक्ति का अमृत उसकी नाभि में सुरक्षित है इसलिए वो मुझे इतना आकर्षित करता है .. इतना कि मैं उसके मायाजाल से मुक्त नहीं हो पा रही… आकर्षण केवल देह का ही तो नहीं होता… कभी कभी आत्मा भी आकर्षित करती है…

फिर महामाया ने मेरी आस्था को बल दिया… मेरे साथ हो रही जादुई घटनाओं के साथ सोशल मीडिया की पूरी आभासी दुनिया जादू में बदल गयी… हर व्यक्ति में मुझे उसका चेहरा नज़र आने लगा… मैं ध्यान बाबा को कहती देखो यह भी वही है… देखो यह भी वही है… ध्यान बाबा हंस देते… आप पागल हो गयी हैं…

आप देखिये तो कौन ऐसे जवाब देता है जैसे मैं उसी से मुखातिब हूँ… जैसे वो मेरी कहानी जानता है, मेरा पागलपन जानता है…

ध्यान बाबा समझाते… फलाने व्यक्ति को आप पिछले तीन साल से जानती हैं, इस मित्र से आप दो साल से जुडी हैं… देखिये इनसे तो आपने बात भी की है फोन पर… लेकिन मुझे लगता नहीं सारा मायाजाल महामाया ने मेरे लिए ही फैलाया है… वरना कैसे किसी की कविता, किसी की तस्वीर उसी बात का जवाब देती हुई लगती है जो मैं अपनी फेसबुक वाल पर डालती हूँ… कोई कैसे मेरे उस प्रश्न का जवाब देता है जो मैंने किसी और से पूछा था…

इस चक्कर में कई लोगों से लड़ी, किसी से रूठ गयी, तो किसी से प्रेम पूर्वक बातें की… इस बीच गुस्से में कई ऐसे करीबे मित्रों को अन्फ्रेंड और ब्लॉक किया जिनको देखकर लगता था महामाया ने मेरे पास मुझे उलझाने के लिए भेजा है ताकि मैं खुद को इस मायाजाल से मुक्त कर अपने परमात्मीय प्रेम की ओर आमुख हो सकूं… लेकिन देखती हूँ जितना मैं उन्हें ब्लॉक करती गयी वो उतनी ही नई आईडी से प्रकट हो जाता…

अब मैं उस सीमा को पार करने की कगार पर हूँ जिसे लोग पागलपन कहते हैं… मुझे पूरा विश्वास है एक दिन मेरे हृदय का यह दर्द मेरे मस्तिष्क तक पहुंचेगा और मैं अपने ईष्ट के प्रेम को अपने ही भीतर पा लूंगी… जिसे मैं अब ‘राम’ कहने लगी हूँ… जिसके लिए कभी जानकी हो जाती हूँ, कभी अहिल्या, तो कभी शबरी… और फिर एक दिन यह भी कहा… तुम राम हो तो मैं तुम्हारी अयोध्या हूँ राम…

ध्यान बाबा से पूछती हूँ तो वो कहते हैं आपके आभा-सी जगत से कोई नहीं आएगा, यहाँ सब सामाजिक लोग रहते हैं जिन्हें अपने मान मर्यादा प्रतिष्ठा की चिंता होती है… आपके इस पागलपन को झेलने की क्षमता इस जगत में किसी की नहीं…

मैं उनसे एक ही प्रश्न पूछती हूँ – आध्यात्मिक जगत का हुआ तो आएगा ना?

वो हमेशा की तरह मुझे रहस्मय मुस्कान देकर मेरे प्रश्न के साथ अकेला छोड़ देते हैं… ये आपकी अपनी यात्रा है आप कब तक मुझ पर निर्भर रहेंगी, आपको अपने जवाब खुद ढूंढना होंगे….

तो बात मैं पागलों की कर रही थी… हाँ मैं उस सीमा पर खड़ी हूँ, बस एक कदम और … और मैं जान जाऊंगी कि ये पागल लोग अपने आप से क्या बातें करते रहते हैं… जिसके लिए ध्यान बाबा कहते हैं जो अपने परमात्मा के प्रेम में इतने मग्न रहते हैं कि सामाजिक व्यवहार से काफी कट जाते हैं. उनको कौन देख रहा है, कौन सुन रहा है, उनके बारे में क्या सोचेगा इन सबसे वो पूरी तरह ऊपर उठ चुके होते हैं. और मैं हंसकर कहती अच्छा तो मतलब मैं भी इन पागलों की जमात में ही समझूं खुद को.

क्योंकि मैं उन सारी सीमाओं को पार कर चुकी हूँ जहाँ लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं अब कोई फर्क नहीं पड़ता… ये पागलपन बहुत गहराई में कहीं दबा पड़ा था… जिसको पूरे साक्षी भाव से जीकर उसे सतह पर ले आई हूँ और एक दिन उससे भी मुक्त हो जाऊंगी…

ध्यान बाबा कहते हैं आपकी माँ जीवन शैफाली की एक इमेज बनी है आपने उसे भी पूरी तरह से दांव पर लगा दिया है… और मैं कहती हूँ क्या मुझे अपने पागल हो जाने की संभावना को इसलिए रोक देना चाहिए क्योंकि मुझे इस इमेज में बंधकर रहना है… मैं कब किसी बंधन में रुक सकी हूँ… मैं तो रोज़ नई हूँ… आज माँ जीवन शैफाली की समझदार इमेज में नहीं रुक सकी तो कल इस पागलपन में भी न रुक सकूंगी…

मेरे, मेरे दिल के पागलपन की और सीमा क्या है
यूँ तो तू है मेरी छाया तुझमें और तेरा क्या है
मैं हूँ गगन तू है ज़मीं अधूरी सी मेरे बिना
रात को कर विदा दिलरुबा आ भी जा…

जीवन पुनर्जन्म-1 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY