घर फूंककर हाथ सेंकने का सुख मगर कब तक? भाग-2

भरत जब राम से मिलने चित्रकूट जाते हैं तो राम उनसे पूछ्ते हैं कि क्या तुम्हारे राज्य में वैश्य, ब्राह्मण, गोपालन करने वाले और पुरोहित सुख से हैं?

भरत को पुरोहित के बारे में विशेष रूप से पूछा जाना हैरान करता है तो वो पूछ बैठते हैं कि भैया! मुझे बाकियों का तो समझ आया पर आपने पुरोहित के बारे में क्यों पूछा?

तो राम भरत को पुरोहित का महत्व समझाते हुये कहते हैं कि पुरोहितों के चलते समाज में अर्थव्यवस्था की गति बनी हुई रहती है और सबके लिये रोजगार के अवसर बनते हैं.

[घर फूंककर हाथ सेंकने का सुख मगर कब तक? भाग-1]

हिन्दुओं में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो उससे पूर्व पुरोहित हमें एक लिस्ट देता है कि आपके इस अनुष्ठान के लिये ये सब चीजें चाहिये.

उस सूची में जो भी सामान होते हैं उससे समाज के हर तबके का आर्थिक-उन्नयन होता है और अर्थव्यवस्था की गति बनी रहती है.

हजारों-लाखों साल से हमारा भारत इसी अर्थ-नीति का अनुपालन करता रहा है और गांधी से लेकर दीनदयाल उपाध्याय तक ने इसी की बात की है कि अर्थव्यवस्था ऐसी हो कि वो केवल कुछ ही हाथों में बंधक बनकर न रह जाये क्योंकि सत्ता और अर्थ दोनों का विकेंद्रीकरण भारत का मूल दर्शन रहा है.

LPG (Liberalization, Privatization, Globalisation) का दानव आया तो दिल्ली को विस्तारित करने की जरूरत महसूस हुई, ग्रेटर दिल्ली के नाम पर आसपास के किसानों की जमीनों पर बढ़ाया जाया जाने लगा.

वो परिवार जो सदियों से केवल कृषि-कर्म पर अवलंबित था अब जमीनें छीन चुकी थी. बेरोजगारी और गुस्से में भरे उन परिवारों के लड़के काम की तलाश में दिल्ली आ गये.

कम पढ़े-लिखे और केवल कृषि-कर्म जानने वाले उन बेरोजगारों के पास ड्राईवर और कंडक्टर बनने या फिर अपराध करने के सिवा कोई और चारा नहीं था.

इसके नतीजे में दिल्ली ने हिंसा, अपराध और बलात्कार के लगातार बढ़ते आंकड़े देखे. कुंठा और गुस्सा रोड-एक्सीडेंट में भी बदले. यही कमोबेश हर जगह हुआ.

चमड़े का काम करने वाले चर्मकारों के कामों को बाटा, रेड चीफ़ जैसी बड़ी कम्पनियों ने छीन लिया. मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्भकार भाई प्लास्टिक इत्यादि के बर्तनों के आने से अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ने पर मजबूर हुये.

यहाँ तक तो फिर भी ठीक था फिर आया खुदरा क्षेत्र में बड़े-बड़े अजगरों के उतरने का खेल. रिलायंस, स्पेंसर, more जैसे ब्रांड इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स और कपड़ों से लेकर सब्जी, फल-फूल और दाल-चावल तक बेचने लग गये.

किसी इलाके में अगर रिलायंस फ्रेश, स्पेंसर और more के स्टोर खुल गये तो उस पूरे इलाके के छोटे-मोटे सब्जी और फल बेचने वाले से लेकर किराना और जनरल स्टोर वाले दुकानदारों को अपने रोजगार पर ताला लगाना पड़ जाता है.

किसी भी चौक-चौराहे पर दवा की कुछ दुकान होती ही हैं पर वहां भी अपोलो और इमामी जैसी कंपनियों ने अपनी दुकानें खोल ली और उन छोटे दवा दुकानदारों का बंटाधार कर दिया.

‘रिलायंस डिजिटल स्टोर’ जैसे दानवों ने दर्जनों छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वालों को बोरिया-बिस्तर बाँधने पर मजबूर कर दिया.

मान लीजिये आपके इलाके में स्पेंसर का कोई स्टोर खुला जो सब्जी भी बेचता है तो वो सबसे पहले क्या करेगा. सबसे पहले वो अपनी चीजों पर भारी भरकम डिस्काउंट, उपहार और अन्य लालच देगा.

उसे 30 का सामान 2 रूपये कम में बेचने से भी गुरेज नहीं है क्योंकि उस बड़े ब्रांड की नज़रों में ये 2 रूपया घाटा नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट है जो उसे उस क्षेत्र में जड़ ज़माने में मदद करेगा और फिर वो धीरे-धीरे आसपास के तमाम छोटे-बड़े दुकानदारों को निगल जायेगा.

पूरी दुनिया में और हमारे यहाँ तेज़ी से यही हो रहा है. ‘एलपीजी’ से ये हो जायेगा, वो हो जायेगा, के बीच ये सवाल तो अनुत्तरित ही रह गया कि ये सब इतना ही बढ़िया था तो आज भी देश की बहुसंख्यक आबादी गरीबी रेखा के नीचे क्यों है?

किसानों को आत्महत्या क्यों करनी पड़ रही है? डॉलर के मुकाबले रुपया क्यों गिरता जा रहा है? मंहगाई इतनी बढ़ क्यों गई? पारम्परिक, लघु और कुटीर उद्योग एक-एक कर बंद क्यों होते जा रहे हैं?

दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित और अनपढ़ लोग हमारे यहाँ ही क्यों हैं? अमीर-गरीब के बीच की खाई और गहरी क्यों होती जा रही है? समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण क्यों होता जा रहा है?

बेरोजगारी का संकट गहराता क्यों जा रहा है और देश की युवा-पीढ़ी हताश और निराश क्यों है? दुनिया के सबसे बड़े बाजार में अपने लोग ही अपना सामान क्यों नहीं बेच पा रहे हैं?

सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि ‘टमटम के घोड़े’ बनकर और अवसादग्रस्त होकर हम क्यों अपने विनाश की ओर अनवरत दौड़ते चले जा रहे हैं?

…जारी

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