घर फूंककर हाथ सेंकने का सुख मगर कब तक? भाग-1

नब्बे के शुरुआती दशक के पांचजन्य के अंकों का संकलन मेरी रुचियों में एक रहा है. उसे पढ़ते समय हिन्दू राष्ट्र के विचार से भी अधिक आकर्षक मुझे ‘स्वदेशी’ का विचार लगता था और इन विषयों पर के. सुदर्शन और मुरली मनोहर जोशी के लेख मुझे सबसे अधिक पसंद थे.

पांचजन्य के उन कई लेखों से मेरे सामने ये स्पष्ट हो गया था कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ और उसके तमाम अनुषांगिक संगठन इस बात के कट्टर हिमायती हैं कि देश के विकास और अर्थतंत्र के लिये सबसे सशक्त रास्ता स्वदेशी और ग्राम-विकास का है…

और Globalisation, Liberalization और Privatization के रास्ते चलकर विकास की गति बढ़ी हुई तो दिखेगी पर अंततः यह महा-विनाश तक ही ले जायेगी.

मुरली मनोहर जोशी अपने उन लेखों में ताल-ठोककर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को उद्धृत करते हुये कहते थे कि परमात्मा ने दुनिया के हरेक देश को अलग-अलग प्रश्नपत्र दिये हैं इसलिये कोई देश किसी की नक़ल नहीं कर सकता और जो ऐसा करेगा वो असफल हो जायेगा.

ये बात तो सही ही है कि दुनिया के जिन देशों ने इस LPG को अपनाया उसके पीछे दो वजहें ही थी. पहला ये कि उन्होंने अपनी अर्थ-नीति को ठीक से नहीं समझा और जल्दबाजी कर गये और दूसरा ये कि वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने उनको ऐसा करने पर बाध्य किया.

जहाँ तक हमारी बात है तो हमने ये दोनों गलती की. अपनी गलत अर्थ-नीति के चलते जब हमको सोना गिरवी रखना पड़ा था तब हमें ‘वर्ल्ड बैंक’ और ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ की शर्तों को माने पर बाध्य होना पड़ा.

संघ की शाखों में गाया जाता था ‘विश्व एक बाजार है/ जहाँ हरेक खरीदार है/ जिसके पास पैसा है/ केवल उसे ही जीने का अधिकार है.

‘डंकल का है डंक विषैला’ गवाते हुये संघ बिना किसी लाग-लपेट के LPG को विनाश का द्वार करार देती थी.

फिर कहीं-कहीं बीजेपी के आने की आहट सुनाई देने लगी. केंद्र में अटल जी की सरकार आई और विचार-परिवार के इस अहम सदस्य ने सबसे पहली पलटी मारी.

‘विश्व एक परिवार है/ जहाँ सबको जीने का अधिकार है’ गाते हुये शाखा से निकले राजनैतिक स्वयंसेवकों ने संघ के आर्थिक चिंतन को न केवल खारिज किया बल्कि उसे लात मार दी.

भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ जैसे संगठनों के प्रणेता दत्तोपंत ठेंगरी जी अपने ही लोगों के इस वैचारिक स्खलन को सह नहीं पाये और इस दुःख में असमय काल-कवलित हो गये.

तत्कालीन सरसंघचालक की तमाम नसीहतों का संज्ञान लेना भी उचित नहीं समझा गया और अरुण शौरी को बाकायदा एक मंत्रालय बनाकर दे दिया गया कि जाओ जाकर सब कुछ बेच दो.

LPG की चकाचौंध में गोविन्दाचार्य जैसे पुराने दीये डिस्टर्ब करते थे तो चुपके से उनको निपटा दिया गया.

बजरंगलाल गुप्त और देवेन्द्र स्वरुप जैसे चिंतकों के आलेख केवल पांचजन्य और संघ के बौद्धिकों की शोभा बनकर रह गये और मुरली मनोहर जोशी मंत्री बनकर ऐसे मौन हो गये मानो उनको अर्थनीति के ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ की भी समझ नहीं है.

संघ ने पांचजन्य के एक अंग को सेज़ (स्पेशल इकॉनोमिक ज़ोन) के विरोध में निकाला और उसके ही एक स्वयंसेवक (वर्तमान में प्रधान सेवक) ने सेज़ को सबसे अधिक रियायतें दी.

आज Globalisation, Liberalization और Privatization के रास्ते चलते हमको लगभग तीन दशक हो गए हैं.

देश में कम्प्यूटर, परिवहन से लेकर सूचना तकनीक तक में जबरदस्त क्रान्ति हुई. हर हाथ में मोबाइल और लगभग हर संपन्न घर में लैपटॉप आ गये.

एक ही सामान के सैकड़ों ब्रांड उपलब्ध हो गये. चमचमाते मॉल, मेट्रो, अपोलो, मैक्स, AMRI जैसे अस्पताल और अत्याधुनिक एअरपोर्टस दिखने लगे.

ज़ाहिर है इसके साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हुये किंतु इन लुभावने आंकड़ों और चमक-दमक के बीच सवाल ये रह जाता है कि इन सबके बीच गांधी, गोलवलकर, दीनदयाल और त्याग-पूर्वक उपभोग वाले सोच का भारत कहाँ रह गया है?

वसुधैव कुटुम्बकम के बोध वाला भारत अब वही भारत है या एक बाज़ार में तब्दील हो चुका है?

किसी में भी साहस नहीं है कि वो ये पूछ सके कि विकास की अंधी दौड़, होड़ और Globalisation, Liberalization और Privatization के रास्ते चलकर हमारे समाज के नैतिक मूल्यों का कितना क्षरण हुआ है.

कोई इस बात की चिंता नहीं करता कि परिवार और समाज के बीच बंधा भारत कैसे कराह रहा है और किसी को इस बात की चिंता नहीं है कि कैसे एक-एक करके कई कई हिन्दू जातियों के पारंपरिक रोजगार उनसे छीन गये और वो अब बेरोजगार और हताश होकर अपराध और आत्महत्या के रास्ते चल पड़े हैं.

अदम गोंडवी क्या गलत कहते थे कि तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है/ मगर तेरे आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है.

आखिर दूसरों देशों के अंधानुकरण ने हमको दिया क्या?

….जारी

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