दुनिया शक्ति की पूजा करती है…

साल भर पुरानी बात है. मेरा एक श्रीलंकन कार्डियोलॉजिस्ट मित्र है. उसने किसी बात पर यह तस्वीर दिखाई.

यह इज़राइल-फिलिस्तीन का मैप है 1947 से पहले से लेकर आज तक का. याद नहीं है विषय कैसे उठा, पर उसे फिलिस्तीनियों से बहुत सहानुभूति थी.

बाद में जाना यह मैप फिलिस्तीन की हिमायत कर रहे इस्लामपरस्तों का पसंदीदा प्रचार टूल है.

उसे किसी मुस्लिम मित्र ने दिखाया था और यह देखकर उसे फिलिस्तीनियों से बहुत सहानुभूति हुई.

1948 से पहले यह पूरा इलाका अरब था, आज यह इज़राइल है… इज़रायली आक्रमणकारी हैं, और अमेरिका की मदद से उन्होंने अरबों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है.

जो बात उसे मालूम नहीं थी, और जो वह सुनने को तैयार नहीं हुआ वह यह कि इन सबके बीच में हुआ क्या था.

इनके बीच हुई थी कई लड़ाइयाँ… 1948 में इज़राइल की आज़ादी की लड़ाई, 1967 में सिक्स-डे वॉर, 1973 में योम किप्पर वॉर…

ये वो लड़ाइयाँ हैं जो इज़राइल ने चार-पाँच देशों से अकेले लड़ी हैं. इसके अलावा और कई छोटी छोटी लड़ाइयाँ हुई हैं जिसमें इज़राइल ने अलग अलग देशों से मोर्चा लिया है.

कभी तिरान की खाड़ी से गुज़रने के अधिकार के लिए इजिप्ट पर हमला करके शर्म-अल-शेख पर कब्ज़ा कर लिया, कभी बेरूत पर कब्ज़ा करके लेबनान से पीएलओ को भगाया… युद्ध इज़राइल के जीवन का सतत सत्य है…

यह सही है कि इज़राइल ने हर लड़ाई के बाद पहले से ज्यादा ज़मीन जीती है. पर इससे बड़ा सच है कि इज़राइल ने कोई भी लड़ाई ज़मीन के लिए नहीं लड़ी है. इज़राइल ने हर लड़ाई अपने अस्तित्व के लिए लड़ी है.

1948 में जब संयुक्त राष्ट्र ने इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच विभाजन का प्रस्ताव पारित किया था तो अरब देशों ने इज़राइल पर हमला कर दिया था…

तब यह लड़ाई ज़मीन की नहीं थी, ना ही रहने की जगह की थी. सभी अरब देशों ने इज़राइल के अस्तित्व के अधिकार को ही अस्वीकार कर दिया था.

जब इज़राइल यह युद्ध लड़ रहा था तो प्रश्न यह नहीं था उसमें जीतने पर कितनी ज़मीन मिलेगी, बल्कि यह था कि हारने पर एक भी यहूदी… मर्द, औरत, बच्चा जीवित नहीं रहेगा… इज़राइल के लिए सबसे बड़ा प्रश्न ज़मीन नहीं था… अस्तित्व का अधिकार था…

सच तो यह है कि इज़राइल इसलिए नहीं बनाया गया था कि मध्यपूर्व में एक सशक्त, शक्तिशाली यहूदी राष्ट्र बने… इसलिए बनाया गया था कि यहूदी यूरोप में ना रहें, बल्कि उनकी आंखों से दूर कहीं जाकर किसी और के हाथों मरें. इज़राइल को यहूदियों की कब्रगाह बनने के लिए बनाया गया था.

संयुक्त-राष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक इज़राइल बनाया गया था, पर जब उस पर पाँच देशों की आधुनिक सेनाओं ने हमला कर दिया था तो उस प्रस्ताव के समर्थन में और इज़राइल की रक्षा के लिए किसी देश की कोई मदद नहीं गयी थी.

अमेरिका से डिप्लोमेटिक समर्थन के अलावा कोई मदद नहीं मिली थी. इंग्लैंड से वह भी नहीं, इंग्लैंड ने तो प्रस्ताव के पक्ष में मत भी नहीं दिया था.

इज़राइल को हथियार अमेरिका से नहीं, चेकोस्लोवाकिया से मिले थे. अमेरिकी सहायता एक मिथक है… सच तो यह है कि अमेरिका ने इज़राइल का साथ देना तब शुरू किया जब इज़राइल ने अपने आपको एक सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया… अमेरिका की मदद के बिना और ब्रिटेन के विरोध के बावजूद…

इजराइल का सबक साफ है, सबके सामने है… जिसे सीखना है वे सीख सकते हैं… कायर की मौत पर दिखावे के चार आँसू भले रो ले कोई, उसे जीने का अधिकार नहीं दे सकते. दुनिया शक्ति की पूजा करती है…

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