अधीर और असंगठित होने का परिणाम… इतिहास के आईने में 1857

जब अंग्रेज़ों से मुक्ति की पहली लड़ाई लड़ी गई तब इसका जिम्मा उठाया था नाना साहेब ने…

पूरी प्लानिंग उनकी ही थी। जिसको वामपन्थियों और विदेशी इतिहासकारों ने एक sepoy mutiny का नाम दिया।

6 माह की नाना साहेब प्लानिंग जिसमें वो बंगाल, अवध, कानपूर, ग्वालियर, झाँसी, सतारा, पुणे आदि के नवाबों, राजाओं और बादशाहों से मिल चुके थे. अधिकतर ने इसमें उनका साथ देने की बात मान ली.

प्लानिंग के अनुसार अंग्रेज़ों को हराने के बाद दिल्ली के बादशाह को देश का बादशाह माना जाएगा… बगावत का दिन 31 मई तय हुआ था…

सब कुछ प्लानिंग से होना था लेकिन… अधीर लोगों ने सब कुछ गुड़ गोबर कर दिया… अभी नाना साहेब का पंजाब दौरा बाकी ही था कि 21 मार्च को बैरकपुर में मंगल पाण्डेय ने बगावत कर के गोली चला दी और 8 अप्रैल को फांसी भी हो गई…

नाना साहब अभी बंगाल से लौटे ही थे और पटियाला, नाभा, संगरूर के नवाबों/ राजाओं से संपर्क साधना शुरू कर रहे थे कि बैरकपुर से खबर आ गई… जिससे झटका लगा क्योंकि अँगरेज़ बंगाल में सावधान हो गए…

सभी राजाओं को तैयार करके एक साथ 31 मई को शुरू करना था लेकिन मेरठ छावनी से सिपाहियों की अधीरता ने फिर गड़बड़ कर दी।

मेरठ की छावनी में 6 मई को कुछ सैनिक अधीर हो उठे और उन्होंने अंग्रेज़ों से लड़ाई कर ली… जिससे 9 मई को अंग्रेज़ों ने 85 सैनिकों को बेड़ियाँ डाल दी…

बाकी सैनिक चुपचाप थे लेकिन उधर शहर, बाजार और घर के लोग अधीरता की पराकष्ठा कर चुके थे… इन सैनिकों के ऊपर लोगों ने चूड़ियाँ फेंकनी चालू कर दी और थूकने लगे… कइयों ने कहा 31 तारीख दूर हैं तब तक अंग्रेज़ों के तलवे चाटो…

इसके बाद मेरठ के बाकी सैनिक बागी हो गए, अंग्रेज़ों को मारना चालू कर दिया… 10 – 11 मई को मेरठ में अंग्रेज़ों का कत्लेआम हुआ… किसी को नहीं छोड़ा – बच्चे, महिलाएं, सैनिक, व्यापारी सब मारे गए…

और फिर वो सैनिक सब 12 मई को दिल्ली पहुँच गए… भीषण युद्ध हुआ और दिल्ली जीत गए… वहां भी कत्लेआम मचा… अंग्रेज़ कोई भी कहीं मिला, मार डाला गया खोज खोज के…

इस बीच बाकी जगह जहाँ 31 मई की तारीख तय हुई थी वहां सब लोग उलझन में थे कि 31 मई का इंतज़ार करें या शुरू करें…

15 मई तक दिल्ली अंग्रेज़ मुक्त करा लिया गया था… 20 मई तक पूरी दिल्ली में हिन्दू – मुसलमान एक साथ थे, ज़फर को बादशाह मान लिया गया था…

5 दिन तक दिल्ली में हिन्दू – मुसलमान एकता चरम पर थी… छठवें दिन दिल्ली आ गई बरेली ब्रिगेड, जिसका नेतृत्व बख्त खां कर रहा था जो मौलवी सरफराज़ अली का चेला था…

आते ही मौलवी ने भारत में इस्लामी हुकूमत की घोषणा कर दी और जामा मस्जिद पर गाय कटवा दी… जिसके जवाब में हिन्दू सैनिकों ने गाय काटने वालों को काट डाला… 5 दिन की हिन्दू – मुसलमान एकता छिन्न भिन्न हो गई… अब हिन्दू मुसलमान लड़ने लगे.

उधर नाना साहेब इस सब कोलाहल के बाद पटियाला, नाभा, संगरूर, बहावलपुर, सरहिन्द के नवाबों से संपर्क न कर सके और लड़ाई में कूदना पड़ा… लड़ाई शुरू होते ही पटियाला, नाभा, संगरूर, बहावलपुर, सरहिन्द के नवाबों और ग्वालियर के राजा सिंधिया ने अंग्रेज़ों का साथ दिया… आगे का इतिहास तो सब पता ही है…

इसको आज के समय से जोड़िए… आपको इस सरकार में नाना साहेब… खुद में मेरठ की पल्टन या अधीर मंगल पांडेय नज़र आएगा… बरेली के पल्टन मौलवी सरफ़राज़ और बख्त खां भी दिखेंगे अपनी ढपली बजाते हुए…

जबकि इतनी बुरी तरह मार खाए अँगरेज़ फिर लौटे और दिल्ली को लाशों का शहर बना दिया… अगले 90 साल भारत को लूटने और देशवासियों को जानवरों और तुच्छ लोगों जैसे जीवन जीने जिलाने के लिए…

इतिहास से सीखना ज़रूरी है…

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