विषैला वामपंथ : मेहनती से छीन कर निकम्मे को देने की कमीनी मंशा का नाम है समाजवाद

किसी भी व्यक्ति की पहचान इससे नहीं होती कि वह कितने पैसे कमाता है, कितने बड़े घर में रहता है, किस कार से चलता है…

किसी देश की तरक्की का मानक यह नहीं है कि वहाँ लोग कैसे घरों में रहते हैं, कितने लोग कारों से चलते हैं, कैसा खाते और पहनते हैं…

देश और समाज की पहचान वहाँ के समाज में स्थापित उच्च मानवीय मूल्यों से होती है… etc etc…

यह कौन कहेगा? यकीन मानिए, वही कहेगा जिसके पास बड़ा घर है, महंगी कार है… खाने पहनने को अफरात है…

और सुनेगा कौन?? वही सुनेगा जिसके पास घर नहीं है, कार तो छोड़िए साईकल तक बेच के जिसने ताड़ी पी डाली है, और जिसके पास तरक्की का, समृद्धि का कोई सपना नहीं है.

जिसने मेहनत से एक छोटा सा घर खरीदा है वह उससे बड़े घर का सपना रखता है, जिसने इंस्टालमेंट पर स्कूटर खरीदा है उसके लिए कार खरीदना बड़ी उपलब्धि होगी.

वह मेहनत करेगा ही और सफलता पर गर्व भी करेगा… और उसकी उपलब्धि आपके उच्च मानवीय मूल्यों से निम्न भी नहीं दिखाई देगी…

वामपंथ और समाजवाद के जितने सितारे हैं, उन सबकी पृष्ठभूमि देखिये… सभी बड़े और पैसे वाले खानदानों की उपज हैं, या फिर किसी पैसे वाले के परजीवी. और किसी ने भी अपनी व्यक्तिगत संपत्ति किसी भी गरीब को नहीं दी.

एंगेल्स बहुत ही पैसे वाले खानदान का था, मार्क्स उसके पैसे पर जिंदगी भर ऐश करता रहा.

लेनिन रूस के बहुत ही प्रतिष्ठित राजनयिक खानदान का वारिस था और सत्ता हड़पने की महत्वाकांक्षा में उसका भाई मारा गया था.

माओ एक बड़े जमींदार परिवार का था और जिंदगी में उसने कभी शारीरिक श्रम नहीं किया था.

अमेरिका में बैठे वामपंथ के सारे झंडाबरदार… होर्खहाइमर, एडोर्नो, मार्क्यूस… सभी बेहद पैसे वाले यहूदी थे. इन्होंने जिंदगी में एक दिन के लिए भी हाथ से कोई काम नहीं किया, और जर्मनी में आग लगा कर हाथ जलने से पहले भागकर अमेरिका में बस गए.

ऐसे ही एक बड़े बाप के निठल्ले बेटे फेलिक्स वील ने अपने बाप के पैसे से उस फ्रैंकफर्ट स्कूल की स्थापना का खर्च उठाया जहाँ से आज भी पूरी दुनिया में इस वामपंथ का गंदा नाला बहता है.

अमेरिकी इतिहास में जितने भी समाजवादी किस्म के राजनेता हुए, सभी बेहद पैसे वाले परिवारों के थे…

अमेरिकी समाजवाद के सितारे रूज़वेल्ट, जिनका न्यू-डील अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आधी सदी तक जकड़े रहा और जिससे बाहर उसे रेगन ने 80 के दशक में निकाला, वह तो राष्ट्रपतियों के परिवार से ही था.

अमेरिकी लिबरलों के पोस्टर-बॉय कैनेडी का परिवार अमेरिका के सबसे अमीर परिवारों में से एक था और उसके बाप जोसेफ कैनेडी का कहना था कि एक सीनेटर तो मैं अपने ड्राइवर को भी बना सकता हूँ…

वहीं दूसरी तरफ जितने दक्षिणपंथी नेता हुए… पूंजीपतियों के कुख्यात एजेंट… सभी गरीब मामूली मेहनती परिवारों से हुए.

रेगन का बाप एक अल्कोहॉलिक था और उसने अपनी पढ़ाई एक स्पोर्ट्स कमेंटेटर की पार्ट टाइम नौकरी करते हुए की थी.

निक्सन एक छोटे दुकानदार का बेटा था… मार्गरेट थैचर भी… और भारत में चाय-पकौड़े की कहानी तो सभी जान ही रहे हैं…

समाजवाद, समानता, उच्चतर मानवीय मूल्य… ये सब भरे पेट के शगल हैं… सामान्य मेहनती आदमी समानता नहीं, सफलता खोजता है.

और अपनी उपलब्धि को अपने बच्चों तक पहुंचाने का और उन्हें जीवन में एक अच्छी शुरुआत देने का हक़ भी रखता है…

मेहनती आदमी से छीन कर निकम्मे को देने का वादा करके सत्ता पर कब्जा करने की एक कमीने आदमी की मंशा का नाम है समाजवाद…

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