जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि : अपने को ही फैलाकर देखता है देखने वाला

मुल्ला नसरुद्दीन को एक रात पकड़ा गया… काफी पी गया था. काफी झूम झटक की सिपाही से, गाली गलौज की. मगर वह उसे घसीटकर कोतवाली ले गया.

कोतवाली में भी घुसा तो बहुत नाराज था और कहा कि यह क्या बदतमीजी है, मुझे किस लिए यहां लाया गया है?

वह जो इन्स्पैक्टर था कोतवाली में, उसने कहा, शराब के लिए लाया गया है. उसने कहा, अरे, तब बात और! प्रसन्न हो गया….फिर कब शुरू करेंगे?

शराब में डूबा हुआ आदमी, जो अर्थ भी देखेगा शब्दों में, वह भी उसका अपना होगा. शराब की अभीप्सा, आकांक्षा से भरा हुआ आदमी इतना बेहोश है कि वह जो सुनेगा, उसमें से भी अपना ही अर्थ निकालेगा. अर्थ भी उसका मूर्च्छित का अर्थ होगा. अर्थ भी उसका अपना ही होगा. स्वाभाविक यही है.

तुम जो देखते हो, वह वही नहीं है जो है. तुम वही देखते हो जो तुम देखना चाहते हो. तुम वही सुन लेते हो जो तुम सुनना चाहते हो. तुम वही खोजते हो जो तुम खोजना चाहते हो.

किसी दिन उपवास कर लो फिर उस रास्ते से गुजरो जिससे रोज गुजरे थे: जो दुकानें मिठाई की कभी नहीं दिखाई पड़ती थीं, वह पहली दफा दिखाई पड़ेंगी. वही दिखाई पड़ेंगी, बाकी जब खो जाएगा. रेस्टारेन्टस, हाटेल्स, मिठाई की दुकान, चाय की दुकान – वे सब प्रगाढ़ होकर दिखाई पड़ेंगी.

एक सात दिन उपवास कर लो, फिर निकलो: तुम्हें बाजार में जूते की दुकान, कपड़े की दुकान दिखाई पड़नी बंद ही हो जाएगी; सिर्फ तुम्हें भोजन की ही सामग्री की दुकानें दिखाई पड़ेंगी. क्योंकि तुम्हारी चेतना यहां भीतर भूख से भरी है. भूख देख रही है, अब तुम नहीं देख रहे हो. तो दृष्टि सृष्टि है.

बड़ी पुरानी कहानी है. महाराष्ट्र में संत हुए रामदास. उन्होंने राम की कथा लिखी. वे लिखते जाते, और रोज लोगो को सुनाते जाते. कहते हैं, कथा इतनी प्यारी थी कि खुद हनुमान भी सुनने आते थे. छिपकर बैठ जाते भीड़ में.

जब हनुमान सुनने आए तो बात कुछ राज की ही होगी, क्योंकि हनुमान ने तो कथा खुद ही देखी थी. अब कुछ इसमें देखने जैसा नहीं था. लेकिन रामदास कह रहे थे तो बात ही कुछ थी कि खुद देखनेवाला मौजूद जो था, चश्मदीद गवाह, वह भी यह कहानी सुनने आता था.

लेकिन जब एक जगह हनुमान को बरदाश्त न हुआ. क्योंकि हनुमान का ही वर्णन हो रहा था. और रामदास ने कहा, हनुमान गए अशोक—वाटिका में, लंका में. और उन्होंने देखा कि चारों तरफ सफेद फूल खिले हैं.

हनुमान ने कहा, ठहरो. सुधार कर लो. फूल लाल थे, सफेद नहीं थे. रामदास ने कहा कि कौन नासमझ बीच में सुधार करवा रहा है?

तब हनुमान ने अपने को प्रकट कर दिया. उन्होंने कहा कि अब प्रकट करना ही पड़ेगा कि मैं खुद ही हनुमान हूं, जिसकी तुम कथा कह रहे हो. और मैं कहता हूं कि वहां फूल लाल थे, सफेद नहीं.

रामदास ने कहा, कोई भी हो, चुप बैठो! फूल सफेद थे.

झगड़ा बहुत बड़ा हो गया. और तब एक ही उपाय था कि अब राम के पास जाया जाए.

हनुमान ने कहा, तो चलो राम के पास. वे जो कह देंगे वही निर्णय. क्योंकि यह हद हो गई! मैं जब खुद चश्मदीद आदमी हूं और कह रहा हूं कि मैंने फूल देखे! तुम मेरी कथा कह रहे हो – और वह भी हजारों साल बाद कह रहे हो. और एक सी बात पर जिद्द कर रहे हो. क्या बिगड़ता है कि तुम फूल लिख दो कि लाल थे?

पर रामदास ने कहा, बिगाड़ने का सवाल नहीं; जो सच है, सच है. फूल सफेद थे.

झगड़ा राम के पास गया, और राम ने हनुमान से कहा, तुम चुप रहो. रामदास जो कहते हैं, ठीक कहते हैं. तुम उस समय इतने क्रोध में थे, आंखें खून से भरी थीं, तुम्हें लाल दिखाई पड़े होंगे. रामदास को कोई क्रोध नहीं है. वह दूर तटस्थ भाव से देख रहा है! फूल सफेद ही थे. मुझे भी पता है.

जब तुम क्रोध से देखोगे तो चीजें और हो जाएगी. स्वभावतः जब तुम लोभ से देखोगे तो चीजें और हो जाएंगी. जब तुम वासना, कामना से भरकर देखोगे तो चीजों में एक सौंदर्य आ जाएगा, जो है ही नहीं.

देखने वाला अपने को ही फैलाकर देखता है. इसलिए तुम्हारी दृष्टि ही तुम्हारी सृष्टि हो जाती है. जब तुम बदलोगे और तुम्हारी दृष्टि बदलेगी, तत्क्षण सारी सृष्टि बदल जाएगी.

जहां तुम्हें बहुमूल्य दिखाई पड़ता था वहां कचरा दिखाई पड़ेगा. जिससे तुमने असार समझकर छोड़ दिया था, हो सकता था वहां सार दिखाई पड़े; और जिसे तुमने सार समझकर छाती से लगा रखा था वहां तुम्हें असार दिखाई पड़े.

जीवन तुम्हारी दृष्टि का फैलाव है. और जिसके भीतर की दृष्टि खोयी हो, वह ऐसा ही जैसे भीतर है ही नहीं. सब सोया है. उस भीतर की दृष्टि के सोने के कारण तुम जीवन के भीतरी अंगों को नहीं देख पाते.

बाहर की आंख बाहर को ही देख सकती है. भीतर की आंख भीतर देखेगी. तुम देखते हो मुझे, लेकिन अगर बाहर की आंख से देखते हो, तो तुम मेरे शरीर को देखोगे, तुम मुझे न देख पाओगे. अगर तुम भीतर की आंख से देखते हो तो ही मुझे पाओगे.

तब यह शरीर सिर्फ घर रह जाएगा, ऊपर के वस्त्र, और भीतर के चैतन्य का आविर्भाव होगा. अगर तुम सिर्फ कानों से सुनते हो बाहर के, तो तुम मेरे शब्द सुन पाओगे; और अगर भीतर का कान तुम्हारा जागा हो, तब तुम मेरे अर्थ को समझ पाओगे. क्योंकि शब्द तो खोल है, शरीर है; अर्थ, आत्मा है.

तुम जितने गहरे हो, उतना ही गहरा तुम देखोगे, उतना ही गहरा तुम सुनोगे, उतना ही गहरा तुम्हारा सारा अनुभव होगा. तुम अगर छिछले हो, तो अनुभव बहुत गहरा न पाएगा.

झेन कथा है कि एक सदगुरु अपने शिष्य के पास गया. वह बाहर ही बैठा था. सदगुरु ने पूछा, सत्य क्या है? उस शिष्य ने मुट्ठी बांधकर बताई. सदगुरु वापस लौटने लगा और उसने कहा कि पानी बहुत उथला है, बड़े जहाज यहां न रुक सकेंगे.

शिष्य बड़ा दुखी हुआ, और उत्तर तो उसने बहुत सोच—समझकर दिया था. वहीं तो भूल हो रही थी. उसने सुन रखा था कि जब यह गुरु लोगों से कुछ पूछता है, तो यह शब्दों में उत्तर नहीं चाहता.

और उसने पुरानी कहानी सुन रखी थी. कि फलां शिष्य के पास गया तो उसने मुट्ठी बांधकर बता दी और इसने कहा कि ठीक. क्योंकि मुट्ठी बांधने का मतलब है एक; पांच नहीं; पंचतत्व नहीं, एकत्व; पांच इंद्रियां नहीं एक आत्मा.

सो, सुन रखी थी कहानियां तो उसने भी मुट्ठी बांध के बताई लेकिन वह मुट्ठी झूठी थी, उसके भीतर एक नहीं था. उस मुट्ठी में पांच थे. क्योंकि मुट्ठी उतनी ही गहरी हो सकती है, जितना उसका अनुभव था.

वह जानता तो इतना था कि पांच सच है. एक की बात तो सुनी थी, उधार थी, बासी थी, अपनी न थी. तो गुरु ने कहा, यह जगह बहुत उथली है, और बड़े जहाज यहां न रुक सकेंगे. बड़ा पीड़ित हुआ शिष्य, बड़ा दुखी हुआ.

वर्षों के बाद फिर आया. उसने फिर मुट्ठी बांधी. गुरु ने कहा, खूब! खूब खुदाई की. पानी खूब गहरा कर लिया! जब जहाज रुक सकता है.

देखने वालों को बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि दोनों बार एक ही बात हुई थी – वह मुट्ठी बांधी गई थीं; पहली दफे भी और दूसरी दफे भी. लोगों ने गुरु से पूछा कि हम कुछ समझे नहीं, रहस्य कर दिया पहेली बना दी. पहली बार भी इस शिष्य ने यही मुट्ठी बांधी थी. इसलिए बीस साल बाद दुबारा आने की जरूरत थीं?

गुरु ने कहा, इस बार मुट्ठी में पांच नहीं, एक है. तब मुट्ठी में पांच थे. मुट्ठी दिखती थी बंधी है, भीतर खुली थी. अब मुट्ठी बाहर ही नहीं बंधी है, भीतर भी बंध गई है. अब इसकी मुट्ठी में अर्थ है. अब यह मुट्ठी प्रतीक नहीं है, अनुभव है.

शब्द तो वही हैं, प्रतीक वही हैं; लेकिन जैसे ही तुम बदल जाते हो, तुम्हारे शब्दों का अर्थ बदल जाता है – तुम्हारे जीवन के ढंग तुम्हारे जीवन की सुरभि बदल जाती है. सब कुछ वैसा ही रहता है, फिर भी कुछ भी वैसा नहीं रह जाता.

सब कुछ ऊपर-ऊपर वैसा ही होगा. तुम कभी बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओगे, कभी तुम्हारे भीतर का कबीर भी जागेगा ही. आखिर कितनी देर लगाओगे.

सब ऊपर-ऊपर ऐसा ही होगा, जैसा आज है – दुकान जाओगे, घर काम करोगे, बच्चों का पालन-पोषण करोगे, भूख लगेगी; खाना खाओगे; नींद लगेगी, सोओगे; सब ऊपर-ऊपर वैसा ही होगा – पहली मुट्ठी!

लेकिन भीतर-भीतर सब बदल जाएगा – दूसरी मुट्ठी! तुम बदल जाओगे. और तुम्हारे बदलने के साथ जीवन के सारे अर्थ और जीवन का सारा काव्य, जीवन की सारी प्रतीति बदल जाएगी.

ओशो, घूंघट के पट खोल रे, सातवां प्रवचन

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY