सोनिया राज में अमीर और अमीर हो रहे थे, गरीब और गरीब

आंकड़ों के साथ समस्या यह है कि बिना सन्दर्भ के उनका कोई आस्तित्व, कोई अर्थ नहीं है.

अब अंतरराष्ट्रीय NGO ऑक्सफैम के हवाले से दी गयी खबर को ही लीजिये, जिसके अनुसार पिछले वर्ष भारत में हुयी संपत्ति वृद्धि (ना कि कुल संपत्ति) का 73% प्रतिशत एक फीसदी अमीर लोगों को चली गयी.

पहली बात. ऑक्सफेम की रिपोर्ट में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि 73% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को चली गयी.

बल्कि उनकी रिपोर्ट यह कहती है कि उन्होंने एक सर्वे किया था (कुल दस देशों में 70000 लोगों से प्रश्न पूछा गया था; यह नहीं पता कि भारत के सवा सौ करोड़ में से कितने हज़ार लोगों से प्रश्न पूछा गया).

इसके अनुसार भारत में दो-तिहाई उत्तरदाताओं का मानना है कि अमीर और गरीब के बीच के अंतर से तत्काल निपटना चाहिए. इस सर्वे के अनुसार, 83 प्रतिशत भारतीय इस बात से सहमत हैं कि भारत में अमीर और गरीब के बीच की खाई बहुत बड़ी है.

अब आते हैं मुद्दे पर. यह समाचार कि 73% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को चली गयी, पूरी तरह गलत है.

चौकिये नहीं…! इस खबर का स्रोत Credit Suisse कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट है, जो पिछले वर्ष नवंबर में जारी हुई थी.

ऑक्सफेम की रिपोर्ट में Credit Suisse के आंकड़ों का उल्लेख है, लेकिन फिर भी यह नहीं लिखा कि भारत में 73% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को चली गयी.

Credit Suisse के अनुसार, वर्ष 2017 के दौरान भारत में 45% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को मिली. फिर से पढ़िए, 45% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को मिली, जबकि 73 प्रतिशत संपत्ति वृद्धि दस फीसदी अमीर लोगों को चली गयी.

लेकिन मैंने तो ऊपर लिखा है कि बिना सन्दर्भ के आंकड़ों का कोई अस्तित्व, कोई अर्थ नहीं है.

तो, सन्दर्भ क्या है?

Credit Suisse की वर्ष 2012, 2013 और 2014 की तीन अलग-अलग रिपोर्टो के अनुसार, भारत में 49% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को मिली, जबकि 74 प्रतिशत संपत्ति वृद्धि दस फीसदी अमीर लोगों को चली गयी.

ध्यान दीजिये उस समय किसकी सरकार थी? मोदी जी ने वर्ष 2014 आधा बीत जाने के बाद सत्ता संभाली थी.

इसी प्रकार वर्ष 2015 में, 53% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को मिली, जबकि 76 प्रतिशत संपत्ति वृद्धि दस फीसदी अमीर लोगों को चली गयी. सन 2016 में, 58% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि पर एक फीसदी लोगों ने कब्ज़ा कर लिया, जबकि 81 प्रतिशत संपत्ति वृद्धि दस फीसदी लोगों ने शेयर कर ली.

लेकिन वर्ष 2017 में, 45% प्रतिशत संपत्ति वृद्धि एक फीसदी अमीर लोगों को मिली, जबकि 73 प्रतिशत संपत्ति वृद्धि दस फीसदी अमीर लोगों को चली गयी.

इस सन्दर्भ से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

यही कि सोनिया राज में अमीर और अमीर हो रहे थे, गरीब और गरीब. लेकिन, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, असमानता में तेजी से कमी होनी शुरू हो गयी है.

2016 की तुलना में वर्ष 2017 में एक फीसदी लोगों का संपत्ति वृद्धि में शेयर सीधे-सीधे 13 प्रतिशत कम हुआ है. यह संभव हुआ है प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों के द्वारा जिसमें विमुद्रीकरण, टैक्स रिफॉर्म, स्वच्छता अभियान, आधार, सब्सिडी में चोरी रोकना, इत्यादि शामिल है.

आने वाले समय में इन नीतियों के द्वारा संपत्ति का ट्रांसफर गरीबों की तरफ होगा, जिससे असमानता में और कमी आएगी.

इन आंकड़ों को आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बधाई और हमारे समर्थन के पात्र है.

लेकिन सन्दर्भ अभी भी अधूरा है. लंदन स्थित पत्रकार Ian Birrell के अनुसार, विश्व में असमानता के दुष्परिणामों की बीन बजाने वाले ऑक्सफ़ैम के अमेरिका स्थित मुखिया को प्रति वर्ष 3.5 करोड़ रुपये से अधिक का वेतन पैकेज मिलता है. इस NGO ने अकेले अमेरिका में 13 वरिष्ठ स्टाफ को 70 लाख रुपये प्रति वर्ष वेतन पर रखा है.

ऐसे ही ढकोसलो और असमानता के बारे में प्रचार करके ऑक्सफ़ैम अधिक से अधिक चंदा इकठा करता हैं, अपनी प्रोफाइल बनाता है.

गरीबी उद्योग – poverty industry – में आपका स्वागत है.

अब आप समझे क्यों राहुल गाँधी ब्रिटैन के विदेश मंत्री को गरीबी भ्रमण पर अमेठी ले गए थे?

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