जीवन से संवाद : ककनूस

जिज्ञासा- आपकी प्रोफाइल से आपको समझ नहीं पा रहा हूँ. अपने बारे में कुछ बताइए ?

पिपासा- मेकिंग इंडिया ऑनलाइन अखबार चलाती हूँ, माँ जीवन शैफाली नाम ओशो से दीक्षा के बाद मिला है….

जिज्ञासा- ओह दीक्षा लेने के बाद नाम बदलना पड़ता है

पिपासा- नाम मिलता है आपकी मर्जी है ये तो कि आप उसे स्वीकार करते हैं या नहीं …

जिज्ञासा- ओशो के ज्ञान के बारे में कुछ बताइए ?

पिपासा- मैं? मैं कहाँ जान पाउंगी उनका ज्ञान… मैं तो खुद अभी तक अज्ञानी हूँ…

जिज्ञासा- तो फिर किस बात से प्रभावित होकर आपने दीक्षा ली. मतलब कोई कारण तो रहा होगा?

पिपासा- हाँ केवल चेहरा देखकर मुग्ध हो गयी थी मैं तो…

जिज्ञासा- किसका ?

पिपासा- ओशो का

जिज्ञासा- चेहरे में ऐसा क्या लगा?

पिपासा- चेहरा अपने जैसा लगा… और आत्ममुग्ध हो गयी.

जिज्ञासा- आपके जैसा कहाँ है ओशो का चेहरा? और किसी पर मुग्ध होने का मतलब उसका चेला बन जाना भी नहीं होता?

पिपासा- मैं बाहरी आवरण की बात नहीं कर रही… मुझे तो अपना ही चेहरा दिखाई देता है उनमें … और अपने प्रति समर्पण में यह नहीं देखा जाता कौन गुरू कौन चेला …. मुझसे कई लोग पूछते हैं आप ओशो को फॉलो करती हैं और मेरा जवाब होता है नहीं वो मुझे फॉलो करते हैं…. ‘जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो’… की तरह….

जिज्ञासा- बड़ा अजीब है.. एक वो संदेश जो है ओशो का मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा कि संभोग से भोग की ओर या शायद मुक्ति की ओर?

पिपासा- जो अजीब लगे उसके बारे में ज्यादा विचार नहीं करना चाहिए… आपका सरल सुन्दर जीवन है आप उसे ही पूरे वर्चस्व के साथ जी लीजिये… ये तो कभी न ख़त्म होने वाली कथा है…

जिज्ञासा- इस बात से मैं सहमत हूं लेकिन संभोग वाली बात से आप कितनी सहमत हैं?

पिपासा- मेरे सहमत असहमत होने से क्या फर्क पड़ता है…

जिज्ञासा- मेरे जैसे लोगों पर आपके सहमत और असहमत होने से पूरा फर्क पड़ता है. क्योंकि आप महिला हैं और विचार संभोग से जुड़ा है. इस विचार से महिलाओं को ही बड़ा नुकसान है?

जिज्ञासा- क्या हुआ आप खामोश क्यों हो गई?

पिपासा- ओह!!! फिर तो मैं आपको धर्म संकट में नहीं डालूँगी… धन्यवाद … आपके विचार जानकार खुशी हुई… ये संवाद हम यहाँ अधूरा छोड़ दें तो बेहतर होगा… ये संवाद ख़त्म नहीं हुआ… जारी रहेगा लेकिन यहाँ नहीं ज़रा सा इंतज़ार कीजिए…

और फिर मैं अपनी वाल पर लौट कर आई तो किसी ने मुझे टैग करते हुए ये पोस्ट डाल रखी थी…

“मैं तुम से कहना चाहता हूं कि जब तक हम कामवासना को पूर्णरूप से स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक कोई भी व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता, क्योंकि धर्म उसी कामवासना की ऊर्जा का रूपांतरण है. कामवासना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, कामवासना को तो स्वीकार करना ही होगा.

कामवासना का रूपांतरण जरूर संभव है. लेकिन कामवासना का रूपांतरण केवल तभी संभव है जब वह हमारे अस्तित्व की गहन स्वीकृति से आता हो. अगर हम प्रकृति को स्वीकार कर लें, तो फिर वह पूरी तरह से बदल जाती है. प्रकृति को अस्वीकार करने में ही सभी कुछ तिक्त
और कडुवा हो जाता है; और तब हम अपने ही हाथों नर्क का निर्माण कर लेते हैं… – OSHO…

मैं इसे ही जादू कहती हूँ ….. मेरे छोटे से छोटे वैचारिक मतभेद से लेकर बड़ी से बड़ी लड़ाई मेरे बदले ये कायनात लड़ती है…

मैं जानती हूँ जिज्ञासा कभी ख़त्म नहीं होती… एक बात पर संतुष्ट हो भी जाए तो दूसरी राह निकाल लेती है….

लेकिन पिपासा तो वो अमर पक्षी ककनूस (Phoenix) है… जो जानना नहीं चाहता वो तो अपनी प्यास को अग्नि बनाकर खुद ही जल जाता है उसमें…

और जन्म देता है अपनी ही राख से एक नया शरीर नई आत्मा के साथ……….

– शैफाली से माँ जीवन शैफाली बनने की राह पर एक ककनूस

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