जब तक अलग से प्रार्थना करनी पड़े, तब तक आपको प्रार्थना का स्वाद ही नहीं लगा

महाकवि रिल्के का जीवन मैं पढ़ता था.

रिल्के के जीवन में उनके मित्रों ने उल्लेख किया है कि रिल्के अपना जूता भी उतारता था, तो इतने मैत्री— भाव से, कि आप अगर देखते, तो लगता कि रिल्के अपने जूते के साथ प्रेम में है.

वह अपने कपड़े भी उतारता, तो इस भाव से, जैसे कपड़े जीवंत हों, जैसे कपड़ों की आत्मा हो.

ऐसा नहीं कि कपड़े उतारे और फेंक दिए. वह कपड़ों को सम्हालता.

वह घर में पैर रखता, तो ऐसे जैसे कि जीवंत घर में प्रवेश कर रहा हो; जैसे जरा भी बेहूदे ढंग से चलेगा, तो घर को चोट पहुंचेगी.

रिल्के फूल को पौधे से तोड़ नहीं सकता था. फूलों का प्रेमी था.

फूलों के पास जाता, उनसे दो शब्द कहता, उनसे नमस्कार कर लेता, उनसे दो बातें भी कर लेता, लेकिन तोड़ना असंभव था.

हमें यह आदमी पागल लगेगा, क्योंकि जूते को क्या सदव्यवहार की जरूरत है!

हम पूछेंगे कि जूते को क्या सदव्यवहार की जरूरत है! जूते को उतारकर फेंका जा सकता है.

मकान में प्रवेश करते समय मंदिर में प्रवेश कर रहे हों, ऐसे भाव रखने की क्या जरूरत है! मकान मकान है, मंदिर मंदिर है.

लेकिन ध्यान रहे, हम जो भी करते हैं, वह हमें निर्मित करता है. और जिंदगी में बड़े-बड़े काम ज्यादा नहीं हैं.

चौबीस घंटे तो छोटे—छोटे काम हैं. जूता उतारना है, भोजन करना है, कपड़े पहनना है, स्नान करना है, मकान में आना है, दुकान में जाना है. मंदिर तो आप कभी-कभी जाते हैं.

और ध्यान रहे, जो अपने मकान में निरंतर गैर-प्रार्थनापूर्ण ढंग से गया है, वह मंदिर में लाख कोशिश करे, प्रार्थनापूर्ण ढंग से नहीं जा सकेगा, उसकी आदत नहीं है.

और जिसने अपने मकान को मकान समझा है, वह मंदिर को भी मकान से ज्यादा कैसे समझ सकता है! वस्तुत: मंदिर भी मकान ही है, नाम भर मंदिर है.

अगर मंदिर को मंदिर बनाना हो, तो हर मकान को मंदिर बनाना होगा, तभी यह संभव है. तब मकान मिट जाएंगे, तब सभी मंदिर हो जाएंगे.

और जब आप हर मकान में मंदिर की तरह प्रवेश करेंगे, यह प्रवेश आपकी वृत्ति को बदलेगा. यह प्रवेश आपके भाव को बदलेगा. यह प्रवेश आपको निर्मित करेगा.

फिर आप जहां भी जाएंगे, वह मंदिर हो, कि मस्जिद हो, कि गुरुद्वारा हो, कि साधारण मकान हो, कि एक झोपड़ा हो, कि महल हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

सवाल मकानों का नहीं है, सवाल आपका है. सवाल कहां आप प्रवेश करते हैं, इसका नहीं; कौन प्रवेश करता है, इसका है.

अगर आपने जूते प्रेम से उतारे हैं, कपड़े सदभाव से रखे हैं, वस्तुओं से भी मैत्री का व्यवहार किया है, यह सारा व्यवहार आपको रूपांतरित करेगा. यह आपकी शैली बन जाएगी.

जीवन के प्रति प्रेम का जो व्यवहार है, उस शैली को मैं प्रार्थना कहता हूं. और अगर हम चौबीस घंटे उसमें डूब सकें, तो ही, तो ही जीवन में क्रांति हो सकती है. इसलिए प्रार्थना कोई खंड नहीं है, कोई अंश नहीं है, कि आपने किया और निपट गए.

लोग प्रार्थना कर रहे हैं, पर उनके जीवन में प्रार्थना का कोई सुर सुनाई नहीं पड़ता, क्योंकि प्रार्थना को उन्होंने एक काम बना लिया है.

वे सुबह पांच मिनट बैठकर प्रार्थना कर लेते हैं. अगर जल्दी हो, तो पांच मिनट की प्रार्थना वे दो मिनट में कर लेते हैं.

अगर फुरसत हो, कोई काम न हो, तो दस मिनट भी कर लेते हैं. लेकिन प्रार्थना उनके जीवन की आधारशिला नहीं है, हजार कामों में एक काम है.

और अगर प्रार्थना हजार कामों में एक काम है, तो प्रार्थना हो ही नहीं सकती. और परमात्मा अगर हजार खोजों में एक खोज है, तो उस खोज का कोई उपाय नहीं है. जिस दिन प्रार्थना ही जीवन की विधि हो जाए…

कबीर को किसी ने पूछा है कि अब तुम सिद्ध हो गए, अब तुम यह कपड़ा बुनना बंद कर दो. क्योंकि कबीर जुलाहे थे और जुलाहे बने रहे. और तुम कपड़ा बुनने में लगे रहते हो, फिर कपड़ा बुन कर बेचने जाते हो बाजार में, तुम्हें समय कहां मिलता है? प्रार्थना-पूजा…..!

तो कबीर ने कहा कि जो भी मैं कर रहा हूं वह प्रार्थना है; जो भी मैं कर रहा हूं वह पूजा है! जब मैं कपड़ा बुनता हूं तो मैं परमात्मा को बुन रहा हूं. जब मैं कपड़ा बेचता हूं तो मैं परमात्मा को बेच रहा हूं. जब मैं बाजार जा रहा हूं तो मैं राम की तलाश में जा रहा हूं जिसको कपड़े की जरूरत है. इसलिए अलग से प्रार्थना करने का क्या अर्थ है!

जब तक अलग से प्रार्थना करनी पड़े, तब तक जानना, प्रार्थना का स्वाद आपको लगा नहीं.

जिस दिन प्रार्थना जीवन की शैली हो जाए; आप जो करें, वह प्रार्थनापूर्ण हो, प्रेयरफुल हो; जो करें, उसमें से परमात्मा की तरफ आपका बहाव हो; जो करें, उसमें परमात्मा का स्मरण हो; कुछ न भी कर रहे हों, तो उस न—होने के क्षण में भी परमात्मा की मौजूदगी हो.

ऐसी सुरति से जो जीएगा, वह एक दिन परमात्मा तक पहुंच जाता है, ऐसा नहीं, एक दिन परमात्मा हो जाता है.

– ओशो, गीता दर्शन

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