अंतिम यात्रा पर पहला क़दम

उस सिरफिरे ने जब उस देवी को देखा
तो उसका चेहरा दहकते हुए अंगारे सा हो गया

आने वाली चाँद रातों की खूबसूरती का ख्याल
उसके चेहरे पे गुलाबों की सी नक्कासी कर गया
वो थोड़ा शरमाया, मुस्कुराया
जानते हुए भी कि उस देवी तक पहुँचने के लिए
उसे लांघना पड़ेगा अंगारों से दहकता हुआ
ज़मीं का एक टुकड़ा

जैसे लोग करते हैं मन्नत माँगने से पहले या फिर पूरी होने के बाद
और फिर उस पार इतना वक़्त भी नहीं होगा
कि वो बैठ कर कुछ पल निहार सके
पलोस सके अपने पाँव के छालों को

उसे जल्द से जल्द वक़्त की गिरफ़्त में पड़ी
उस देवी को मुक्त कराना होगा
न सिर्फ वक़्त से मुक्त
पर मुक्ति से उत्पन्न ग्लानि से भी मुक्त

देवी है पर भूल गई है अपना होना
आह! कितनी सुन्दर है, कितनी नादान, कितनी भोली
उसे सोच कर ही कहर बरपा है मुझ पर
मिलेगी तो न जाने क्या होगा

उसने अपने जूतों के फ़ीते खोले
अपने पाँव धोए साफ़ निर्मल जल से
और चलना शुरू कर दिया दहकते हुए अंगारों पर…

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