कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

ma jivan shaifaly gujrat yatra making india

किताबों में लिखे हरूफ को वजूद में बोने के लिए आँखों का पानी देना होता है, लेकिन ज़िंदगी की किताब में लिखे जाने वाले अक्षरों को, घटनाओं को जब साक्षी भाव का पानी मिलता है, तो बीज सिर्फ ज़िंदगी के वजूद में नहीं, समय की साँसों में भी पड़ जाते हैं.

फिर वो समय जिस जिस काल से गुज़रता है, उस उस काल में उन घटनाओं से नए संस्कारों के बीज पनपते हैं, उसी से आने वाले समय की फसलें निर्धारित होती है.

जीवन में घट रही घटनाओं को वे दोनों साक्षी भाव से देख रहे थे, और उसे उसी तरह स्वीकार कर रहे थे जिस तरह से आने वाली साँसों को और जाने वाले समय को किया जाता है.

प्रेम के उन अद्भुत क्षणों में जब एक के बदन से निकलता पानी दूजे के वजूद की माटी पर पड़ता तो वो सौंधी कच्ची मिट्टी घड़ों में तब्दील हो जाती, जिसे दोनों उस आग के हवाले कर देते जिसे जीवन कहा जाता है.

इश्क़ का न जाने कैसा जादुई पानी था उन घड़ों में कि जब भी कोई अंतर की प्यास लिए उसमें झांकता भी, तो उसकी प्यास उसके वजूद की साक्षी हो जाती… बस मृग को जब पता चल जाए कि कस्तूरी उसकी नाभि में है तो उसकी तो सारी तृष्णा वहीं समाप्त हो जाए.

जब अंतर की प्यास के दर्शन हो जाए तो अस्तित्व को स्वीकार का पानी मिल जाता है. और जब अस्तित्व को स्वीकार का पानी मिल जाता है तो वह किसी समय या काल का मोहताज नहीं होता, फिर जब भी कोई फूल खिलता है, जब भी कोई बीज अंकुरित होता है, तो अस्तित्व को काया मिल जाती है और प्रकृति में एक ऐसा स्थान जहाँ हर कोई उसे परमात्मा की अद्भुत रचना के रूप में स्वीकार करता है.

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लेकिन जानकी के अंतर की प्यास को न जाने कौन से ऋषि का श्राप था कि वो जानकी से अहिल्या बन गयी थी. पत्थर सी उस अहिल्या ने अपने राम का एक काल्पनिक रूप गढ़ लिया था.

उसकी अपनी नाभि में छुपी गंध से वो बौराई हुई थी… उसकी आत्मा पर प्रेम का न जाने कौन सा जंगली फूल खिल गया था जिसे कभी काया नहीं मिली… चेहरा नहीं मिला…

वो उसके घर के सामने से निकलते हर आने आने वाले में अपने राम का रूप देखती… उसके पीछे पागलों की तरह दौड़ती… उसके बाबा हर बार उसे खींच कर घर ले आते… जानकी कब निकलोगी इस काल्पनिक दुनिया से.. जिसे खोज रही हो ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर है ही नहीं…

तुमने कब कैसे उसे गढ़ लिया तुम्हें खुद ही याद नहीं… और जो रूप तुमने गढ़ा है वो तुम्हें पहचानता तक नहीं… उस बेचारे ब्राह्मण का धर्म क्यों भ्रष्ट करती हो… वो सच में तुम्हें नहीं जानता…

और जिसे तुम जानती हो ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर है ही नहीं, तुम्हारे स्वप्न लोक से निकली कहानियां है जो तुम्हारी ही कल्पनाओं का जाल है जो तुम दिन भर बुनती रहती हो…

ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं इस धरती पर, तुम अपनी ही कल्पनाओं के मायाजाल में फंस चुकी हो… तुमको पता है ना तुम जो चाहती हो अस्तित्व तुमको देता जाता है…

तो मेरे राम को क्यों नहीं देता… – बस एक करुण आर्तनाद जानकी के गले में सिसकी बनकर अटक गया…

क्योंकि उसे तुम्हारी कल्पनाओं ने गढ़ा है इसलिए वो तुमको आभासी स्तर पर ही मिलता है… हकीक़त में ऐसा कोई व्यक्ति होता तो ज़रूर आता…

नहीं… माया ठगनी इतना बड़ा मज़ाक नहीं कर सकती मेरे साथ..

जानकी, आँखें खोलो और स्वप्न की दुनिया से बाहर आओ… राम की कहानी जो 2017 में ख़तम हो चुकी है उसे तुम 2018 में अपनी ज़िद के कारण खींच कर ले आई हो…
जब खुद ही उसे माया ठगनी कहती हो तो उससे ठगे जाने में क्या आनंद आ रहा है तुमको…

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जानकी को यकीन ही नहीं आता था… जो स्वप्न वो देख रही थी खुली आँखों से, वो दिखने वाले दृष्यों से अधिक स्पष्ट थे. पिछले जन्म की झलकियाँ, कभी पुत्र के रूप में, पिता के रूप में कभी किसी बहुत करीबी रिश्ते के रूप में…

हाँ कभी उसे प्रेमी के रूप में नहीं देखा किसी स्वप्न में… लेकिन इस बार उसे लगता था उसके बदन में एक नहीं दो रूहें रहती हैं… दो बदन एक रूह उसने बहुत सुना था लेकिन अपने एक बदन में दो लोगों को वो साक्षात देख पा रही थी…

वो कैसे बताती अपने बाबा को माया ठगनी जिस रूप में बार बार उसके सामने उसे ला रही थी वो दुनियावी आँखों से नहीं देखा जा सकता… उस पर माया की पट्टी बंधी होना ज़रूरी है… और ज़रूरी है उस न दिखाई देने वाले इश्क के प्रति समर्पण… जिसके आगे वो बार बार झोली फैलाए खड़ी हो जाती थी…

और वो निर्मोही हर बार अजनबी बनकर उसके प्रेम का तिरस्कार कर देता… मैं नहीं जानता देवी आपको, आप कौन हैं.. क्यों बार बार मेरे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जाती हैं…

मैं तुम्हारा 2017 वर्ष पुराना प्रेम हूँ… जानकी की आँखों में याचना के आंसू भर आये थे…

वो ठहाके मारकर हंसने लगा… और आप चाहती हैं कि मैं आपके इस पागलपन में आपकी हाँ में हां मिलाऊँ??

नहीं मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती… मैं चाह भी कैसे सकती हूँ… मेरी उम्र और तुम्हारी उम्र में 800 वर्ष का फासला है..

मैं बहुत पुरानी आत्मा हूँ तुम इस आधुनिक युग की युवा चेतना…

अब अचंभित होने की बारी उस ब्राह्मण की थी… आप सच में पागल तो नहीं? किस भाषा में बात करती हैं आप? इतने वर्षों का हिसाब किसे याद रहता है भला?

मुझे… और मुझे ये भी पता है ये मेरा अंतिम जन्म है… और इस अंतिम जन्म का समापन सूत्र तुम्हारी नाभि में बंद है…

देखिये देवीजी मुझे आपकी कोई बात समझ नहीं आ रही…

जी… कोई बात नहीं… यह कहकर जानकी वापस अपनी दुनिया में लौट गयी… फिर कुछ नए चेहरे बनाए उनसे अपने प्रेम का इज़हार किया… और घने जंगल में किसी पुराने तालाब पर खिले श्वेतकमल को तोड़ लाई…

अब इसका क्या करोगी जानकी … बाबा ने प्यार से पूछा

उसे कमल का फूल बहुत पसंद है… इसमें उसके लिए एक घर बनाऊँगी…

बाबा उसके पागलपन को दिन ब दिन बढ़ते हुए देख रहे थे… वो कभी राधा की तरह उसकी बांसुरी की धुन के पीछे दौड़ पड़ती, कभी मीरा की तरह किसी कमल के फूल में उसकी तस्वीर उकेर कर भक्ति में लीन हो जाती…

जानकी को यकीन ही नहीं आता था कि उसकी काल्पनिक दुनिया का उसका प्रेमी वास्तविक दुनिया में कहीं नहीं है… जो है वो उसके युग में नहीं आ सकता… और उसके आधुनिक युग में प्रवेश करने की जानकी को अनुमति नहीं थी…

अनुमति? किसने नहीं दी अनुमति?

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माया ठगनी ने जानकी को रोक रखा था… ये तुम्हारा अंतिम जन्म है उसके युग में प्रवेश करने से तुम उसे हमेशा के लिए खो दोगी… उससे अंतिम बार मिलना है तो उसे तुम्हारे युग में आना ही पड़ेगा…

माँ …. मैं कैसे लाऊंगी उसे अपने युग में… वो तो मुझे पहचानता भी नहीं…

अपनी सारी कला, अपनी सारी योग्यता.. अपना सबकुछ दांव पर लगाना होगा… मान सम्मान सामाजिक प्रतिष्ठा, अपनी पहचान… प्रेम का रास्ता प्रतीक्षा और पीड़ा से होते हुए ही परमात्मा तक पहुँचता है…

उसे अपने युग में लाकर करूंगी भी क्या… उसे पाना मेरा उद्देश्य नहीं… उसको पाकर ऐसा क्या मिल जाएगा जो मेरे पास उसके शारीरिक रूप से उपस्थित होने पर नहीं है…

मुक्ति…

फिर ये तो मेरा स्वार्थ हुआ… मेरी मुक्ति के लिए उसे क्यों परेशान करूं..

वो उसका धर्म है… अपनी नाभि में स्थित मुक्ति का अमृत जब वो तुमको देगा तभी तो उसकी मुक्ति की राह खुलेगी… उसकी अपनी यात्रा तुम्हारी मुक्ति से जुड़ी है…

किससे बातें कर रही हो जानकी… बाबा ने उसे यूं आँखें बंद कर उसे बुदबुदाते देखा तो पूछा…

माँ आई है… कह रही है मुक्ति का समय आ चुका है मुझे जाना होगा…

कहाँ जाओगी?

नदी के उस पार जहाँ क्षितिज पर धरती और आसमान का आभासी मिलन होता है…

कैसे जाओगी जानकी तुम्हें तो तैरना भी नहीं आता… और पता है ना वो नदी श्रापित है जो उसमें नाव लेकर जाता है डूब जाता है… … तुम्हें तो कोई नाव भी ना मिलेगी…

प्रेम नदी में नाव से कौन जाता है बाबा… फिर उस नदी को श्राप मुक्त भी तो करना है… वो नदी श्राप मुक्त होगी तो मेरे राम को इस युग में आने की राह मिल जाएगी… मैं तो उसके युग में जा नहीं सकती….

बस इतना कहते कहते वो नदी की ओर नंगे पाँव ही चल पड़ी…

बाबा को लगा रोज़ की तरह पगलाई हुई है… कुछ देर में लौट आएगी हमेशा की तरह… उन्होंने उसे जाने दिया…

जैसे जैसे जानकी के पाँव नदी की तरफ बढ़ते… उसके पैरों के निशान पर पीछे छूटी ज़मीन पर छोटे छोटे केसरिया फूल उग आते..

नदी किनारे पहुँच कर एक नज़र भर वो क्षितिज की तरफ देखती है और अपने ईष्ट को याद करते हुए उस नदी में उतर जाती है…

लोग कहते हैं… उस नदी से उस दिन कोई प्रकाश पुंज निकलकर आसमान की तरफ गया था… अब उस नदी में कोई नाव नहीं डूबती…

जानकी की जल समाधि से नदी श्राप मुक्त हुई… अब कोई भी उस नदी से होकर 2017 वर्ष पुराने युग में प्रवेश कर सकता है… प्रेम के फूल चुनकर अपने युग में ले जा सकता है…

इश्क़ का न जाने कैसा जादुई पानी था उस नदी में कि जब भी कोई अंतर की प्यास लिए उसमें झांकता भी, तो उसकी प्यास उसके वजूद की साक्षी हो जाती… बस मृग को जब पता चल जाए कि कस्तूरी उसकी नाभि में है तो उसकी तो सारी तृष्णा वहीं समाप्त हो जाए.

जब अंतर की प्यास के दर्शन हो जाए तो अस्तित्व को स्वीकार का पानी मिल जाता है. और जब अस्तित्व को स्वीकार का पानी मिल जाता है तो वह किसी समय या काल का मोहताज नहीं होता, फिर जब भी कोई फूल खिलता है, जब भी कोई बीज अंकुरित होता है, तो अस्तित्व को काया मिल जाती है और प्रकृति में एक ऐसा स्थान जहाँ हर कोई उसे परमात्मा की अद्भुत रचना के रूप में स्वीकार करता है.

लेकिन वो ब्राह्मण आज तक अचम्भित है… वो जैसे ही उस नदी पर जाता है… नदी पत्थर की हो जाती.. वो नए युग का राम है जिसके छूने से अहिल्या पत्थर हो जाती… यह उसका 2018वां जन्म था… वो अब कभी 2017 में प्रवेश नहीं कर सकता था…

लेकिन नदी के पत्थर पर वो कुछ पंक्तियाँ लिख जाता…. लोग उसे पगला कवि कहते हैं… जिसकी कवितायेँ अब अश्लील और झूठी कही जाती हैं… क्योंकि उसने जीवन के सबसे बड़े सच को स्वीकार नहीं किया… राम को उसका धर्म याद दिलाने वाला कोई विश्वामित्र नहीं मिला था उसे…

वो अपनी मुक्ति के लिए हर 2017 वर्ष के बाद जन्म लेता, उस नदी तक आता और अपने ही लिखे शिलालेख पर पिछले जन्मों की स्मृतियों को जीवित करता…

नदी उसे चुपचाप देखती रहती… यह भी नहीं बता सकी कि राम की नाभि में जो अमृत जानकी के लिए था, वो उसने राम की मुक्ति के लिए ही छोड़ दिया था…

इतिश्री

– माँ जीवन शैफाली

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