एक सांड़ की कथा

सन 1907 में एक गणितज्ञ फ्रांसिस गॉलटन ने 787 ग्रामीणों से गाँव के मेले में एक सांड़ के वजन का अनुमान लगाने को कहा.

उनमें से कोई भी सही जवाब नहीं दे पाया. लेकिन जब गॉलटन ने उनके अनुमानों का औसत किया, तो उन्होंने पाया कि भीड़ के अनुमानित वजन का औसत (543 किलो) सांड़ के वास्तविक वजन (543.4 किलो) के बहुत करीब था.

कुछ साल बाद के मेले में तराजू खराब हो गयी. लेकिन मेले के आयोजको ने सोचा कि चूंकि भीड़ सांड़ के वजन का अनुमान लगा लेती है, अतः तराजू की रिपेयर में पैसा लगाना आवश्यक नहीं है.

भीड़ के द्वारा सांड़ के वजन के औसत को ही उस पशु का वास्तविक वजन घोषित कर दिया जाएगा और उसी के हिसाब से पुरस्कार दे दिए जाएंगे.

लेकिन अब एक नई समस्या खड़ी हो गयी. कुछ लोगों ने यह ताड़ लिया कि अब सांड़ को तौला नहीं जाता; तो क्यों ना इस अब के मालिक को कुछ पैसा देकर उस जानवर का वजन का पता कर लिया जाए.

अब इससे उनका अनुमान भीड़ के अनुमान के आस-पास होगा और उनके इनाम जीतने की संभावना बहुत अधिक हो गई थी.

लेकिन एक अन्य समस्या उत्पन्न हो गई. जब कुछ ही लोगों को इनाम मिलने लगा तो मेले के कर्ताधर्ताओं ने बेईमानी को रोकने के लिए कुछ नए नियम बना दिए.

मेले में अपने सांड़ को “तुलवाने” वाले किसान को अब सांड़ के तबेले के बाहर हर महीने एक कागज पर यह जानकारी लिखकर चिपकाना होगा कि सांड़ ने कितने किलो भूसा खाया और कितना किलो गोबर किया, जिससे सभी को वजन का अनुमान लगाने में कोई अनुचित लाभ ना मिले.

सांड़ के जानकार चौधरियों ने अब एक नया बिजनेस ढूंढ निकाला.

उन्होंने सांड़ के वजन का अनुमान लगाने की कंसल्टेंसी खोल ली और अपने क्लायंट को सांड़ के गोबर का घनत्व, उसके भूसे में मिले पानी का अनुपात, और उसमें कितना खली मिला है, कितना घी, इस बारे में सलाह देने लगे और इसके बदले उनसे फीस लेते थे.

कुछ कंसल्टेंट तो और आगे बढ़ गए. उन्होंने सांड़ के मालिक को शराब और पैसे का लालच देना शुरू कर दिया जिससे कि वह सांड़ के बारे में अधिक जानकारी एकत्रित कर सकें जैसे कि उसने कितने समय खुले आसमान के नीचे घास चरी और कितने लीटर मूता.

चूंकि सांड़ को तौला नहीं जा रहा था, तो वजन का उचित आकलन आवश्यक नहीं था. बल्कि यह गेस करना था कि अन्य लोग सांड़ के वजन का क्या अनुमान लगाएंगे? या यूँ कहिये कि लोग अन्य लोगों के अनुमान के बारे में क्या अनुमान लगाएंगे?

कई लोग जो सांड़ का अनुमान ठीक से नहीं लगा पा रहे थे वे सरकार के पास शिकायत करते हुए गए कि देखिए सांड़ का वजन करने में धोखा किया जा रहा है. तो सरकार ने नियम बना दिया कि जो लोगों का अनुमान होगा वही सांड़ का वास्तविक वजन माना जाएगा.

बड़े-बड़े गणितज्ञ, चार्टर्ड अकाउंटेंट, पत्रकार, सब के सब सांड़ के वजन का अनुमान लगाने में व्यस्त हो गए. सांड़ के वजन का अनुमान पता करना ही बहुत बड़ा उद्योग बन गया और अरबों रुपये के वारे-न्यारे, लाभ-हानि इस मेले में होने लगा.

फिर एक दिन सांड़ मर गया.

लेकिन अनुमान लगाने वाले उद्योग ने सोचा कि जनता को क्या पता चलेगा. जनता है, वह सांड़ पे पैसा लगाती रहेगी.

फिर एक दिन जनता को भी पता चल गया कि सांड़ तो मर गया है. लेकिन तब तक जनता का पैसा डूब गया था, जबकि अनुमान लगाने वाले एक्सपर्ट अरबपति बन कर कहीं और चले गए.

यही हमारे शेयर बाजार की कहानी है, जिसमें कंपनी जैसे सांड़ों के वजन का अनुमान जनता लगाती है.

यही जवाब है मेरी पोस्ट कि “क्या उपभोक्ता की कोई वैल्यू नहीं है?” पर आये कमेंट का कि उनका (सांड़ों के मालिकों) क्या है? सब पब्लिक का है.

पब्लिक के पास एक मरा हुआ सांड़ है.

यह लेख मेरा मूल विचार नहीं है. इसकी प्रेरणा मैंने अर्थशास्त्री – जॉन के – के लेख से ली है जो मैंने कई वर्षो पहले पढ़ा था और जो उपरोक्त कमेंट से याद आ गया.

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