किस्सा ए हिजरा

ये लंबा लेख तो बस किस्से की पहली किस्त है.

14 अगस्त, 1920 को खैबर दर्रे के गेट पर गजब नजारा था. रंगबिरंगे झंडों, बैनरों, गाजे बाजे और हथियारों से लैस सात हजार पख्तून अफगानिस्तान में घुसने के लिए गेट पर चपे हुए थे.

उधर 50 के करीब अफगानी गार्ड दहशत में थे लेकिन हिम्मत बांध के चेतावनी दिए जा रहे थे… पीछे हटो वर्ना गोली मार दी जाएगी.

पर वहां से थोड़ी ही दूर के कस्बे लैंडी कोटल से आए पख्तून कोई कम बांके तो थे नहीं.

जवाब भी करारा मिलता… ज़रा चला के तो दिखाओ, एतना गोली मारेंगे कि मचान से नीचे जा के गिरोगे.

पठानों के ज़ोर से लगता था कि गेट अब टूटा तब टूटा. खबर काबुल तक पहुंच गई थी. समझौता वार्ता हुई.

शर्त रखी गई कि जो मुहाजिरीन अफगानिस्तान जाना चाहते हैं, शौक से जाएं पर अपने खर्चे से. अफगान सरकार से कोई मदद नहीं मिलेगी.

शर्ते मान ली गईं और गेट खोल दिया गया. फिर क्या था… नारे तस्बी, अल्ला हो अकबर के जयकारों के साथ भीड़ एक झटके में दारूल हर्ब में दाखिल हो गई.

यह भीड़ हिजरा (या हिजरत भी कहते हैं) के इरादे से अफगानिस्तान जा रही थी जिसकी परंपरा उनके मिलिटरी कमांडर के समय से ही है जब उन्होंने पहली बार अपने गृह नगर मक्का से मदीना की यात्रा की थी.

मामला यह है कि इस्लाम में मान्यता है कि अगर कहीं काफिरों के खलल से आपको दीन की रिवायतों पर मुकम्मल अमल में कोई परेशानी है तो जगह बदल लें.

किसी दारूल हर्ब या सुरक्षित जगह हिजरा पर निकल जाएं और वहां जिहाद की तैयारी करें. तैयारी मुकम्मल हो जाने के बाद हमला करें और गाज़ी व शहीद बनने का लाभ प्राप्त करें.

खैबर दर्रे पर रोके जाने से लैंडी कोटल के इन जांबाजों का गुस्सा भड़कना स्वाभाविक था. आखिरकार वे हिजरा करने जा रहे थे और दारूल हर्ब में दाखिल होने से कोई मना कैसे कर सकता था. फिर उन्हें तो न्योता भी अफगानिस्तान के अमीर ने ही दिया था.

पर अफगानों की मजबूरी थी कि इससे पहले ही इतने मुहाजिरीन वहां पहुंच चुके थे कि उसका खजाना खाली हो चुका था. ऐसे में अब और मुहाजिरीनों की देखभाल कर पाना उसके लिए मुश्किल हो चुका था.

और हिजरतियों की यह भीड़ कोई पर्यटन के लिए नहीं जा रही थी. इसकी जड़ें तुर्की में खिलाफत के खात्मे के विरोध में जारी खिलाफत आंदोलन में थी. इसके बौद्धिक अगुवा थे अपने कांग्रेसी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद साहब.

मौलाना साहब खिलाफत के खात्मे से बेहद आहत थे. उन्हें लगता था कि उम्मा अब लीडरलेस हो गई है, इसे सही रास्ता दिखाने के लिए एक नेतृत्व बहुत जरूरी है.

अपने ज़माने के इस्लाम के सबसे आला विद्वान मौलाना आज़ाद को मुसलमानों का एक बड़ा तबका इमाम-उल-हिंद घोषित कर उन्हें अपना आध्यात्मिक नेता बनाना चाहता था. मौलाना साहब भी इसके लिए उत्सुक थे पर इस बाबत मुसलमानों में आपसी सिरफुटौव्वल देख उन्होंने कदम खींच लिए.

वैसे मुसलमानों में हिजरत की चर्चा पहले से चल रही थी पर निशाने पर कौन हो, इस पर एका नहीं था. कुछ मौलाना हिंद के बजाय तुर्की को लेकर ज्यादा फिक्रमंद थे. वो चाहते थे कि मुहाजिरीनों को हिजरत पर भेजा जाए ताकि वे तुर्की के हक में लड़ें और खिलाफत की बहाली करें.

दूसरा धड़ा मिजाज से हमारे जैसा राष्ट्रवादी था. वो चाहता था कि मुहाजिरीनों की इस फौज की मदद से अंग्रेजों को भारत से उखाड़ फेंका जाए.

अगरचे यह कोई बड़ा मतभेद नहीं था. बाद में भी तय हो जाता कि पहले खिलाफत लाएं या अंग्रेजों को भगाएं. एक बात पर एका ज़रूर था… हिजरा करने अफगानिस्तान ही जाएंगे क्योंकि आस-पास दारूल हर्ब वही है.

उधर, अफगानिस्तान का राजा अमानुल्ला भी अपनी गोटी फिट कर रहा था. एक तरफ सोवियत फौजें सुरसा की तरह मुंह फैलाए जा रही थीं तो दूसरी तरफ अंग्रेज झपट्टा मारते ही रहते थे.

बीच में पिस रहे अमानुल्ला को इस्लाम और अल्ला का ही सहारा था. इसलिए उसके प्रोपेगंडा अखबारों ने भारतीय मुसलमानों को हिजरत का न्योता देना शुरू कर रखा था.

उनके इशारे थे कि भारत में इतने मुसलमान हैं कि उनकी मदद से अफगान अमीर आराम से नौ लाख मुसलमानों की फौज खड़ी कर अंग्रेजों को भारत से भी भगा सकता है और खिलाफत भी बहाल करवा सकता है.

इसी दरम्यान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद साहब की एंट्री होती है. 28-29 फरवरी 1920 को कलकत्ता में खिलाफत कांफ्रेंस के दौरान उन्होंने कुरान और हदीथ के हवाले से हिजरा की अवधारणा को विस्तार से पेश किया.

हालांकि उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों को हिंदुओं से कोई परेशानी नहीं है क्योंकि मुसलमानों के प्रति उनका रवैया हमेशा से भाईचारे का रहा है. पर अंग्रेज इस्लाम के दुश्मन है और अगर किसी मुसलमान को दीन पर खतरा लगता है तो वे हिजरत के लिए आज़ाद ही नहीं हैं बल्कि उन्हें जाना ही चाहिए.

आज़ाद ने मानों मुसलमानों की दुखती रग पर हाथ रख दिया. मौलाना के बयान के बाद हिजरा की तैयारियों ने जोर पकड़ लिया और हिजरत कमेटियां गठित होने लगीं.

उधर, अफगानी अमीर ने 9 फरवरी, 1920 को अपने पिता की पुण्यतिथि पर खेल किया और अफगानिस्तान के सभी मुसलमानों से खिलाफत की बहाली के लिए विशेष प्रार्थना करने को कहा. साथ में यह भी जोड़ दिया कि इस नेक इरादे से जो भी अफगानिस्तान में आना चाहता है, उसका खैरमकदम है.

विवाद भड़कता देख अंग्रेजों ने अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मोहम्मद तारजी को बातचीत के लिए मंसूरी बुलाया. तारजी ने अंदरखाने अंग्रेजों से सौदेबाजी की कोशिश की पर बात नहीं बनी. तारजी ने फिर मंसूरी की लंडूरी मस्जिद में खुतबा किया और कहा कि जो भी हिजरत के लिए अफगानिस्तान आना चाहते हैं उनका स्वागत है.

बस अब रास्ता साफ था. मुसलमानों ने बैठक कर अफगानी अमीर को दीन के मदद के लिए आगे आने पर धन्यवाद और बधाईयां दी. कुछ तो इतने उतावले थे कि मीटिंग में कफन भी साथ लाए थे कि अब या तो हिजरा पर जाएंगे या कब्र में.

धड़ाधड़ हिजरत कमेटियां गठित होना शुरू हो गईं. खिलाफत वाले ढिठाई से झूठ बोलते रहे पर खिलाफत कमेटियों के दफ्तर पर ही रातोंरात हिजरत कमेटियों के बोर्ड लग गए. हम अभी तक हाफिज सईद पर पिले रहते हैं कि लश्कर ए तैयबा, कभी जमात उद दावा हो जाता है तो कभी फलाह ए इंसानियत.

पर इसके बावजूद शुरुआती दिनों में हिजरत का कारवां मद्धिम ही रहा. अब हिजरत कमेटियों ने सब्जबाग दिखाने शुरू किए… देखो मोमिनों, अफगानिस्तान में दाखिल होते ही मुहाजिरीनों के लिए जाबेल-उस-सराय में ठिकाना बनाया जाएगा. पूरा इलाका आपका होगा. शुरू के तीन महीने अफगानिस्तान की इस्लामी हुकूमत आपकी सिर्फ मेहमानवाजी करेगी. फिर जब आप अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे तो देखेंगे कि आप किस तरह से इस्लाम की खिदमत कर सकते हैं (यानी बकरा काटने लायक हैं या आदमी).

मासूम मोमिनों को लगा कि हिजरा पर जाना सदेह स्वर्ग जाने जैसा है और अफगानिस्तान में दूध-दही की नदियां बहती हैं. हिजरा को वैसे भी हज से कही बड़ा माना जाता है क्योंकि हाजी तो ज्यादातर मुसलमान बन जाते हैं. हिजरा का शबाब नसीब वालों को ही मिलता है.

फिर भी आखिर में मई में हिजरा ने जोर पकड़ा जब सिंध के एक जमींदार ने 14,500 रुपए में ट्रेन बुक कराई और एलान किया कि 1338 मुहाजिरीन हिजरा के लिए तुंरत अफगानिस्तान रवाना होने को तैयार है.

बताते चलें कि इतने ही लोग रसूल के साथ हिजरत के लिए मक्का से मदीना रवाना हुए थे. दुधमुंहे बच्चों और महिलाओं से भरी इस ट्रेन का रास्ते में जगह-जगह जोरदार स्वागत हुआ.

उधर, मौलाना आज़ाद ने हिजरा को पवित्र कर्तव्य बताते हुए फतवा भी जारी कर दिया जो ‘हिजरा का फतवा’ शीर्षक से 30 जुलाई, 1920 को अमृतसर से प्रकाशित उर्दू अखबार ‘अहले हदीथ’ में छपा.

इसके बाद कौम में उबाल आ गया. जहां पहले रोजाना 20-30 मुहाजिरीन हिजरा पर रवाना होते थे, अब वो तादाद सैकड़ों और फिर हजारों में पहुंच गई.

उधर, सिखों का अखबार ‘द सिख’ लगातार चेतावनी दिए जा रहा था… मुसलमानों, इन अफगानों, बद्दुओं या तुर्कों पर सिर्फ मुसलमान होने के नाते भरोसा मत कर लेना. तुम मजहबी जुनून में देश के साथ धोखा कर रहे हो और जल्द तुम्हें अपनी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ेगा.

‘द सिख’ की बात 100% सही साबित हुई. कैसे? ये अगले भाग में

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