तोगड़िया चाहें तो भी उन्हें हथियार नहीं रखने देंगे उनके ग्रह

ये प्रवीण तोगड़िया जी की कुण्डली है. कुण्डली में लग्नेश गुरू और पंचमेश चंद्रमा का जबरदस्त राजयोग सिंह राशि में बना है. राशि स्वामी चन्द्रमा और जीवकारक गुरू दोनों मघा नक्षत्र पर गजकेसरी योग का निर्माण कर रहे हैं.

मघा का अर्थ होता है अति बलशाली और महत्वपूर्ण. यह नक्षत्र किसी न किसी प्रकार की ताकत तथा प्रभुत्व के साथ जुड़ा होना दर्शाता है. इसका प्रतीक चिन्ह राजसिंहासन माना गया है.

सिंह राशि का स्वामी सूर्य और उसके अन्तर्गत मघा जैसे नक्षत्र से संबंध व्यक्ति को प्रभुत्व, शासन, शक्ति का केन्द्रबिन्दु बना देता है.

इस नक्षत्र के प्रभाव से जातक अपनी संस्कृति और परंपराओं का न सिर्फ सम्मान करनेवाला होता है बल्कि वह दूसरों से भी बलात् इसका पालन करवाने पर आतुर हो जाता है.

इस कुण्डली में गुरू और सूर्य का महापरिवर्तन योग भी बना हुआ है. छठे और दसवें भाव के बीच गुरू और सूर्य जैसे ग्रहों के बीच बने इस परिवर्तन योग ने उन्हें राजनीतिक क्षितिज में एक चमकता नक्षत्र के रूप में स्थापित कर दिया.

इसी योग ने उन्हें राजनीति का अपराजेय योद्धा बना दिया. इस राजयोगकारक ग्रहों की दशा भी उन्हें युवावस्था में ही मिल गयी, इसी कारण उन्हें कम उम्र में ही अपार सम्मान और सफलता मिली.

चन्द्रमा और केतु का आपस में नक्षत्र परिवर्तन हुआ है. यह दर्शाता है कि उनकी हिन्दुत्व के लिए कट्टरता नैसर्गिक है, उसमें तनिक भी मिलावट नहीं है. जीवकारक गुरू भी केतु के ही नक्षत्र में है.

ऐसे कुण्डली वाले ही हिन्दुत्व के धर्म-ध्वजा वाहक हो सकते हैं. जब तक किसी के प्रमुख ग्रहों का संबंध केतु से नहीं बनेगा, वो अपने धर्म के प्रति उन्मादी नहीं हो पायेगा. इस कुण्डली में तो गजकेसरी योग का निर्माण ही केतु के नक्षत्र मघा पर हुआ है, जोकि पराक्रम के भाव तृतीय में दबंगई से बैठा है.

इतना ही नहीं वो केतु मंगल और शनि जैसे दबंग ग्रहों से दृष्ट भी है. इन सब स्थितियों ने उन्हें दुस्साहस की पराकाष्ठा तक पराक्रमी बना दिया है.

उनकी अभी राहु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा चल रही है, जिसे बहुत अच्छा नहीं माना जा सकता. दक्षिण भारत के ज्योतिष ग्रन्थों ने पाराशरी नियमों के विपरीत यहाँ तक कह दिया है कि भले ही राहु और शुक्र पाराशरी नियमों से राजयोगकारक हों तब भी इसकी दशा में जातक अपनी स्थिति से च्युत हो जाता है.

इनका तो शुक्र अष्टमेश और तृतीयेश होकर एकादश भाव में बैठा है और मंगल और शनि द्वारा बुरी तरह प्रभावित है. शुक्र केतु और मंगल अधिष्ठित राशियों का स्वामी है.

तृतीय भाव और भावेश शुक्र को मंगल और शनि देख रहे हैं. आठवां घर नष्ट का है और तीसरा घर स्वयं अपने हाथों द्वारा अर्थात जातक स्वयं के कृत्यों से स्वयं के प्रतिष्ठा हनन पर आतुर है.

चन्द्रमा और केतु का नक्षत्र परिवर्तन ऐसे दुस्साहसिक निर्णय तीव्रता से लेने के लिए अनुकूल स्थिति बना रहा है. वैसे भी मघा एक उग्र और सक्रिय नक्षत्र है. इसके प्रभाव से अच्छा या बुरा फल अत्यंत तीव्रता से घटित होती है. ये बहुत कम समय में शीर्ष पर पहुँचा देता है और वैसे ही क्षणमात्र में विपत्तियों में फंसा देता है.

दसवें भाव में धनु राशि के जन्मकालीन सूर्य पर अभी हाल तक बुध, शुक्र, सूर्य और शनि का प्रभाव था. तब तक तो सब इनके कंट्रोल में रहा, पर जैसे सूर्य आगे मकर राशि की यात्रा पर निकला, इनके जन्म के सूर्य को शनि ने अपने प्रभाव में ले लिया और ऐसी स्थितियाँ बन गई है कि इनका मानभंग किया जा रहा है.

लग्नेश गुरू का तुला राशि पर से गोचर भी कष्टप्रद है, जहाँ जन्म का मंगल बैठा है और जो कुण्डली का आठवां घर है. वैसे भी जन्म के गुरू से तीसरे घर में गुरू का गोचर अच्छा नहीं माना जाता.

इस साल सितम्बर के बाद गुरू का गोचर वृश्चिक राशि में होगा, जहाँ उनका जन्मकालीन शनि और राहु विराजमान है. ये स्थिति भी बहुत खतरनाक है. जैसे उनके ग्रह हैं वे शांत बैठनेवाले नहीं हैं.

जो ऐसे ग्रहों के प्रभाव में जीवन गुजार चुका हो, वो राजनीति के किसी और सशक्त नक्षत्र के उदित होने पर भी हार नहीं मान रहा है, क्या ये उसका दोष माना जाए?

वे चाहें तो भी उनके ग्रह उन्हें हथियार नहीं रखने दे रहे हैं. जो इस सत्ता संघर्ष में नहीं हैं, जिन्हें पराजय का दंश नहीं झेलना पड़ रहा है वो उसे ललकार रहे हैं कि तू सरेंडर कर क्यों नहीं रहा है?

जबकि अगर हम ईमानदारी से बात करें तो व्यक्तिगत जीवन में हम सभी अपने समकक्षों से पराजित होकर जीना नहीं चाहते, अपने प्रतिद्वंदी को येन केन प्रकारेण परास्त कर देने को लालायित रहते हैं, फिर हम दूसरे पर अति नैतिकता किस मुँह से थोपते हैं?

इनकी कुण्डली बता रही है कि ये असली में हिन्दू शेर हैं, जो केवल भाषणों में ही नहीं बल्कि जब भी हिन्दुओं को जरूरत पड़ेगी, ये प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने की लड़ाई में भी साथ देने से पीछे नहीं हटेंगे.

जब दो बड़े भाइयों में जंग छिड़ा हो तब छोटे भाइयों का काम, शक्ति और सत्ता पर काबिज भाई के पक्ष में गुटबाजी करना नहीं है बल्कि दोनों के प्रति सहानुभूति रखते हुए, मौन हो जाना है.

वे दोनों रणबांकुरे भाई अपनी जंग स्वयं लड़ने में सक्षम हैं. उन दोनों का जंग हिन्दुत्व का नुकसान भले करे या न करे पर हम लोगों का दो गुटों में बंटना नि: संदेह हिन्दुओं के विनाश का मार्ग प्रशस्त करेगा.

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