अपने दौर में खारिज होता हुआ सरक आया हूँ मैं हाशिए तक

कवि के पास होना चाहिए
जितना आत्मविश्वास
उससे एक बटा दो कम है मेरे पास
लेखक के पास होनी चाहिए
जितनी गहराई और रहस्यता
उससे एक तिहाई भी नहीं मेरे पास

समीक्षक के पास होनी चाहिए
जितनी निर्ममता
उसका एक अंश भी नहीं मेरे पास

मंच पर पहुंचते ही लड़खड़ा जाती है
मेरी ज़बान
विचार, शब्द, मीमांसा और सम्वेदना से
हो जाता हूँ रिक्त

पत्रिकाओं के पतें तक नहीं
रख पाता सम्भाल कर
सम्पादकों से नहीं मिल पाता
राजकीय अतिथि गृहों में

नहीं पढ़ा किसी नामी विश्वविद्यालय में
ना ही मेरा कोई गुरु चोटी का साहित्यकार है

बुरे वक्त पर हर किस्म की मदद करने वाले
अच्छे दोस्तों को
मेरी वाणी में व्यंग्य होने की स्थाई शिकायत है
उन्हें लगता है
अपने मामूली जीवन में
कुछ ख़ास न कर पाने की खीज है मेरे अंदर

जब दुनिया से नहीं बनती तो
उखड़ कर सबकों गरियाने लगता हूँ एकतरफा

ना मैं खुद को बदल पाया
ना अपने आसपास की दुनिया को
नितांत ही निजी समस्याओं और संघर्षों के पुराण बांच
मैं हासिल करता आया हूँ सहानुभूति
यह एक आम राय है मेरे बारे में

अपने दौर में खारिज होता हुआ
सरक आया हूँ मैं हाशिए तक

बावजूद इतने नंगे सच के
दुस्साहस की सीमा तक
निर्बाध हो लिखता हूँ
कविता गद्य और समीक्षा

भले ही उनमें साहित्यिक गुणवत्ता का अभाव हो
छपना तो दूर वो विद्वानों के पढ़ने के स्तर की भी न हो
मगर फिर भी वो पढ़ी और सराही जाती है
पहुंच जाती है अपनी मंजिल तक
अपनी अधिकतम यात्रा तय करके

यह देख
मैं हंस पड़ता हूँ खुद के पागलपन पर
इस तरह से हंसना
मेरे जीवन का एकमात्र मनोरंजन है
जो थकने नहीं देता मुझे।

डॉ. अजित

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