आइये जानें मकर संक्रांति कैसे बना ईसाइयों का बड़ा दिन

अभी मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया गया. आपके पास भी संदेश आए होंगे कि सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर रहा है. एक तरफ हम भूगोल से पढ़ते हैं कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है. जब सूर्य स्थिर है तो वह कैसे अपना स्थान बदलता है. यहीं पर एक और प्रश्न उठता है कि राशियों की आकृति ऐसी क्यों है. Zodiac sign अँग्रेजी ने नाम बदल रहे हैं परंतु उनका आकार वही है ऐसा क्यों?

आइये इसको समझते हैं दरअसल पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक तथाकथित वर्ष में या 365 दिनों में करती है परंतु फिर यह पता चला कि एक परिक्रमा में 365 से कुछ अधिक समय लगता है. इसके लिए हर चौथा वर्ष leap year बना दिया गया इसके बाद जब इससे भी पूरी गिनती नहीं हुई तो हर 400 वर्ष के बाद का वर्ष leap year नहीं रखा गया.

वास्तव में हम वर्ष के दिनों के हेरफेर से अपने आपको प्रकृति के काल चक्र के साथ चलना चाहते हैं. अब क्योंकि 365 दिनों या एक वर्ष में 12 महीने बना दिये तो हमने पृथ्वी की चाल के 12 विभाग किए. अब इसका राशि से क्या रिश्ता है यह समझें.

सूर्य के अतिरिक्त और भी बहुत से ग्रह और नक्षत्र इस सौर मण्डल में हैं और वह सब भी चलायमान है. परन्तु वास्तव में आकाश में तारों के जो कई समूह हैं, जो एक विशेष आकृति बनाते हैं और इन्ही आकृतियों पर राशियों का नाम रखा गया है.

जैसे मेष राशि की आकृति मेढ़े के समान होती है. वृष राशि की आकृति वृष अर्थात बैल के समान मानी गई है. मिथुन राशि एक युवक और एक नवयुवती का जोड़ा है जिनके हाथ में वाद्दयंत्र हैं. कर्क राशि केकड़े की आकृति के समान है. सिंह राशि शेर के जैसे आकार की है.

एक वर्ष के उपरांत वही परिस्थिति तारा मण्डल की बनती है. परंतु यहाँ पर एक अंतर है कि भारतीय दिनदर्शिका या पंचांग (calendar) के अधिकांश तिथियाँ चन्द्र की तिथियों पर हैं. केवल कुछ ही त्यौहार सौर वर्ष या सौर तिथियों पर है.

अब जब चन्द्र की दिनदर्शिका को सूर्य की दिनदर्शिका (calendar) से तुलना की जाये तो थोड़ा अंतर है. इसलिए कि दोनों कि गतियाँ अपने आप में स्वतंत्र है और प्रकृति ने यही बनाई है. इसलिए प्रतिवर्ष उदाहरणार्थ मकर राशि मे सूर्य के प्रवेश में 20 मिनट का अंतर है.

इसके कारण आप समझ सकते हैं कि लगभग एक घंटे का अंतर प्रति तीन वर्षों में हो जाएगा. इसीलिए एक दिन को बदलने के लिए आपको 72 वर्ष लगेंगे. ऐसा इतिहास से पता चलता है कि अकबर काल में जो लगभग 400 वर्ष पहले था, यह मकर संक्रांति 9-10 जनवरी को था. इस प्रकार यह बदलती रहती है. इसी गणना से 2080 को यह मकर संक्रांति 15 जनवरी होगी.

अब इसके एक व्यावहारिक पक्ष को समझें. इस देश का लगभग प्रत्येक त्यौहार व्यावहारिक रहा है. इस से पहले जब सूर्य धनु राशि में है जो कि पौष का महीना या है इसमें ठंड या सर्दी अधिक होने के कारण लोग घर में ही केन्द्रित रहते हैं. इसीलिए आप देखेंगे कि इस माह में कहीं विवाह इत्यादि संस्कार नहीं होते हैं. लोगों ने उसे तारा डूबना नाम दे दिया है. अब लोहड़ी के दिन के बाद यह मान कर कि अब शीत का प्रकोप कम हो जाएगा.

सब कृषक मिल कर नए चावल और दाल की खिचड़ी बना कर प्रसाद ग्रहण करते हैं. इस कृषक प्रदेश में सब काम भगवान या देवता के आशीर्वाद के बाद किए जाते हैं, तो वही इस मकर संक्रांत और लोहड़ी का प्रयोजन है. यह भी आप देखें क्योंकि उत्तर भारत मे सर्दी अधिक के कारण लोहड़ी अधिक है बाकी सब जगह मकर संक्रांत विभिन्न नामों से है. और लगभग हर जगह कृषक के उत्पाद का ही प्रसाद है.

अब आइये जानें इसका संबंध क्रिसमस से कैसे हैं. मकर राशि के बाद अब दिन बड़े होने लगेंगे और सर्दी का प्रकोप कम हो जाएगा. लोग अपने कामों मे फिर से एक माह बाद लगेंगे. जो गिनती आपने की है उससे यह गणित आप लगा सकते हैं कि लगभग 1700 वर्ष पहले मकर संक्रांत लगभग 20 दिन पहले यानि 25 दिसंबर के समय होती थी. यह दिन क्योंकि महत्वपूर्ण था तो किसी विदेशी संस्कृति नें उसे अपने राज्य में ईसा मसीह का जन्म दिन मानना शुरू किया.

इस बात के प्रमाण भी हैं कि लगभग चौथी शताब्दी में ईसा के जन्म को मान लिया गया है. इसे उसी समय से बड़े दिन की संज्ञा दी गयी. कालांतर में बदलते बदलते मकर संक्रांत भारत का त्यौहार भारत का और क्रिसमस अंग्रेजों का बन गया. अब विदेशियों ने भारत में आ कर 25 दिसंबर से अधिक प्रचारित किया और हमारे तथाकथित विदेशियों से प्रभावित संस्कृति को अपनाने वालों ने आज 25 दिसंबर को महान दिवस मान लिया है.

आशा है कि कुछ हम लोग अब फिर से अपने त्यौहारों के औचित्य को और व्यावहारिकता को समझेंगे.

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