शीतल बने आग चन्दन के जैसी राघव कृपा हो जो तेरी…

बचपन में कभी माँ को दिया-बत्ती करते नहीं देखा, घर में सिर्फ मेरी दादी सुबह शाम भगवान के आगे दिया-अगरबत्ती लगाती, मंदिर जाती, मंदिर का प्रसाद हम सब में बांटती… इन दोनों बातों का प्रभाव मुझ पर पड़ा…

माँ की तरह कभी पूजा पाठ नहीं किया… गायत्री मंत्र तक बच्चों ने सिखाया जब वे स्कूल से सीखकर आये. लेकिन दादी की आस्था मेरे अवचेतन मन में संग्रहित होती रही…

पापा और भाइयों को तो कभी भगवान के सामने तो क्या किसी के सामने हाथ जोड़ते नहीं देखा… स्वाभिमान शायद वहीं से पाया. समर्पण और प्रेम मैंने शायद पिछले जन्मों के पुण्य प्रताप से पाया…

खैर फिर घर में हम 40 लोगों का संयुक्त परिवार था तो गुजरात से नई बहुएं आई और लाईं नए रीति रिवाज. वो कुछ भी खाने पीने से पहले भगवान का नाम लेतीं… स्वामी नारायण, राधा श्री कृष्णा, सीता श्री राम जैसा ही कुछ… हम घर के बच्चों के लिए ये सबकुछ बहुत नया और मज़ेदार था. तो उनको देखा देखी हम भी शुरू हो गए.

सबने अपने अपने हिसाब से ऊपर लिखे नाम चुन लिए. मैंने चुना सिर्फ “राम”. साल भर के लिए यह व्रत रखा. शायद उसी का पुण्य प्रताप है कि ये राम नाम मेरी आत्मा में बहुत गहनता से जुड़ा है. कहते हैं सबके अपने अपने ईष्ट होते हैं. अपने व्यक्तित्व, साधना और अंतर्चेतना के प्रभाव में उसका झुकाव उस ओर अपने आप ही हो जाता है. ऐसे में मुझे राम नाम और राम के भजन बचपन से बहुत पसंद थे.

एक भजन जो बचपन से सुनती आई हूँ आज भी भावातिरेक में होती हूँ तो ध्यान बाबा मेरे लिए वो भजन लगा देते हैं. हृदय में जैसे भक्ति की कोई धारा फूट पड़ती है जो आँखों से बह जाती है.

सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल आये तरुवर की छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया… मेरे राम…

आप लोगों ने भी बहुत बार सुना होगा. शर्मा बंधुओं की आवाज़ में एक बार फिर सुनिए मेरे जीवन का भजन, ‘परिणय’ फिल्म से… शीतल बने आग चन्दन के जैसी राघव कृपा हो जो तेरी…

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