Padman : प्रकृति की सृजन प्रक्रिया पर सार्थक सामाजिक पहल

फिल्में समाज का आईना होती हैं या समाज फिल्मों की परछाई. कहना मुश्किल है. स्त्रियों की दशा, दिशा पर खूब फिल्में बनीं हैं, भुनाई गई हैं. पर ये पहला मौका है जब स्त्री की असल दशा को प्रभावित करने में फिल्म का कंटेंट, बस कंटेंट ही अपने आप में सक्षम है. वरना जिंदगी की आधारभूत जरूरतों को हाशिये पर रखने के बजाय मेनस्ट्रीम में बात की जा सके बस इस कोशिश से परहेज रख कर जवान लड़की या लड़का होना रूमानी होने और ख्वाबों में डूब कर मर जाने की पहली और आखिरी शर्त थी जैसे.

जैसा कि अंदाज अनायास ही लगाया जा सकता है कि पैडमैन फिल्म की कहानी तमिलनाडु के अरुनाचलम मुरुगनांथम की कहानी पर आधारित है. एक ऐसा पुरुष जिसने स्त्री की रोज की समस्या, वास्तविक समस्या को समझा और उसका हल निकालने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया.

पैडमैन फिल्म को लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं. नहीं पता कि यह फ़िल्म कैसी बनी है. पटकथा कसी हुई है कि नहीं. निर्देशन साधा हुआ है कि नहीं. अदाकारी के झंडे गड़े या नहीं. पर सिर्फ विषय, इसके विषय के लिए मैं चाहती हूँ कि हर पुरुष इस फिल्म को देखे. हर पिता, हर भाई, हर पति. सारे राग-द्वेष अपनी जगह पर यदि इस एक फिल्म के कारण समाज में इस विषय पर बात करने का माहौल बनता हो तो.

पहले तो हमारे समाज ने इस प्रक्रिया को घृणित इंगित कर के इसे लड़कियों की शर्मिंदगी का बाइस बनाया. जिसके कारण एक लड़की का रोजमर्रा का जीवन जटिल से जटिलतम की ओर धकेला जाने लगा. ये छुपाओ, ये न दिखाओ, सीमित संसाधनों में खुद को तकलीफ दो, अकेले ही माहवारी की समस्याओं से जुझो. आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते एक निम्न या निम्न मध्यम वर्ग की किशोर लड़की कैसे कैसे हालातों से उन दो चार दिनों में दो चार होती है. जानकारी और संसाधन का अभाव खराब स्वास्थ्य के साथ कभी कभी तो एक लड़की को जीवन भर के लिए माँ बनने के सुख से भी वंचित कर देता है.

आगे बढ़ें तो उच्च मध्यवर्ग, जहाँ बाजारवाद ने अपने पंजे गहरे जमा लिए हैं और जहाँ पर सेनेटरी पैड खरीदने की (विलासिता?) अफोर्ड की जा सकती हो वहाँ इन सेनेटरी पैड को हथियार बनाकर लड़की को सुपरवुमन बनाने की ओर धकेलने की एक अंधी प्रक्रिया चल रही है. आपने देखा होगा कि एक लड़की सफेद पैंट पहन कर पेड़ों के ऊपर से छलांग लगा कर फोटोग्राफी में अपना करियर बना रही है, एक औरत बच्चों के साथ फुटबॉल खेल रही है, दो सहेलियां फुसफुसा रही हैं.

क्यों पहनना है सफेद कपड़े? क्यों फुटबॉल खेलना है? जबकि बातें फुसफुसा कर ही करना है! क्यों लड़कों की भीड़ में कन्धा रगड़ कर शामिल होना ही है जबकि पैड के सहारे यह भी सुनिश्चित ही रखना है कि सफेद पैंट पर कोई लाल धब्बा न लगा हो. कैसा दोगलापन है ये?

सच तो यह है कि स्त्री को सुपरवूमेन बना देने के भयंकर अत्याचारी मुगालते के पर्दे के पीछे यथार्थ का एक बहुत ही कड़वा चेहरा है. क्या प्रकृति बिना सन्तति आगे चल जाएगी? महीने के दो दिनों का आराम आपको अगली स्वस्थ पीढ़ी से नवाजेगी यह समझना हमारे समाज के लिए इतना मुश्किल कब से हो गया?

द्रौपदी का चीरहरण प्रसंग यदि आपने पढ़ा, सुना हो तो याद करिये. द्रौपदी रजस्व्ला और एकवस्त्रा एकांत में आराम कर रही थी. जब दुःशाशन उन्हें जबरदस्ती घसीटता ले आया था. याद आया कुछ?

नहीं इस मुगालते में भी मत रहिये कि वह रानी थीं. हमारे समाज में उन दिनों दासियों और आम स्त्रियों के भी स्वास्थ्य, आराम और सुविधा का पूरा खयाल रखने की परंपरा रही है.

हाँ ये सच है कि कोई भी माँ, कोई भी पिता भले ही अपनी बेटी को प्रकृति की सृजन प्रक्रिया के दौरान आने वाले कष्टदायक, असुविधाजनक दिनों से नहीं बचा सकते. पर उन परेशानियों और परिस्थितियों में सम्बल तो प्रदान कर सकते हैं. और क्या यह सच नहीं कि एक कमरे के घर में पिता, भाइयों से छुपा-छुपा कर उन दो चार दिनों को काटने में एक लड़की को जितनी असुविधा होती है, जितनी ऊर्जा लगती है उसका कोई सार्थक इस्तेमाल समाज में बड़ा सहयोग दे सकता है!

और मैं तो कहती हूँ केवल पुरुष ही क्यों पैडमैन फिल्म तो हर औरत को भी देखना चाहिए. क्यों? क्योंकि पीढ़ियों से माहवारी, खून, अपवित्रता, सूतक, छुआछूत, निषेध का जो कचड़ा हमारे दिमागों में माँओं के द्वारा ही तो भर दिया गया है. पहले माँऐं तो उससे ऊपर उठ सकें. अंधविश्वासऔर हाईजीन व साफ-सफाई के अंतर को, उनके महत्व को समझें. स्वस्थ शरीर में भगवान का वास होता है, यह समझ सकें.

तभी तो बेटियों को स्वस्थ भविष्य दे सकेंगी. जीवन निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर स्वस्थ चर्चा का माहौल बन सकेगा. खुद भी जागरूक हों और अपनी बेटियों को अंधविश्वास और घृणा के मकड़जाल में न डालकर अपने शरीर को महत्व देना सिखा कर उन्हें आत्मविश्वास को घुट्टी की तरह पिला सकें.

दरअसल यही स्त्री के स्वस्थ शरीर और स्वस्थ जीवन का आधार है. ये जीवन का प्रथम सत्य है.

– कल्याणी मंगला गौरी

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