अगली पीढ़ी को बचा सकते हो तो बचा लो बॉलीवुड के ज़हर से

क्या स्त्री को लुभाने में पुरूष कुछ कम पुरूष हो गया है और इस कोर्टशिप कम्पटीशन के दौर में स्त्रियां भी कुछ कम स्त्रैण हो गई हैं?

प्रतिरोधी गुणों का विकास सभी जीवों की एक खास ईवाल्यूशनरी प्रक्रिया है. संभवतः यही वजह है कि लोगों को पहले प्रेम की विस्मृति नहीं होती और लंबे संबंधों में रूमानियत खत्म हो जाती है.

मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय पुरूषों की फर्टिलिटी और स्पर्म क्वालिटी विगत पचास वर्षों में पचास प्रतिशत तक कम हुई है. इनफर्टिलिटी सैंटर और जैन क्लिनिक्स, हाशमी दवाखानों पर बढ़ती भीड़ देखी जा सकती है.

ऐसा लगता है ह्यूमन कोर्टशिप बिहैवियर में भी आमूलचूल या चुल्ल (वही लड़की ब्युटीफुल कर गई चुल्ल टाईप) बदलाव आया है.

ई.बी.विल्सन की सोशियोबायलोजी पर कुछ किताबें पढ़ीं पिछले दिनों. वही मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है की तर्ज पर कि कैसे मानव एनाटामी और फिजियोलौजी मानव सामाजिकी और स्त्री पुरूष संबंधों, कोर्टशिप, पैरेंटिंग आदि को प्रभावित करता है.अवकाश में विस्तार से लिखेंगे.

इस बीच कभी कभी शाम सुबह कुछ पार्कों में टहल लेता हूं. वही प्रेम जो नितान्त वैयक्तिक दर्शन का विषय था अब सर्वसुलभ प्रदर्शन का विषय हो गया है. वसनहीन नवयुवतियां, अधकचरे मर्द, बहुत सारे ‘NERDS’ लज्जाहीन अश्लील हरकतें करते दिख जाते हैं. कम से कम प्रेम तो कतई नहीं वह सब.

एक नवयुवक जो अभी अपनी फिफ्थ हैंड प्रेमिका के साथ निजी कार्यों में व्यस्त था, अचानक से झगड़ने लगा है. मुद्दा ये है कि लड़के को उसका व्हाट्स ऐप चैक करना है. लड़की वैसे तो होशियार है आठ दस पासवर्ड की सैटिंग है… रोज ऐसे बेवकूफ बनाने वाले वार्तालाप डिलिट करने में डी.लिट कर रखा है.. फेसबुक कन्वर्सैसंश भी डिलिट कर देती है. सुरक्षित सारे मेरे काण्ड ऐप लाक ने किया कमाल. फिर भी डर है कि क्या पता एक आध रह गया हो.
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एक चिर चिरकुट चरणचुम्बक अपने से डबल डील डौल वाली थोड़ी रिच लुकिंग फैटी स्वीटी को रिझाने के लिए टैडी बियर और चाकलेट ले के आए हैं. लड़की का बर्थ डे है शायद ..वहीं नाचना भी स्टार्ट कर दिया है लौंडे ने. और ये ससुरे पलिहर के बानर घामे के मेघुचा की तरह तिरमिरा के पलट जाने को नृत्यकला कहते हैं.

एक साहब अपनी गर्लफ्रैंड से झगड़े जा रहे हैं कि तू मुझे बाबू बोलती थी तो फिर उसको क्यूँ बोला. वैसे इस शब्द का अचानक से इतना नया और व्यापक प्रयोग भाषा विज्ञानियों के साथ साथ मनोवैज्ञानिक शोध का भी विषय है. मैंने सुना कि इसकी व्युत्पत्ति के स्रोत कहीं ‘बबून’ में हैं.

एक साब अपनी माशूका के सामने लगभग भीख मांगने की स्थिति में गिड़गिड़ाते हुए शोना प्लीज… शोना प्लीज.. कर रहे हैं.. आग्रह इस बात का कि शोना इस पप्पेट को एक पप्पी रसीद कर दें. कुत्ते जैसी शकल हो गई है. वैसे ये शोना बिरादरी को ऐसे कुत्ते बड़े क्यूट लगते हैं. हो सकता है यह भी फेसबुक पर पाकिस्तान को दूध के बदले खीर देते हों.

प्रेम मे पुरूषों का व्यवहार देखकर लगता है जैसे कि प्रथम चुंबन स्त्री के गुलामी का एग्रीमेंट और प्रथम सहवास स्त्री के गुलामी की रजिस्ट्री है. बायलोजिकल साइंस के नजरिए से पड़ताल करेंगे किसी रोज़.

एक मोहतरमा अपने आशिक से लिपटी ही थीं कि शायद पिछले सेमेस्टर वाला मजनू जिसके साथ वाटर पार्क में एक दो बार तैरने के अलावा दस बीस फिल्में, देख चुकी थीं.. वहाँ से गुजरा.. मूड का डिमोनेटाइजेशन हो गया.

थोड़ा और आगे… दोनों की आंखों से गंगा जमुना बह रही हैं… जब सच मे प्यार हो जाता है तो रोमांस कम, रोना – धोना ज्यादा चलता है और प्रेम से यकीन उठता चला जाता है….

और हमारी लड़कियाँ कितनी आत्ममुग्ध होती जा रही हैं… फैमिनिस्ट लोग कभी सोचेंगे. स्त्री शरीर में कोई अदम्य आकर्षण तो है, तभी तो वह उसके मोह जाल से खुद भी मुक्त नहीं रह पाती.

एक चौथाई खुद को निहारने में, एक चौथी खुद को सजाने में, कुछ अवांछित पुरूषों से बचाने में बाकी बची कुछ वांछित पुरुष को रिझाने में खर्च हो जाती है. बेचारी के पास खुद के लिए कुछ बचता ही कहाँ है? बाकी ऊर्जा के साथ जैसे तैसे जिन्दगी पूरा करती है.

टी वी पर सात आठ साल के बच्चो -बच्चियों को ‘सैकंड हैंड जवानी’ ‘एक हो गये हम और तुम’, ‘यार को मैने मुझे यार ने सोने ना दिया’ जैसे गानों पर इरोटिक मूव करते हुए देखकर कलेजा बैठने लगता है. इस बारे में कोई बात नहीं करता ना महामानव जी ना कोई हिंदू हृदय सम्राट ना कोई धरती पुत्र.. ना शार्ट्स में संघी लड़कियां ढूंढने वाला भूकंप ना बी एम डब्ल्यू ना सदी का महानायक ना भारत रत्न…

लेख का रायता इसके कैनवास से बाहर तक फैल ग्यो है… एक छोटा निष्कर्ष कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे बाप दादा के टाइम की पैरेन्टिंग प्रैक्टिस ज्यादा बेहतर थी. और दूसरा कि-

अगली पीढ़ी को बचा सकते हो तो बचा लो बॉलीवुड के ज़हर से…..

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