‘सुवर-नामा’ के एक पाठक की अंतकथा

वह बहुत औपचारिक सा एकदम बुद्धिजीवी टाइप चेहरा ओढ़े रहता है. हर जगह ‘सहमति’ की घास चरते हुए लिखता है कि ‘भैया’ का लेखन बहुत सधा हुआ है. ऐसी पुस्तक आज तक नहीं आई. भैया की वाह-वाह, भैया की जय-जय! वह पक्का भैया-भक्त है उसके थैले में हमेशा ‘सुवर नामा’ की एक कॉपी रहती है भैया ने उसे ‘पक्कावाला’ जान कर ही एक स्वहस्ताक्षरित कॉपी दी थी और पैसे ले लिए थे!

हर जगह मारे-मारे फिरने के बाद जब एक दिन उसे लगता है कि उसकी उम्र अब हो चुकी, अंत करीब है और लोग भी उससे लगभग उब चुके हैं तो वह अपने आस-पास थोड़ी बहुत असहमतियों को तलाशता है और सोचता है कि थोड़ा सा यहाँ भी खुद को दर्ज कर लिया जाए.

वह तब चीखना चाहता है पर उसकी आवाजें तो पहले ही खर्च हो चुकी होती हैं. चोक कर गए गले से किसी तरह कुछ घुटी हुई ध्वनियां निकलती हैं और लोग हमेशा की तरह इन ध्वनियों को उसका सहमति-गान समझते हैं और यह उसका हमेशा का किस्सा समझते हुए आगे निकल जाते हैं.

वह घबरा का आईना देखता है तो पाता है कि उसके असली चेहरे को ये नकली वाला ‘सहमत चेहरा’ चबा गया है. वह घबरा कर भैया की किताब ढूंढने लगता है कवर पेज पर नजर पड़ते ही अचानक उसकी एक आँख फूट कर बाहर की ओर बहने लगती है. घाव पोंछ कर वह देखता है कि उसकी नजर अभी भी धुंधली नहीं हुई है और बची हुई एक आँख से वह किताब को पढ़ने लगता है ठीक उसी तरह, जैसे भैया ने उस किताब को लिखा था अपनी एक आंख फोड़ कर!

कवर पेज पर किताब का नाम और तेज़ चमकने लगता है एक गधे का ‘सुवर-नामा’. वह गति प्राप्त करने से पहले एक बार और बोलता है भैया की जय-जय, भैया की वाह-वाह. उसकी अंतिम वाली वाह ‘आह’ में बदल जाती है क्योंकि वह विकल्पहीनता की वाह थी. बंद होती एक आंख से वह एक बार और अपने दृश्य देखने की जोर कोशिश करता है तो पाता है कि भैया ने जिस समस्या पर किताब लिखी थी वह पहले से और भी बढ़ गयी.

वह हाथ आगे बढ़ा कर उस दृश्य का मुँह नोच लेना चाहता है पर उसके हाथ नहीं उठते हैं. वह भैया के नाम एक गाली बकना चाहता है पर नहीं बक पाता. वह ‘सुवर-नामा’ को घूरता रहता है उसे उसकी खो चुकी ‘दूसरी आंख’ बहुत याद आती है वह उसी बची हुई ‘लज्जित’ एक आंख से रोता हुआ मर जाता है.

वह भैया-भक्त पाठक था. उसकी यही गत होनी थी!

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