जानिये अंतर : वर्ण, जाति और जात

वर्ण

वर्ण का शाब्दिक अर्थ गुण, रंग, प्रवृत्ति होता है. मनुष्य जाति के ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये वर्ण कहलाते हैं.

निरुक्त अध्याय-2, खण्ड-3 के अनुसार, “वर्णः वृणोते:” अर्थात् इनका नाम “वर्ण” इसीलिए है, कि जैसे जिसके गुण, कर्म, स्वभाव हों, वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिए.

वर्ण वंश के अनुसार नहीं अपितु गुण, कर्म, स्वभाव से निश्चित होते हैं, इसका मनुस्मृति (अध्याय 10) में निम्नलिखित प्रमाण है:

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् क्षत्रियाज्जात्मेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च . 10/65 (98)

अर्थात् जो शूद्रकुल में उत्पन्न होके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान गुण, कर्म, स्वभाववाला हो तो वह शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाए, वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकुल में उत्पन्न हुआ हो और उसके गुण, कर्म, स्वभाव शूद्र के सदृश हों तो वह शूद्र हो जाय.

जाति

जाति (अंग्रेज़ी – species, स्पीशीज़) जीवों के जीववैज्ञानिक वर्गीकरण में सबसे बुनियादी और निचली श्रेणी होती है. जीववैज्ञानिक नज़रिए से ऐसे जीवों के समूह को एक जाति बुलाया जाता है जो एक दूसरे के साथ संतान उत्पन्न करने की क्षमता रखते हो और जिनकी संतान स्वयं आगे संतान जनने की क्षमता रखती हो.

उदाहरण के लिए एक भेड़िया और शेर आपस में बच्चा पैदा नहीं कर सकते इसलिए वे अलग जातियों के माने जाते हैं. एक घोड़ा और गधा आपस में बच्चा पैदा कर सकते हैं (जिसे खच्चर बुलाया जाता है), लेकिन क्योंकि खच्चर आगे बच्चा जनने में असमर्थ होते हैं, इसलिए घोड़े और गधे भी अलग जातियों के माने जाते हैं. इसके विपरीत कुत्ते बहुत अलग आकारों में मिलते हैं लेकिन किसी भी नर कुत्ते और मादा कुत्ते के आपस में बच्चे हो सकते हैं जो स्वयं आगे संतान पैदा करने में सक्षम हैं. इसलिए सभी कुत्ते, चाहे वे किसी नसल के ही क्यों न हों, जीववैज्ञानिक दृष्टि से एक ही जाति के सदस्य समझे जाते हैं. मानव हमारी जाति है.

जात

जात की जगह जाति गलत उच्चारण है क्योंकि जाति का मतलब होता है स्पीशीज न कि कास्ट उदाहरण – जन्मजात गुण नाकि जन्मजाती गुण..

जात का अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द कास्ट (caste) है, कुछ महान लोग जात को जाति बना देते हैं. यह पुर्तगाली भाषा के कास्टा (casta) से बना है.. जिसका अर्थ नस्ल, प्रजाति या भेद होता है. यह लैटिन भाषा “कास्टस” के बहुत समीप है जिसका अर्थ है विशुद्ध. इस प्रकार जाति से अभिप्राय है नस्ल संबंधी विशुद्धता.

वैदिक शास्त्रों में जाति शब्द की व्युत्पत्ति “जनी प्रादुर्भावे” शब्द से होती है इसका अभिप्राय है कि जात व्यवस्था का मूल आधार जन्म है इसलिए श्री सत्यव्रत सिद्धांतालंकार ने कहा है कि जात के विषय में किसी से पूछने का अभिप्राय है उंसके जन्म के संबंध में पूछना.. जात से हमारा अभिप्राय उन परिवारों के संगठन से है जिसका एक व्यवसाय होता है, जिसकी सदस्यता जन्मजात होती है तथा जिनके सदस्य उस जातीय समुदाय के नियमों का पूर्णतया पालन करते हैं.

शब्दव्युत्पत्ति की दृष्टि से जात शब्द संस्कृत की ‘जनि’ (जन) धातु में ‘क्त’ प्रत्यय लगकर बना है. न्यायसूत्र के अनुसार ‘समानप्रसावात्मिकाजाति’ अर्थात्‌ जात समान जन्मवाले लोगों को मिला कर बनती है.

निष्कर्ष

जाति (स्पीशीज) सबकी एक है मानव, सामाजिक वर्गीकरण है जात व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था जहाँ -कर्म आधार समाज का वर्गीकरण है वर्ण व्यवस्था, जन्म आधार समाज का वर्गीकरण है जात व्यवस्था .. तीनो में बहुत अंतर है.

विशेष

वर्ण व्यवस्था जहाँ कर्म आधारित होने की वजह से कोई भेदभाव नहीं था, कर्म के अनुसार ही वो स्थान प्राप्त करता था, जहाँ कर्म के हीन होने पर पददलित होता था, वहीं कर्म के उच्च होने पर पदासीन भी, क्योंकि वर्ण व्यवस्था में सभी को जन्म से शुद्र माना गया है जबकि जात व्यवस्था में सामाजिक वर्गीकरण ऐसा बना दिया गया है जहाँ योग्यता से कोई मतलब नहीं – कौन जात हो से मतलब है..

चित्र साभार — सन 1868 के एक फ़ोटो में बाएं से गुरखा, ब्राह्मण और शूद्र

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