आसमान की तरफ थूक उछाल, अपना मुंह उठा कर उसे धोने की तमन्ना

मैं सच में इन चार मी-लॉर्डों के सच में शरीक हूँ.

प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिये देश की जनता के सामने की गई अभूतपूर्व क्रांति को अपना समर्थन भी देना चाहता हूं.

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का ‘मालिक’… मतदाता, इन चार ‘कॉलेजियम’ की उत्पत्ति ‘बेचारों’ की मदद कैसे करूं?

जनता की अदालत में सवाल उठाया है तो बता दें… ये भारत के जनमत के लिए किस पार्टी, किस सीट, किस सदन के चुनाव मैदान में हैं?

प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जनता के सामने अपनी बात रखने की इस नयी और गैरज़रूरी परंपरा की राजनीतिक शुरुआत से पहले… जनता अगर अपना मत देना चाहे तो कैसे दे… यह तो बता देते?

हर पूर्वाग्रह से ऊपर उठ कर इस देश ने अब तलक अपने न्याय के मंदिर को भारतीय संस्कृति में उच्चतम रखा है.

वह भी तब, जब वह इस देश का राष्ट्रपति कौन, प्रधानमंत्री कौन तो तय कर सकती है, लेकिन देश के कानूनी हाकिम को तय आप हाकिम खुद करते हैं, हम बिना सर उठाये हाकिम मान लेते हैं.

इसके बावजूद आपको उस न्याय के मंदिर में भी ‘असहिष्णुता’ दिख रही है?

एक सीधी बात का जवाब खोजिये मी-लॉर्डों : यदि सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश द्वारा ‘कुछ’ मुकदमें आपको न दे कर… आपके ही बराबर के पैनल जजों को दे दिए गए… तो वे आपके कॉलेजियम पैनल के समकक्ष… अयोग्य कैसे हो गए? या… न्याय के साथ, काम के बंटवारे के साथ… अनुचित कहाँ से हो गया?

बताएंगे देश को एक और प्रेस कांफ्रेंस कर के कि, वो चंद ‘चुनिंदे’ मुकदमें आप ही क्यों सुनना चाहते थे, जबकि काम बांटना सुप्रीम हाकिम का अधिकार है.

सुनिये मी-लॉर्डों! आपने आसमान की तरफ थूक उछाल.. अपना मुंह उठा कर उसे धोने की तमन्ना की है, देश की संवैधानिक रवायत की हत्या करने की तमन्ना की है.

अपने न्याय के मंदिर का यूं क्षरण… यह देश नहीं देख सकता.

न्याय के मंदिर को ध्वस्त करने की गज़नवी परंपरा के किन्हीं भी द्रोहियों का नाश हो.

सौगंध राष्ट्र की खाते हैं, न्याय के मंदिर को बचाएंगे : क्योंकि यह इस देश के नागरिक की ‘आस्था’ का सवाल है.

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