हम सभी ज्वालामुखी पर बैठे हैं…

एक अभिन्न मित्र को आखिरकार चिट्ठी लिखकर छुट्टी मांगनी पड़ गयी. वह सार्वजनिक और निजी में भेद नहीं रखते, इसलिए यह जायज़ भी है.

हालांकि, कुछेक महीने पहले भी वह पांच दिन बीमार पड़कर सार्वजनिक दृश्यों से गायब हुए थे, पर उनके मित्रों को शायद पता भी नहीं चला था.

वह मित्र हों या मैं, हम सभी बीमार हैं. उसकी बीमारी खुल गयी, थोड़ी गंभीर हो गयी. बाक़ी सभी पागलपन को दबाए रखते हैं, छुपाकर रखने मे कामयाब हुए- उनकी दवा दगा दे गयी.

यह वक्त ही पागलपन का है. मैंने एक बार लिखा था कि पटना में अचानक ही मनोचिकित्सकों (और उससे भी अधिक हरेक के यहां मरीजों की) की भीड़ उमड़ आयी है. हम सभी पोटेशियल ज्वालामुखी के ऊपर बैठे हैं. सावधानी हटी, दुर्घटना घटी.

हरेक संवेदनशील और पूर्व-आधुनिकतावादी व्यक्ति खतरे में है. दिल्ली जैसे शहरों को लोग गरियाते हैं, लेकिन दरभंगा जैसे शहर भी इसी से आक्रांत हैं, – भयानक विलगाव और ऐकांतिक सन्नाटा.

मीडिया से जुड़े लोगों का हाल और बुरा है- सूचनाओं के नाम पर दुनिया भर का कूड़ा उनको बीनना पड़ता है, पर soothing लिटरेचर नाम की कोई चीज नहीं मिलती.

वामपंथ की हालत और त्रासद है. पहले जनता के बीच रहते थे, कुछ संवाद होता था तो मुगालता बना रहता था कि क्रांति हो रही है. अब वह भी नहीं मिलता.

आदर्श के तौर पर उनके पास एक किताब मौजूद है, जो पूर्णतः अराजक है. वह परिवार को ही शोषण की पहली इकाई बताता है, माता-पिता को पहला बुर्जुआ.

भारत में संघी दुरुस्त हैं, अगर उनकी महत्वाकांक्षाएं उनको बीमार न करे. आदर्श के लिए उनके पास पारिवारिक मूल्य हैं, सहारे के लिए धर्म है, देवता-देवियां हैं, राजनीति के लिए सबसे मुफीद वक्त है.

इतना भाषण इसलिए कि अवसाद के इस सघन समय में आपको खुद को engage करना पड़ेगा, अपना interest जबरी develop करना होगा, स्वयं को बार-बार (और, अब बहुत जल्दी से) रूपांतरित करना होगा, तभी आप survive कर पाएंगे.

मज़े की बात यह है कि हरेक मरीज़ ही जानता है कि उसे क्या हुआ है. उसके अलावा बाक़ी दुनिया समझती है कि वह तो बिल्कुल ठीक-ठाक है, बस बदमाशी कर रहा है…

इस पूरे सिंड्रोम से उबरने का एक ही उपाय है- खुद को गंभीरता से लेना बंद कर दें. प्रेम कीजिए. आखिर, हमारी मांएं, बीवियां क्यो नहीं ऊबतीं? क्योंकि, वे हमसे प्रेम करती हैं. बातें हैं, निकलेंगी तो दूर तलक जाएंगी.

इसके साथ ही, खुद के सर्वथा सच होने को भी एक दुखद अहसास मान लीजिए. हमेशा चौंकने वाले मोड में आइए. आप बीमार इसलिए हैं, क्योंकि आपने चौंकना छोड़ दिया है. आप बूढ़े हो गए हैं, जिसने सब देख लिया है.

शिशु बन जाइए – अच्छा, ये भी होता है क्या. अपने आसपास को देखिए. सचमुच. ये सब रटे-रटाए अगर आपको लगते हैं, तो इसका मतलब आप सही ट्रैक पर हैं.

आखिरी उपाय, स्वार्थी हो जाइए. वही कीजिए, जो सही लगे. आप हैं, तो ये दुनिया है. आपने आंखें मूंदी, दुनिया खत्म. तो, कीजिए वही जो आपको करना है.

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