विषैला वामपंथ : जो आपके बाएँ हाथ को आपके दाएँ हाथ से लड़ा दे

जैसा कि एनएचएस (National Health Service – Great Britain) में सामान्यतः अनुपात है, मुझे तो लगता है कि 60-70% महिलाएँ ही हैं.

तो साथ में हमेशा जूनियर्स लगभग लड़कियाँ ही होती हैं.

बच्चियाँ कह लीजिए… उम्र में आधी हैं.

इनकी बातें सुनता हूँ, इनके दिमाग में क्या चल रहा है इसकी कुछ खबर मिलती है.

एक कॉमन थीम है फेमिनिज्म… बराबरी का कीड़ा.

उस दिन एक लड़की दुखड़ा रो रही थी कि उसके बॉयफ्रेंड ने कहा कि उसकी ‘एक्स’ उसके लिए खाना बनाती थी, उसकी लॉन्ड्री कर देती थी और कपड़े प्रेस कर देती थी.

यह लड़की दुखी थी कि लड़कियों से यह एक्सपेक्टेशन क्यों है? उसने मुझसे पूछा, क्या तुम अपने घर में खाना बनाते हो? क्या तुम्हारे घर में बराबरी का रिश्ता है?

मैंने कहा – मुझे नहीं पता मेरे घर में पति पत्नी में बराबरी है या नहीं… पता नहीं, मैंने हिसाब नहीं लगाया. शायद ज्यादा काम वह ही करती है…

जो मुझसे बन पड़ता है, मैं कर देता हूँ. पर हम जो भी करते हैं, प्यार से करते हैं. यह हिसाब नहीं लगाते कि बराबरी हासिल हुई या नहीं…

हमारा गोल प्यार और खुशी है, समानता नहीं है. रिश्ते में जिसने भी गणित लगाया, वह हमेशा घाटे में ही रहा है… तुम्हारे इस फेमिनिज्म ने लाखों घर तोड़े हैं, करोड़ों को बसने से रोका है…

फेमिनिज्म इनकी बूढ़ी गैया है. फेमिनिज्म को कुछ मत बोलना… बच्ची तमतमा गई… तुम्हें नहीं पता, दुनिया में कितनी जगह औरतों के साथ क्या अत्याचार होता है… पहले औरतों को कितने कम राइट्स थे…

यह सही है कि यूरोप और अमेरिका तक में औरतों को 60s तक उतने अधिकार नहीं थे… पर उनकी स्थिति को फेमिनिज्म ने नहीं बदला है. बदला है शिक्षा ने, संसाधनों की उपलब्धता ने, आर्थिक विकास ने.

आज तुम मेरे बगल में बैठी हो, बराबरी से… इसलिए कि मैं भी डॉक्टर हूँ और तुम भी डॉक्टर हो… और तुम डॉक्टर इसलिए हो क्योंकि तुम्हारे माँ-पिता ने तुम्हें पढ़ाया… यह उपलब्धि है तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की… बीच में फेमिनिज्म कहाँ से आ गया? मैं अपनी बेटी को प्यार करता हूँ, चाहता हूँ कि वह पढ़े और सफल हो… अब उसे यह पाने के लिए फेमिनिस्ट होने की जरूरत थोड़े ना है…

नहीं, पर अभी भी दुनिया के कितने हिस्सों में लड़कियों को यह नहीं मिलता…

हाँ, सही है… पर दुनिया के कितने हिस्सों में लड़कों को भी यह नहीं मिलता… दुनिया परफेक्ट नहीं है. जिन लड़कियों को यह सुविधा, ये अवसर नहीं मिलते… उन तक तुम्हारा फेमिनिज्म भी नहीं पहुंचता…

और इन अवसरों को उनके पास लेकर तुम्हारा फेमिनिज्म नहीं जाएगा… उसका परिवार लेकर जाएगा… जिसमें एक माता और एक पिता होंगे… एक पुरुष और एक स्त्री होंगे…

तो क्या हम कुछ ना करें? हाथ पर हाथ धर कर बैठें? दुनिया में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसको बदलने की कोशिश ना करें…

तो यह है वह धारा जहाँ से युवा और आदर्शवादी मस्तिष्कों में वामपंथ की फसल की सिंचाई होती है… दुनिया में कुछ गलत हो रहा है, जिसे हम बदल रहे हैं…

मैंने उससे पूछा – क्या यह सही नहीं है कि रूसी क्रांति से पहले रूस में मजदूरों की स्थिति खराब थी? या चीन में किसानों की स्थिति खराब नहीं थी? बेशक थी. पर क्या चीन और रूस में क्रांति ने मजदूरों या किसानों की स्थिति को सुधार दिया या और बिगाड़ दिया?

चीन या रूस की क्रांति को किसानों या मजदूरों की स्थिति सुधारने से कोई मतलब नहीं था. वे उनके लिए सत्ता पर कब्जा करने के बहाने भर थे. वैसे ही तुम्हारा फेमिनिज्म भी एक पॉलिटिकल टूल भर है…

इसे औरतों को अधिकार दिलाने के लिए नहीं लाया गया है… समाज को बिल्कुल वर्टिकली, बीचोबीच दो भाग में बांटने के लिए लाया गया है… समाज के दो मूल स्तंभों, स्त्री और पुरुष के बीच संघर्ष खड़ा करने के लिए किया गया है.

विषैले वामपंथ का मूलमंत्र है संघर्ष… आपके दाएं और बाएँ हाथ में संघर्ष.

वे तो एक इमारत के दो पिलर्स को आपस में लड़ा दें यह बोल कर कि देखो, वह पिलर बीच में खड़ा है और तुम्हें किनारे खड़ा कर रखा है…या तुम्हारे ऊपर ज्यादा बोझ लाद रखा है और खुद किनारे खड़ा मज़े ले रहा है…

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