विदा लेना बाकी रहे : कोई एक दिन हो जिस पर किसी के दस्तख़त न हो

समकालीन कविता में आवाजों का कोरस समाया है. कुछ आवाजें बहुत दमदार होती हैं—चीख और आक्रोश की हदों को छूती हुई तो कुछ रोजमर्रा के जीवनव्यापी कथ्यु से वस्तुनिष्ठता के निष्ठापूर्ण चित्रण में निमग्न. कुछ महीन आवाजें ऐसी भी जो अपने आसपास के संसार से मामूली से मामूली कथ्य को अपनी संवेदना में उतारती हुई प्रतीत होती हैं.

आशुतोष दुबे इसी संवेदना के कवि हैं. बौद्धिक अतिरेक से कविता के कंधे भले ही मजबूत दिखें, उनका आत्म बल कमजोर होता है. इस अर्थ में आशुतोष बुद्धि बल के नहीं, आत्मबल के कवि हैं. उनकी कविता पहली मुलाकात में कुछ अटपटी लग सकती है, क्यों कि वह उद्धरणीय नहीं है, किन्तु अपने पूरे और थिर पाठ में आहिस्ता आहिस्ता मघई पान की तरह हमारी अंतश्चेतना में घुलती है.

धूल पर उनकी कविता पढ़िए तो उसका प्रतिपाद्य पूरा पढ़ने पर ही चरितार्थ होता है. धूल अजेय है— से बात शुरु करते हुए वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि ‘वह कहीं नहीं जाती और हमेशा जाती हुई दिखाई देती है.‘ फिर आगे वे कहते हैं, ‘’धूल और स्त्रियों की आज तक नहीं बनी.‘’ ‘’…..वह तब भी रहती है जब दिखाई नहीं देती.‘’ और अंत में—‘’एक दिन आदमी चला जाता है, उसके पीछे धूल रह जाती है.‘’ कहा जाता है कि धूल और प्रूफ की एक सी गति है.

धूल कभी खत्म‘ नहीं होती और प्रूफ पढ़ने के बाद भी कोई न कोई गलती धूल-सरीखी कहीं न कहीं रह ही जाती है. एक और कविता है जिसका आशय यह है कि कितना ही कोई चमकीला हो, कितना ही ताप हो दुपहरी में, ढलान अंतत: उसकी नियति है— एक श्लेष में देखें तो हर शिखर का एक ढलान होता है. यह सच निर्मम है. तभी तो अरुण कमल ने एक जगह लिखा, ‘’जिसमें इतनी ऑंच थी उसकी इतनी कम राख!’’

छोटी कविताएं लिखना कवि के लिए मुश्किल होता है. आशुतोष को भी, गो कि उन्होंने कम ही छोटी कविताएं लिखी हैं . पर जो लिखी हैं उनमें प्रयत्नलाघव के साथ कोई न कोई बात तो है:
कथा हूँ मैं एक
जो मुझे सुनता है, सहेज लेता है
जो मुझे सुनाता है, बदल देता है.

कोई एक दिन हो, कितने एकांत, धीरे धीरे अकेले, बकाया, पुरानी बात, एक लंबी नींद—ऐसी कई कविताएं यहां हैं जिन्हें पढते हुए कवि के अनूठेपन से प्रेम होने लगता है. इस बात से अचरज भी कि ऐसी काव्युयुक्तियॉं वह कहां से लाता है जो यह सवाल उपजाता है –
जिनके पास केवल भूख है
और कौर नहीं
उनके स्वाीद कहां जाते हैं?

यहां तक कि स्पर्श की इस अमूर्त अनुभूति को भी वह अदेखा जाने नहीं देता –

एक आवाज की भीगी हुई उंगलियों से छुआ गया हूँ मैं.

या यह मामूली इच्छाई भी कि

कोई एक दिन हो
जिस पर किसी के दस्तख़त न हों
कोई एक दिन हो
जिसको तहा कर रख लें मन की दराज़ में

निहायत अपना हो
भले ही सपना हो
कोई एक दिन तो हो.

इस तरह गोचर, अगोचर और अमूर्तन के काव्य कौशल से गुजरते हुए आशुतोष की कविता पढ़ने के लिए एक न्यूनतम अर्हता तो पाठक में होनी ही चाहिए. काव्यानुभूति अपने कथ्य के मूर्तन के लिए संवेदना के जिस चोर दरवाजे से चीजों में प्रवेश करती है, उससे यह जाहिर होता है कि हो सकता है, आशुतोष की दृष्टि जिस पदार्थ, विचार या दृश्यी को अपने अनुभव की आंख से देखती है— वहां सिवाय धुंध के और कुछ भी न हो—किन्तु उस धुंध को भी अपनी संवेदना की रिफाइनरी में छानने वाले और उसमें भी काव्‍य-वस्‍तु की पहचान कर लेने वाले कवि को ही हम आशुतोष दुबे के रूप में जानते पहचानते आए हैं जो यह बखूबी जानता है कि :

जो दिखाई देता है
उसका अपना भी उजाला और अंधेरा होता है
कभी कभी अंधेरे में भी जाना पड़ता है
उजालों की गठानें खोलने के लिए

– साभार ओम निश्चल जी

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