कम्पटीशन से इतना डरते क्यों हैं हम भारतीय?

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने द्वितीय कार्यकाल में विज्ञान भवन में आयोजित किसी इंडस्ट्री एसोसिएशन के समारोह को सम्बंधित कर रहे थे.

मैं एक सरकारी कर्मचारी के नाते हाल में बैठा था.

प्रधानमंत्री जी ने देश के शीर्ष उद्योगपतियों को सम्बंधित करते हुए कहा कि उन्हें पता है कि “आप सभी महानुभावों को बाज़ार में प्रतियोगिता पसंद है”.

फिर अपने पारम्परिक अंदाज़ में वे कुछ क्षण मौन रहे. आँखे बंद कर ली.

एकाएक वे चेतन हुए, आँखे खोलीं, हाथ हवा में लहराया और अपने चिरपरिचित अंदाज़ में बोले… “लेकिन दूसरों के उद्योगों में, आपको प्रतियोगिता अपने उद्योग क्षेत्र में नहीं चाहिए.”

यही हाल अभी हाल ही में मंज़ूर किये गए सिंगल ब्रांड रिटेल में 100% FDI का है.

सभी व्यापारियों को अपने हित को सुरक्षित रखना है, चाहे उसके लिए कस्टमर को निम्न गुणवत्ता का माल अधिक कीमत पर बेचें, वह भी खराब सर्विस के साथ.

वे इस प्रश्न का जवाब देने को तैयार नहीं हैं कि क्या उनकी दुकानों और व्यवसायों में हर महीने दस लाख युवाओं को रोज़गार मिल जाएगा जो बाज़ार में जॉब के लिए आ रहे है?

क्या कस्टमर को उच्च गुणवत्ता का माल उचित दामों में नहीं मिलना चाहिए? और, बाज़ार में नयी पूँजी कहाँ से आयेगी?

शुरुवाती वर्षो में विदेश से जब मैं भारत आता था, तो सूट, शर्ट, जूते इत्यादि खरीद के ले जाता था.

फिर मैंने महसूस किया कि अमेरिका, यूरोप, जापान जैसी जगहों पर यही वस्तुएं भारत से सस्ती और अधिक अच्छी क्वालिटी की मिलती है.

आप GAP (अमेरिका), H&M (स्वीडन), Zara (स्पेन), Uniqlo (जापान) जैसे चार से पांच मंज़िल में फैले शोरूम में चले जाइये और एक से बढ़कर एक कपड़े – अंडरवियर से लेकर सूट, स्कर्ट से लेकर टॉप – खरीद सकते है.

किसी भी दिन वह भारत से सस्ते, अच्छे और अधिक फैशनेबल. मज़े की बात यह कि अधिकतर कपड़े भारत, बांग्लादेश या श्रीलंका में बने होते हैं.

ऐसा क्यों है कि यह कपड़े भारत में बनने के बाद भी हमारे देश में विदेशों से महंगे मिलते है?

कहाँ पर यह inefficiency या अक्षमता हमारे व्यवसाय में घुस गयी और कैसे इससे छुटकारा मिल सकता है?

इसी प्रकार Ikea (स्वीडन) फर्नीचर के मामले में विश्वविख्यात है. अच्छे से अच्छे घरों में Ikea के फर्नीचर मिल जाएंगे.

इनके डिज़ाइनर कई महीनों तक आम घरों में रहते हैं, बड़े-बूढों से लेकर बच्चों तक के बैठने, खाने, सोने, नहाने की प्रक्रिया देखते हैं, नोट्स लेते हैं, फिर उनकी सुविधा के अनुसार फर्नीचर बनाते है.

एक-एक फर्नीचर का पीस भारत से सस्ता और गुणवत्ता में कई गुना बेहतर.

अगर आपके Apple या माइक्रोसॉफ्ट लैपटॉप में गारंटी की अवधि के बाद कुछ समस्या है, तो आप उसे Apple या माइक्रोसॉफ्ट के शोरूम में ले जाइये और वे बिना किसी चार्ज के ठीक कर देते है.

हो सकता है कि आप अभी भी सिंगल ब्रांड रिटेल में 100% FDI से सहमत ना हो. चलिए, कुछ प्रश्न पूछता हूँ?

एकाएक कैसे हवाई यात्रा आम भारतीयों की पहुँच में आ गयी?

क्या एयर इंडिया के एकाधिकार से कम दाम पर उड़ान संभव थी?

हमें सोचने की जरूरत है कि हमारे लैपटॉप और सेलफोन में क्यों विदेश में बने माइक्रोसॉफ्ट या एप्पल के प्रोडक्ट्स है, क्यों इंटेल की चिप है?

क्यों इन्टरनेट, गूगल, फेसबुक और अमेज़न अमेरिका में बने?

क्यों हमारे घरों में सैमसंग के एसी, फ्रिज, टीवी और वॉशिंग मशीन है, क्यों एप्पल और सैमसंग के फ़ोन है?

क्यों हम एयरबस और बोइंग के बनाये एरोप्लेन में उड़ते है? क्यों अमेज़न और उबेर की परिकल्पना विदेश में उपजी?

कारों को ही लीजिये. क्या खटारा एम्बेसडर और फ़िएट में चलना ही भारतीयों की नियति थी?

क्या सुज़ुकी (जापान), हुंडई (कोरिया), होंडा (जापान) के भारत में आने से स्वदेशी ब्रांड जैसे कि महिंद्रा, टाटा, बजाज इत्यादि का बाजार नहीं बढ़ा? कैसे पहली मारुति कार एम्बेसडर से सस्ती थी?

यही हाल हमारे विश्वविद्यालयों का है.

कुछ IITs, IIMs, और AIIMS जैसे कॉलेजों को छोड़ दीजिये तो बाकी जगहों पर औसत दर्जे की पढ़ाई होती है, क्योकि हमने कम्पटीशन को अपने विश्वविद्यालयों से दूर रखा.

इसका लाभ अभिजात वर्ग उठा ले गया क्योंकि उनके बच्चे विदेशों में श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त कर देश-विदेश में चमकते हैं.

विदेश में आने के बाद बाद मैंने महसूस किया कि हम भारतीयों में सैकड़ों वर्षो की गुलामी के कारण आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान की कमी है. व्हाइट विदेशियों को लेकर मन में एक अजीब सा डर है.

मैं नोटिस करता हूँ कि विदेशियों के सामने हमारे कंधे झुक जाते हैं, इंटरव्यू में दीन-हीन से नज़र आते है, उत्तर में आत्मविश्वास की कमी साफ़-साफ़ दिखाई देती है. यही हाल व्यापार में भी है.

विश्व में बहुत तेजी से तकनीकी बदलाव आ रहे हैं, बिज़नेस मॉडल बदल रहा है, उत्पादक और ग्राहक का रिश्ता बदल रहा है. हमारे लोग अभी भी पुरानी और भावनात्मक अनुभूति से बंधे हुए हैं, समाज और बिज़नेस का आधुनिकीकरण नहीं हो रहा है.

विदेशी कंपनियां वितरण (सामान मैन्युफैक्चरिंग से शोरूम तक पहुंचना), स्टोरेज (सामान को अनुमानित बिक्री के लिए रखना), लॉजिस्टिक्स (कर्मचारियों, सेवाओं, भण्डारण और बिक्री का जटिल मैनेजमेंट) के बारे में ग्लोबल प्रैक्टिस भारत में लाएंगी, नौजवानों को रोज़गार उपलब्ध कराएंगी, अपनी पूँजी लगाएंगी.

क्या उन्हें हम भारत में आने से मना कर दें क्योकि कुछ लोगों को डर लगता है कि उनका बिज़नेस खराब हो जायेगा?

क्या कोका कोला और पेप्सी के आने से और उनके द्वारा नमकीन और भुजिया बनाने से हल्दीराम और बीकानेर-वाले की दूकान बंद हो गयी? या अमूल की आइस क्रीम बिकनी बंद हो गयी? यह सब तो दिन दुगनी और रात चौगुनी प्रगति कर रहे है.

हम भारतीयों को कम्पटीशन से डरने की आवश्यकता नहीं है.

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