रोज़ एक आकाश मेरे भीतर उगता है

रोज़ सुबह एक सूर्य
उदित होता है हृदय में
और मन के पंछी चल पड़ते हैं
दाने की तलाश में…

सूर्य की किरणें पड़ती हैं
विचारों की नदिया में…
और फ़ैल जाती है
मेरे गहनतम की सतह पर,
संकेत देती हुई एक विराट सूर्य का
मेरे अंतरमन में…….

सांझ ढलती है मेरे हृदय में भी,
जब सूर्य छुपने लगता है बैंगनी गलियों में
और चाँद के आने का कोई सन्देश नहीं मिल पाता….
आँखों में उमड़ आते हैं बादल…
तब सहसा मन के पंछी लौट आते हैं
अपने बसेरे में संकेत देते हुए कि
तुमसे बाहर का जगत बहुत बड़ा है….

लेकिन इतना भी बड़ा नहीं
कि तुम्हारे भीतर का आकाश
उसमें समा सके
और मुझे अनुभव होता है
कि माथे पर चाँद उग आया है….
और मैं उसे उठाकर उसे अर्पित कर देती हूँ
अपने भीतर के आकाश को…

तब मुझे प्रतीत होता है
कि एक सूर्य और एक चन्द्र
मेरे भीतर भी रोज़ उगते हैं … और डूबते हैं…

रोज़ एक आकाश मेरे भीतर उगता है
और मेरे चाँद और सूरज को चुरा ले जाता है…

– प्रकृति शैफाली

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