Multitasking : कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं आप घर परिवार और मेकिंग इंडिया के साथ सोशल मीडिया भी… एक साथ सबकुछ कैसे संभाल लेती हैं. आपकी मल्टीटास्किंग गज़ब की है. कई करीबी मित्रों ने तो सीधे सीधे यही पूछा, दिन भर यहीं (सोशल मीडिया) पर ही जमी रहती हो, घर में झाडू, बर्तन, कपड़ा, खाना कौन करता है 😀

तो भई ऐसा है… टाइम मैनेजमेंट और सेल्फ मैनेजमेंट एक ऐसी चीज़ है जो अधिकतर औरतों को आती है. अब वो ज़माना तो रहा नहीं कि आँगन में गोबर लीपना, पापड़, बड़ी, अचार बनाने से लेकर कुँए से पानी भरने तक के काम में दिन भर निकल जाता था.

फिर भी एक बात बता दूं हम औरतों के काम कम नहीं हुए हैं बस काम का स्वरूप बदल गया है. आज भी दिन भर हम व्यस्त रहती हैं. ऑफिस भी जाती हैं, घर के सारे काम और बच्चों के होमवर्क से लेकर मेहमाननवाज़ी और त्यौहारों की तैयारी इसमें शामिल है. ऊपर से स्वामी ध्यान विनय की हार्दिक इच्छा है कि गेहूं पीसने की हाथ चक्की खरीदी जाए. रोज़ नए पीसे आटे रोटी खाई जाए. और सबसे बड़ी बात हमारे यहाँ तो पापड़, बड़ी, अचार भी घर में ही बनते हैं.

खैर, मेरे लिए जो चीज़ सबसे पहली और महत्वपूर्ण है, वो है सारे काम करने के बाद शरीर को पूरा आराम और नींद मिलना. ये स्टेज आपने पूरी कर ली तो दिन भर में आप चाहे जितना काम कर सकते हैं. बशर्ते आप स्वभाव से ही आलसी नहीं है तो.

मैं बहुत कम सोती हूँ, लेकिन जितना सोती हूँ गहरी नींद में सोती हूँ और ये भाव हमेशा रहता है कि नींद में उतरने के बाद मैं किसी और दुनिया में प्रवेश कर जाती हूँ जहाँ आपके शरीर को पूरे आठ या नौ घंटे की नींद आवश्यक नहीं है, कभी कभी एक घंटे की नींद में भी आप वो कोटा पूरा कर सकते हैं, कभी कभी एक झपकी में भी.

मैं और स्वामी ध्यान विनय जब जागने पर आते हैं तो कई कई रात लगातार जाग सकते हैं. मेरा अभी तक का रिकॉर्ड 60 घंटे लगातार जागने का रहा है. स्वामी ध्यान विनय की तो पूछिए ही मत. खैर वो अलग स्तर की बातें हैं. हम कुछ भौतिक स्तर की बातें कर लें.

बावजूद इसके बच्चों को देखने के लिए बीच बीच में आँख खुल भी जाती है. ठीक से सोये है या नहीं, ठण्ड बहुत है तो रजाई तो नहीं हट गयी. इस तरह छः से साढ़े छः के बीच सुबह हो जाती है, फिर चाहे रात तीन बजे ही क्यों न सोये हो. क्योंकि बच्चों को किसी भी हालत में सुबह आठ बजे स्कूल पहुँचाना होता है. उसके पहले घर भर की चाय, दोस्तों से सोशल मीडिया पर गुड मॉर्निंग, बच्चों का टिफिन, और उनको तैयार करके स्कूल भेजना होता है.

घर भर की झाडू लगाने के बाद दस बजे नाश्ते के साथ खाने की तैयारी करना… मुझे खाना बनाने में सिर्फ एक घंटा लगता है. कई महिलाओं को मैंने सुबह छः से दोपहर दो बजे तक किचन में जमे रहते देखा है. मुझे आश्चर्य भी होता है, ऐसा क्या काम होता है रसोई में जो इतना समय लगाती हैं.

फिर कई केस का अध्ययन किया. कई औरतें जब तक चाय उबल नहीं जाती उसको एक टक घूरती देखती रहेंगी जैसे चाय उनकी नज़रों से ही मीठी होने वाली है. जब तक सब्ज़ी पक नहीं जाती उसी के आसपास मंडराती रहेंगी जैसे उनकी अनुपस्थिति में सब्ज़ी पंख लगाकर उड़ जाएँगी. मेरे लिए इन कामों के साथ किचन के बाकी बचे कामों को निपटाना ज़रूरी होता है.

ऑफिस जाने वाली महिलाएं झाडू, कपड़ा, बर्तन सबके लिए बाई रख लेती है. मैं ये सारे काम हाथ से ही करती हूँ क्योंकि अलग से शारीरिक व्यायाम के लिए समय नहीं होता. हाँ बर्तन के लिए ज़रूर बाई है जिसका नाम शोभा रानी है. क्योंकि बच्चों के दादाजी ने साफ़ मना कर दिया है… आपको जो काम हाथ से करना हो कर लीजिये बर्तन आप नहीं धोएँगी. अब उनका प्यार सर आँखों पर. (इस शोभा रानी की कहानी भी बहुत मजेदार है जिसे अलग से लिखूँगी)

ठण्ड है इसलिए स्नान ध्यान देर से होता है लेकिन बाकी मौसम में अल सुबह ही. मेरा नाश्ता खाना तो कम्प्युटर के सामने ही होता है. कारण है मेकिंग इंडिया. ऑफिस जाने वाली महिलाएं भी ये सब मैनेज कर लेती है, मेरे साथ एक प्लस पॉइंट यह है कि मेरा काम ही ऑनलाइन होता है और ऑफिस घर में ही है. इसलिए काम के साथ सोशल मीडियाना आसान होता है.

और यदि ऐसे में आप रचनात्मक हैं तो फिर कहना ही क्या… इधर मैं इश्क़ में डूबी कोई कविता लिख रही हूँ उधर से छोटे बेटे की टॉयलेट से आवाज़ आती है… मम्मा ….. हो गयी… तब आपकी प्राथमिकता क्या है आपको ही तय करना होता है… और प्राथमिकता निपटाकर वापस उसी भाव भूमि पर आपको दोबारा रचना को पूरा करना … आपकी रचनात्मकता की सबसे कड़ी परीक्षा है ये, जिसमें मैं अधिकतर पास ही हुई हूँ. ये बात अलग है कि ऐसा मुझको लगता है… क्योंकि हम तो आज भी Jack Of All Master Of None हैं.

इसलिए जितना भी कुछ जाना या सीखा है उसे जोड़तोड़ कर रचना को औसतन पढ़ने लायक बना ही लेती हूँ. इसलिए मैं कभी उन साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आती जिनकी हर रचना उत्कृष्ट होती है. इसके लिए मैं खुद को यह कहकर बहला लेती हूँ कि शब्दों से अधिक मेरे शब्दों की भाव ऊर्जा पाठकों तक पहुँचती है, जो मेरे लिए अधिक आवश्यक है. खुद में कभी भी inferiority complex मत आने दीजिये. आप अपने आप में विशिष्ट हैं, फिर चाहे आप वर्किंग है या सिर्फ हाउस वाइफ.

बच्चे दो बजे स्कूल से आते हैं उसके पहले मेकिंग इंडिया, उनके आने के बाद उनका खाना, दोपहर की मस्ती, शाम की चाय के बीच कम्प्युटर पर काम सब साथ में चलता है, क्योंकि मेरे बच्चे भी कम्प्यूटर पर गेम खेलते हुए ही खाना खाते हैं. ये आदत इसलिए भी पड़ गयी उनको क्योंकि दो कम्प्युटर हैं, दोनों खेलते रहते हैं इस बीच मैं उनको अपने हाथों से खाना खिला देती हूँ. तो उनको पता ही नहीं चलता क्या खिलाया जा रहा है. अलग से खाना खिलाओ तो पच्चीस नखरे, ये सब्ज़ी नहीं वो सब्ज़ी नहीं. हालांकि इतने भी नखरे नहीं है, इस मामले में मुझ पर गए हैं. सब्ज़ी पसंद नहीं तो दाल में रोटी मीड़कर ऊपर से अचार घी शक्कर डाल कर भी स्वाद से खा लेते हैं.

मुझे याद ही नहीं मैंने कभी खाने के नखरे किये हो. जो बना है वो खा लिया, आज भी वही हाल है… खाना मेरे लिए सिर्फ एक काम है जो शरीर को ऊर्जा देने के लिए आवश्यक है इसलिए जो है वो खा लो, सब्ज़ी नहीं है तो अचार से खा लो, अचार नहीं है तो मैं तो रात को कई बार सिर्फ दूध रोटी भी खा के भी आराम से काम चला लेती हूँ.

बाहर का हम खाते नहीं तो बच्चों को भी बर्गर पिज़्ज़ा जैसी चीज़ों की आदत नहीं. हाँ कोई ले आया है प्यार से तो कोई परहेज़ भी नहीं. इस मामले में ध्यान बाबा अलग है. खाने में सब्ज़ी आवश्यक है, उनको fibres पूरे चाहिए. बाहर का खाना ना मतलब ना… चाहे वो किसी के घर से ही क्यों न बनकर आया हो.

खैर चाय के बाद बच्चे बाहर आँगन या सामने गार्डन में खेलने जाते हैं इस बीच फिर मेकिंग इंडिया का काम. ध्यान बाबा की सुबह शाम की तीन चार बार की चाय की फरमाइश. कोई मिलने जुलने आया तो उनका स्वागत. और फिर सात से नौ के बीच फिर रात का खाना बनाना और बच्चों को खिलाना. साथ में उनका होमवर्क और उनकी लड़ाई निपटाना.

रात दस बजे बाद हमारा वास्तविक समय शुरू होता है जब आसपास की दुनिया सो जाती है. मेरी कवितायेँ, लेख, दोस्तों से रूठना मनाना, ध्यान बाबा के प्रवचन… और इस बीच मेकिंग इंडिया का काम तो जैसे फिल्म के पार्श्व संगीत की तरह चलता ही रहता है.

अब आप 24 घंटे में से चार घंटे किचन के, छः घंटे सोने के, चार घंटे बाकी कामों के लिए निकाल भी लें तो भी मेरे पास पूरे दस घंटे बचते हैं. अब इन दस घंटों को मैं अलग अलग समय और आवश्यकता अनुसार कैसे निवेश करती हूँ ये मेरी क्षमता, कार्य कुशलता, टाइम मैनेजमेंट और सेल्फ मैनेजमेंट पर निर्भर करता है.

काम सबके पास अमूमन एक से होते हैं, बस अपनी प्राथमिकता आपको तय करना है जो हम करते भी हैं. और आज की इन्टरनेट की दुनिया में समय के साथ चलना आवश्यक भी है. और जहाँ तक ध्यान और अध्यात्म का प्रश्न है. मेरा हर काम उसी स्वर्णिम नियम के अनुरूप और ब्रह्माण्ड से मिल रहे संकेतों से चलता है. तभी तो मैं कहती हूँ हर युग में आध्यात्मिकता उसकी भौतिकता से जुड़ जाती है. इसलिए अध्यात्म और ध्यान को मैं इन कामों से अलग नहीं समझती. पूर्ण समर्पण और प्रभु को साक्षी मानकर किया गया हर कार्य मेरे लिए ध्यान है. और वैसे भी स्वामी ध्यान विनय का सानिध्य ही मेरे लिए सबसे बड़ा ध्यान है. यूं ही तो नहीं बब्बा ने उनको “ध्यान” नाम दिया है.

और मुझे “जीवन” नाम क्यों दिया है ये आप सब लोग बहुत अच्छे से जान गए हैं. कम से कम वो लोग तो जान ही गए हैं जिन्होंने मुझमें जीवन के सारे रूप रंग देखे हैं… इसलिए दोबारा बताकर बोर नहीं करूंगी.

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