विषैला वामपंथ : शाब्दिक, वैचारिक अराजकता में छिपी विराट राजनीतिक शक्ति

कुछ दिनों पहले क्रिटिकल थ्योरी के बारे में लिखा था. 1937 में जर्मनी से भागकर अमेरिका में बसे वामपंथी होर्कहाइमर ने क्रिटिकल थ्योरी दी थी.

इसका मूल है कि कुछ भी आलोचना से परे नहीं है… धर्म, नैतिकता, समाज, राष्ट्र, माता-पिता, प्रेम, भक्ति, सत्य, निष्ठा… हर चीज़ की बस आलोचना करो… हर चीज़ में बुराई खोजो, निकालो… हर पवित्र संस्था, व्यक्ति, विचार और भावना की निंदा करो…

1960 के अमेरिका में एक दूसरे वामपंथी हर्बर्ट मार्क्यूस के नेतृत्व में चले लिबरल मूवमेंट में इसका खुला प्रयोग सामने आया.

इसने परिवार और राष्ट्रवाद के स्थापित मूल्यों के विपरीत एक भ्रष्ट, पतित, नशे में डूबे हुए, वासनाग्रस्त उच्छृंखल अमेरिकी समाज की स्थापना का अभियान चलाया… जिसने अमेरिका में अपराध, नशा और समलैंगिकता की महामारी फैला दी…

बेटे को यह समझा रहा था, तो उसे यह नहीं समझ में आया कि कोई जानबूझ कर ऐसा एक समाज क्यों बनाना चाहेगा? इसका राजनीति से क्या रिश्ता है? ऐसे एक मूल्यहीन समाज के निर्माण से सत्ता पर कैसे कब्ज़ा किया जा सकता है, कैसे शक्ति आती है?

यह अमेरिका था. उसके स्थापित मूल्यों को उखाड़ कर वामपंथियों को तत्काल और प्रत्यक्ष सत्ता नहीं मिली.

लेकिन उसी समय दुनिया के दूसरे छोर पर एक दूसरे विशाल देश में इसी क्रिटिकल थ्योरी का प्रयोग सत्ता-नियंत्रण के लिए हो रहा था.

देश था चीन, और यह प्रयोग करने वाला व्यक्ति था माओ. एक समय मार्क्स-माओ-मार्क्यूस का नाम वामपंथ की त्रिमूर्ति के रूप में लिया जाता है… आज टैक्टिकल कारणों से वामपंथियों ने मार्क्यूस का नाम जन-स्मृति से लगभग छुपा रखा है.

1966 में अमेरिका में जिस दिन नशेड़ी वामपंथी संगीत बैंड बीटल्स ने अपना सुपरहिट एल्बम “रिवॉल्वर” रिलीज किया था, ठीक उसी दिन चीन में माओ ने अपने कल्चरल रेवोल्यूशन की घोषणा की थी.

इस सांस्कृतिक क्रांति में माओ ने सभी पुराने बुर्जुआ मूल्यों को जड़ से उखाड़ कर उसकी जगह सिर्फ वामपंथी क्रांतिकारी सांस्कृतिक मूल्यों को स्थापित करने का आह्वान किया.

माओ के बनाये संगठन रेड-गार्ड्स ने सभी क्रांतिविरोधी प्रतिक्रियावादी तत्वों और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों पर हमला बोल दिया.

रेड-गार्ड्स मूलतः स्कूली बच्चों और टीनएजर्स की संस्था थी. ये बच्चे टिड्डियों की तरह हज़ारों की भीड़ में निकलते थे और किसी भी एक व्यक्ति को अपनी प्रतिक्रिया या स्ट्रगल सेशन के लिए चुनते थे.

उसके घर में घुस कर तोड़फोड़ करते थे, कोई भी पुराना या कीमती सामान जो पुराने चीनी विचारों या संस्कृति के प्रतीकों को प्रतिबिंबित करता था उसे तोड़-फोड़ कर या लूट कर ले जाते थे.

उस व्यक्ति को या उसके पूरे परिवार को पकड़ कर घसीटते हुए ले जाते थे, उसके कपड़े फाड़ कर, उसके मुँह पर कालिख पोत कर, गले में अपमानजनक तख्तियाँ लटकाकर उसका तमाशा बनाकर पीटते और अपमानित करते हुए ले जाते थे.

फिर उसे एक स्टेज पर हज़ारों या कभी कभी लाखों की भीड़ के सामने ले जाते थे और उसे क्रांति का शत्रु घोषित करके उसे बुरी तरह पीटते थे…

कुछ भी वर्जित नहीं था… सामूहिक बलात्कार से लेकर हत्या तक कुछ भी आउट ऑफ बाउंड नहीं था. लाखों लोगों की हत्या कर दी गई, हज़ारों ने इसमें पकड़े जाने के डर से आत्महत्या कर ली और अपने पूरे परिवार को ज़हर दे दिया.

राष्ट्रीय और ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों और संग्रहालयों को नष्ट कर दिया गया, पुस्तकालय और मठ जला दिए गए, मंदिरों, मठों और चर्चों से मूर्तियाँ तोड़कर वहाँ चेयरमैन माओ के पोस्टर्स लगा दिए गए.

कन्फ्यूशियस के संग्रहालय तक को नष्ट कर दिया गया… सबकुछ जो प्राचीन चीनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता था वह निशाने पर था… संस्था, प्रतीक, विचार, व्यक्ति…

स्कूल ऑफिशियली बंद कर दिए गए, बच्चे अब सिर्फ क्रांतिकारी शिक्षा पाते थे… जिसमें शामिल था माओ के विचारों को जानना, माओ की रेड-बुक पढ़ना, और पुरानी शिक्षा पद्धति के प्रतीक शिक्षकों का अपमान करना और उन्हें प्रताड़ित करना.

बच्चों ने स्कूलों के शिक्षकों को पकड़ पकड़ कर इन स्ट्रगल-सेशन में पीटना और स्कूलों में ही पब्लिक एक्सक्यूशन करना शुरू कर दिया. हज़ारों शिक्षकों को उनके स्कूल के बच्चों ने मार डाला.

बच्चों ने अपने माता-पिता को मार डाला क्योंकि उनकी नज़र में वे पिछड़ी सोच के और क्रांतिविरोधी थे. और इन बच्चों पर पुलिस या सेना को किसी तरह की कार्रवाई करने की सख्त मनाही थी क्योंकि ये बच्चे क्रांति के वाहक थे.

यह पागलपन कुल दस साल चला, 1976 में लगभग माओ की मृत्यु तक. पर पहले तीन वर्ष सबसे बुरे थे. और इस सांस्कृतिक क्रांति में मरने वालों की कुल संख्या का अनुमान 16 से 30 लाख के बीच लगाया जाता है. 17 लाख का आंकड़ा खुद चीनी सरकार का आधिकारिक आँकड़ा है.

पर अभी भी यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इस पागलपन का राजनीतिक पहलू क्या था? इसका राजनीतिक लाभ किसे हुआ और कोई ऐसा एक समाज क्यों बना रहा था जहाँ बच्चे अपने पेरेंट्स की, स्टूडेंट्स अपने टीचर्स की ऐसी निर्मम हत्या कर रहे हों?

तो इस सांस्कृतिक क्रांति के पीछे का राजनीतिक इतिहास यह था कि 1958-60 के बीच में माओ ने कुछ ऐसी सनक भरी हरकतें की थीं, कृषि और औद्योगिकरण के ऐसे क्रांतिकारी प्रयोग किये गए थे कि पूरे चीन में भीषण अकाल पड़ गया था और जिसमें 2-3 करोड़ लोग मारे गए थे.

इसका नतीजा यह हुआ था कि माओ की लोकप्रियता में भारी कमी आई थी और पार्टी के अंदर माओ की प्रभुसत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे.

इस सांस्कृतिक क्रांति की आड़ में माओ ने आतंक का जो राज्य फैलाया उसमें माओ के सारे प्रतिद्वंदी निबट गए… बहुत से मार डाले गये, बाकी दुबक गए, और देंग सियाओ पिंग जैसे लोग निर्वासन में चले गए.

शाब्दिक, वैचारिक अराजकता सिर्फ सांकेतिक नहीं होती… उसमें विराट राजनीतिक शक्ति छुपी होती है.

और एक वामपंथी इस शक्ति को पहचानता है और उसके प्रयोग के उचित अवसर की प्रतीक्षा करता है. हम भी पहचानें और समय रहते उसका प्रतिकार करें… नहीं तो जब दरवाज़े पर हज़ारों की भीड़ खड़ी मिलेगी तो कुछ नहीं कर पाएंगे…

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