Extra Marital Affairs : गैर मर्द का ख़याल पाप या प्रकृति?

दो साल पहले सोशल मीडिया पर मैंने एक स्टेटस डाला था – गैर मर्द का ख़याल आना पाप नहीं प्रकृति है. नहीं आता है तो दो ही कारण है या तो आप पहुंचे हुए सिद्ध योगी हैं या कहीं न पहुँच सकने वाले भोगी.

लेख पर बहुत सारी प्रतिक्रियाएं आई, 60 प्रतिशत सहमति में, 20 प्रतिशत असहमति में, 20 प्रतिशत सहमति और असहमति ख़ुद तय नहीं कर पा रहे थे, दो या तीन अभद्र भी थीं क्योंकि उन्हें यकीन नहीं था एक औरत इतना खुल कर इस मुद्दे पर कैसे लिख सकती है.

कदाचित उनके पुरुष अहम् को चोट लगी जिसके उपाय में सिर्फ वो एक आख़िरी हथियार अपनाते हैं, वो है स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाना. और मज़े की बात यह है कि उनके चरित्र की परिभाषा भी केवल देह पर आकर ख़त्म हो जाती है.

यदि कोई औरत एक से अधिक पुरुष से प्रेम करती है तो वो चरित्रहीन है फिर चाहे वो खुद एक साथ दस औरतों के साथ इनबॉक्स में प्रेमालाप करते हो, और उनकी नज़र में वो औरत चरित्रवान है जो चाहे एक साथ दस पुरुषों का खयाल मन में रखकर भी जीवन भर पतिव्रता होने का अभिनय करती रहे.

लेकिन इन सारी प्रतिक्रियाओं के अलावा मेरे इनबॉक्स में बहुत सारी औरतों के सन्देश आए, कुछ ने तो फ़िल्मी हीरों के नाम बताए कि वो उन क्षणों में किसको इमेजिन करती हैं…. उन संवादों में से एक वार्तालाप मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ –

औरत इनबॉक्स में- उफ्फ्फफ़. कभी कभी डर लगता है कि मेरे अंदर छुपे सालों के राज़ आपने कैसे जान लिये और तो और सबके सामने रख दिये. ये सब क्या है. जवाब देना पडेगा.

औरत को मेरा जवाब – ये राज़ औरत जात के राज़ है… जिसे वो सदियों से छुपाती आई है…. और मैंने इस नियम को तोड़ दिया है तुम्हारी खातिर…

औरत- जो बातें आप यूं ही कह लेती हैं उन्हें खुद से कहने में भी हिम्मत जुटानी पड़ती है. यूं लगता है अपना लिखा मैं पढ़ती चली जा रही हूं.

मैं- मैं सुन रही हूँ … कहते रहिये मन की बात…

औरत- ये कि पति के साथ होने पर भी उस वक्त में किसी की कल्पना खुद ब खुद हावी हो जाती है. नहीं तो सब असफल और बेमानी लगता है…

मैं- मानव स्वभाव और प्रकृति है ये तो… इसे कैसे नकार सकते हैं…. पति से पूछा कभी वो किसे fantasize करते हैं उस समय?

औरत- नहीं कभी नहीं…. अगर वो ये जान जाये कि मैं किसी और को imagine करती हूं तो शायद तूफ़ान आ जाये लेकिन बेड़ियाँ भावों पर नहीं लगती. अहसासों पर नहीं लगती…

मैं- हम जिनके साथ विचार नहीं बाँट सकते उसके साथ बदन बांटना पड़ता है… क्यों?

औरत- yes yes… कितना कठिन होता है….

मैं- आपके नाम का ज़िक्र किए बिना क्या मैं अपनी बातचीत पर लेख बना सकती हूँ? बहुत सी औरतों को आप ही की तरह सहारा और सुकून मिल जाएगा … कि वो अकेली ऐसा नहीं करती … और ये कोई पाप भी नहीं …

औरत- बेशक….. मुझे भी शायद कुछ सुकून मिले.

मैं- खुश रहिये… खुद से प्यार कीजिये… इतना प्यार कि किसी और के प्यार की ज़रुरत न पड़े…

औरत- जी… शुक्रिया….

औरत अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहती, कर नहीं सकती… तो अपने दिल की बात मेरे इनबॉक्स में कह जाती है… कि मैं अपने नाम से उनके दिल की बात कहकर बाकी औरतों को ग्लानिभाव से मुक्त कर दूं… मैंने उनका नाम ज़ाहिर नहीं किया लेकिन ये बातचीत एक औरत की नहीं बल्कि पूरी औरत जात की है….

और आज एक बार फिर मैं एक औरत से औरत जात में बदल गयी…

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