मैं तुम्हारे जीवन का रंगमंच हूँ, मैं ही तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रपंच हूँ

मैं ही तुम्हारी प्रकृति हूँ
जो पैदा करती है प्रतिकूल परिस्थिति
तुम्हारे परमात्मीय पंथ को
परिष्कृत करने के लिए

मैं ही तुम्हारे दर्शन की दृष्टि हूँ,
भौतिकता का दृश्य भी मैं ही हूँ
ताकि तुम दैदीप्यमान कर सको दीप
दारुण जगत के अँधेरे दरवाज़ों पर

मैं ही तुम्हारे अदृश्य जगत में रचती हूँ माया
मैं ही दृश्य जगत में फिरती हूँ बनकर छाया
परस्पर अनुकूल-प्रतिकूल, साधक-बाधक रूप में
मानव जगत में प्रकट होती बनकर महामाया

मैं चिति बन पराशक्ति रूप में आत्मस्फुरित हूँ
जिसके बहि:प्रसरण से तुम्हारा संसार करती हूँ
और मैं ही स्थावर-जंगमात्मक जगत में
परमशिव के तीसरे नेत्र पर तांडव करती हूँ

मैं ही वो नागमणि भी हूँ
जो भोले की गर्दन पर श्रृंगारित है
मैं ही उसके डमरू से उठता नाद हूँ
जिससे तुम्हारा संगीत जगत आह्लादित है

तुम्हारे मूल से उठती वो कुण्डलिनी हूँ
जो मस्तक के सहस्त्रदल कमल पर
विराजित होकर ख़त्म करेगी जन्मों का फेरा
यूं तो मैं तुम्हारे जीवन का रंगमंच हूँ
लेकिन मैं ही तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा का प्रपंच हूँ

माँ जीवन शैफाली

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