स्वप्न गाथा : नाभि द्वार से अपने उद्गम बिंदु पर पहुँचने की एक वर्तुल यात्रा

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पहली बार जब उसे स्वप्न में देखा तब सात आठ साल के बालक के रूप में दिखा था, दूसरी बार डेढ़ दो साल के बाल गोपाल के रूप में, और कल रात उसे मैंने कच्चे दूध की सुंगध से भरे नए जन्मे शिशु के रूप में गोद में पाया.

सात आठ साल के बालक का स्वप्न आया था तब मैं उसके साथ आँख मिचौली का खेल खेल रही थी. कभी वो कहीं छुप जाता, कभी मैं. इस खेल में हम दोनों को बहुत आनंद आ रहा था. जीवन की सबसे ऊपरी सतह पर खेला जाने वाला खेल. छेड़ना – लड़ना – झगड़ना… रूठना-मनाना…

दूसरी बार बाल गोपाल के रूप में उस रात दिखा जब एक सखी ने राधा मंदिर का एक फूल मेरे लिए भेजा. क्योंकि मैंने उसे कहा था निधिवन उपवन जा रही हो तो वहां का रहस्य भले मत लाना मेरे कान्हा को लेती आना. राधा को पुकारोगे तो कान्हा चला आएगा… इसका रहस्य मैंने उस रात जाना. और जीवन का यह सतही खेल अंतर्चेतना में प्रवेश कर गया.

बहुत अद्भुत अनुभव था वह जब अगली सुबह आँख खुलते से ही लगा था राधा का प्रेम तो मीरा की भक्ति में तब्दील हो चुका है. कान्हा की बांसुरी की धुन के पीछे पगलाई, उसे खोजती हुई राधा बहुत पीछे छूट गयी थी, मीरा ने बांसुरी की धुन को अपने हृदय में बजता पाया. कस्तूरी मृग को अपनी नाभि का पता मिल गया…

और ये कल रात का नए जन्मे शिशु का स्वप्न इस तथ्य को अनुभव करा गया कि जिस यात्रा को मैं आगे की यात्रा समझ रही थी वो तो पीछे लौटने की यात्रा है. नाभि द्वार से अपने उद्गम बिंदु पर पहुँचने की एक वर्तुल यात्रा.

और याद आई पिछले वर्ष ध्यान के क्षणों में दिखी वो झलक कि कोई शिशु मेरी गर्भनाल से जुड़ा हुआ है लेकिन गर्भ में नहीं, देह के बाहर है. लेकिन उस समय इस स्वप्न का अर्थ समझ नहीं सकी थी.

अब प्रतीक्षा है उस पल की जब वो शिशु सदा के लिए मेरे गर्भ में समा जाए… और मैं उसे धारण किये हुए लौट जाऊं अपनी उस रहस्यमय दुनिया में, जहाँ उन रिश्तों के लिए संबोधन गढ़ सकूं, जिनके नाम इस दुनिया में अभी तक इजाद नहीं हुए हैं. क्योंकि “प्रेम” जैसा शब्द भी अब मेरी भावनाओं के लिए छोटा पड़ने लगा है.

लोग अक्सर अचंभित होते हैं मैं कैसे अपने व्यक्तिगत अनुभवों और रिश्तों पर निडर होकर बेबाकी से लिख देती हूँ. लेकिन मेरे ये शब्द ही वो तलाश है, उन तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता, जिनके पास मेरे इस जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने का पता दर्ज है.

ये शब्द मुझ पर ईश्वर का आशीर्वाद है जिसके पुल पर चलकर पिछले जन्म के कई रिश्ते मुझ तक पहुंचे हैं. तभी तो मैं कहती हूँ मेरी मुक्ति के वर्तुल को पूरा करने वाली तुम अंतिम त्रिज्या हो. और मैं तुम्हारी नई यात्रा का उद्गम बिंदु.

इसके बाद भी हमारे जीवन में कई लोग आएँगे, जाएंगे लेकिन उनका आना और जाना बस उन साँसों की तरह होगा जो जीवन को संचालित करने के लिए ज़रूरी होता है. लेकिन हमारी दो चेतनाओं के एक परमचेतना में एकाकार होने से निकला प्रेम-अमृत तुम्हारे नाभि कुण्ड में सुरक्षित हो चुका है. जिसके लिए मेरे शब्दों ने इस कविता की काया को पाया कि –

तुम मेरी चार दिशाओं में उपस्थित महाकुंभ हो, मैं तुम्हारी प्रेम नदी

तुम मेरी चार दिशाओं में उपस्थित महाकुंभ हो,
जो हर बारह जन्म के कुम्भ काल में आते हो
और मेरी प्रेम नदी इतनी पवित्र हो जाती है
कि लाखों लोग उसमें डुबकी लगाकर
अपने पाप को मुझमें विसर्जित कर
मेरे पुण्य आशीर्वाद को प्राप्त होते हैं

मैं तुम्हारी उज्जयिनी हूँ, मैं ही नासिक
मैं ही प्रयाग और तुम मेरे ‘हरिद्वार’

जब जब ये कुम्भ योग बनेगा
हमारे प्रेम अमृत की रक्षा के लिए
सूर्य, चंद्र और बृहस्पति मेरी राशि पर अवतरित होंगे
और बचा ले जाएंगे इसे अपात्रों के हाथ लगने से

मेरे प्रेम देवता, इस अमृत को तुम तक पहुँचाने के लिए
हर बार पीड़ा का विष मुझे ही पीना है
ताकि मैं रहूँ न रहूँ, ये प्रेम अमृत रूपी धरोहर
तुम धारण कर सको अपनी नाभि में

जब जब सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियों के संघर्ष से
अमृत निकले, तुम मेरा मोहिनी रूप धरकर
इस रहस्य को बाँट आना
प्रेम-अमृत के लिए तरसते मानवीय देवी देवताओं में

तुम पूरे खाली होकर भी आओगे
तब भी मुझे हमेशा स्वीकार्य रहोगे
मैं भी तो लोगों के कुम्भ स्नान के बाद
पाप से भरी रहूँगी….

तुम मेरी चार दिशाओं में उपस्थित महाकुंभ हो, मैं तुम्हारी प्रेम नदी

सबसे अच्छी मौन की भाषा -2 : कुण्डलिनी जागरण और स्वप्न प्रयोग

कुछ कहानियों का अधूरा रह जाना ही उनकी पूर्णता है!

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