रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय

पिछले दिनों राहुल गाँधी ने खाड़ी देश बहरीन की यात्रा की . कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान बहरीन में राहुल गांधी ने वहां एक कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए अपने देश की वर्तमान सरकार की खासी बुराई की. उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार गरीबी हटाने, रोजगार देने और शिक्षा-व्यवस्था में सुधार लाने के बजाय नफरत फैलाने और समाज को जातियों में बांटने का काम कर रही है.

उन्होंने आगे कहा कि मैं यहां आप लोगों को यह बताने के लिए आया हूं कि आप हमारे लिए बहुत महत्व रखते हैं, हमारे घर में बड़ा खतरा है और आप हमारे लिए समाधान का हिस्सा हो सकते हैं.

कितना अच्छा होता अगर राहुल गांधी अपने घर की बातें दूसरे के घर में जाकर न करते. क्या बहरीन के नागरिक यहाँ आकर वोट देकर सत्ता-परिवर्तन करेंगे?कौन नहीं जानता कि बहरीन में राजशाही है,अपने देश जैसी लोकशाही नहीं.

उस देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार, अभिव्यक्ति की आज़ादी, न्यायपालिका की स्वायत्तता आदि हमारे देश जैसी लोकतांत्रिक नहीं है.ऐसे देश में जाकर फरियाद करने से क्या फायदा? कांग्रेस अध्यक्ष को अपने ही देश में अपने ही लोगों से संवाद करना चाहिए और आत्म-निरीक्षण कर पार्टी को मजबूत करने के उपाय खोजने चाहिए.

कविवर रहीम का दोहा याद आ रहा है: “रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय, सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय.” यानी रहीम कहते हैं कि अपने मन के दुःख को मन के भीतर ही छिपा कर रखना चाहिए. दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने वाला कोई नहीं होता है.

जो लोग अपने दुखों को अपने तक सीमित न रखकर दूसरों से अपनी व्यथा को साझा करते है, वे खुद ही अपना मजाक उडवाते और हँसी का पात्र बनते हैं. अपनी हार को अपने मन में गुप्‍त रखना चाह‌िए और जीत की योजना बनाकर फ‌िर से तैयारी करनी चाह‌िए. जो लोग अपनी हार का दुख मनाने बैठ जाते हैं और दूसरों से इस को साझा करते है,वे जीवन में कभी जीत नहीं पाते हैं और दूसरों के बीच हंसी के पात्र बनते हैं.

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