वामियों ने बुद्धिविलासी होना स्वीकार किया ताकि विज्ञान से कट सके समाज

शुद्ध अकादमिक रोमांस प्रायः मार्क्सवाद सी अनुभूति प्रदान करता है. मजाक नहीं कर रहा हूँ. आप स्वयं ट्राई कीजिये, मेलोडी खायेंगे तो खुद जान जायेंगे.

परमाणु युद्ध और उसके आसपास घूमती विवेचनाएँ ऐसे ही रोमांस का एक अंग हैं.

शीत युद्ध के समय अमरीकी बच्चों को स्कूलों में सिखाया जाता था कि जब रूस परमाणु हमला करेगा तो क्या करना होगा.

सन ’45 के पश्चात किसी भी देश ने आणविक अस्त्रों का प्रयोग किसी अन्य देश पर नहीं किया है फिर भी ‘अप्रसार’ तथा ‘निरस्त्रीकरण’ का पाठ प्रत्येक विश्वविद्यालय में जोर-शोर से पढ़ाया जाता है.

अमरीका ने बम बनाया तो रूस को मिर्ची लग गयी. चीन ने बनाया तो भारत ने भी बनाया. भारत ने बम बनाया तो पाकिस्तान जल गया.

फिर आरंभ हुआ साउथ-ईस्ट एशिया में शक्ति संतुलन किस प्रकार बिगड़ रहा है इस पर विवेचना की बकैती करने का दौर.

विश्वविद्यालयों में Nuclear Disarmament और Non-proliferation पर जमकर शोध किया गया. मोटी-मोटी पुस्तकें लिखी गयीं.

सुमित गांगुली और एस पॉल कपूर ने भारत-पाकिस्तान के मध्य परमाणु युद्ध की संभावनाओं पर प्रश्नोत्तरी के स्वरूप में पुस्तक लिखी.

और भी बहुत कुछ लिखा गया और दशकों तक विश्लेषणात्मक टीका-टिप्पणी प्रकाशित की गयी. किन्तु इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष लाभ क्या हुआ यह किसी को ज्ञात नहीं.

परमाणु युद्ध की आशंकाओं पर इतनी बुद्धि व्यय करने के उपरान्त कोई बहुत बड़ी पॉलिटिकल थ्योरी विकसित नहीं हुई न ही शक्ति संतुलन पर समाधान प्राप्त हुआ.

मेरे विचार से इसी को ‘बुद्धिविलासिता’ कहा जा सकता है. प्रो. कपिल कपूर बुद्धिजीवियों को बुद्धि बेचकर जीविका कमाने वाला कहते हैं.

इस प्रपंच में विज्ञान के उन विषयों पर नीतिगत शोध नहीं हुआ जिनसे जनता का सीधा सरोकार था. साइंस पॉलिसी पर शोध लेबोरेटरी में नहीं होता. यह विज्ञान के सामाजिक पक्षों के अध्येता सोशल साइंसेज़ फैकल्टी में पढ़ते हैं.

विज्ञान को समाज से जोड़ने का कार्य इंडस्ट्री का है. भारत में उद्योग जगत सदैव उपेक्षित रहा है. इसी का लाभ लेकर सरकारी सलाहकार जिनपर सरकार को दिशा देने दायित्व था उन्होंने बेकार के विषयों पर मंथन किया और देश को भ्रमित किया.

सरकार का दृष्टिकोण पूर्णतः विज्ञान की उपलब्धियों पर गाल बजाना नहीं होता अपितु उस अविष्कार का साधारण जनमानस के लिए क्या उपयोग है इस पर केन्द्रित होता है.

दुर्भाग्य से साइंस पॉलिसी के संस्थान वामपंथी गिरोह के खेमे के अधीन हैं और वामी गिरोह का कार्य प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान को गाली देना ही रहा है. उनकी समूची ऊर्जा इसी पर खर्च होती है कि भारत के प्राचीन ज्ञान को किस प्रकार ‘छद्म’ तथा महत्वहीन सिद्ध किया जाए.

केमिस्ट्री और कम्प्यूटर साइंस आज के उद्योग जगत की रीढ़ हैं. किन्तु प्रोग्रेसिव सोच के ‘साइंस फिलॉसफर’ इन विषयों पर बात नहीं करते.

उदाहरण के लिए जनेवि में साइंस पॉलिसी के शिक्षक कभी इस पर शोध नहीं करते कि देश में ‘रसायनशास्त्र’ की किन विधाओं पर शोध हो जिससे इंडस्ट्री को लाभ पहुँचे. वे कभी स्पेस साइंस, साइबर सिक्यूरिटी, रोबोटिक्स अथवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्ट सिटी आदि पर बात नहीं करते.

अंतर्राष्ट्रीय सम्बंध विभाग के अध्ययन क्षेत्र में साइंस डिप्लोमेसी शायद ही दिखाई दे. इक्का-दुक्का अध्येता अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों पर तकनीक के प्रभाव पर निम्न स्तरीय पेपर लिखते मिल जायेंगे जो इधर-उधर से कॉपी पेस्ट किया गया होता है.

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात का इतिहास देखिये तो ज्ञात होगा कि माओवाद-नक्सलवाद का विस्तार देश के उन्हीं क्षेत्रों में हुआ जहाँ प्राकृतिक एवं खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं.

खनिज और जंगल के उत्पाद उद्योग में वृद्धि करते हैं. उद्योग होगा तो आर्थिक सम्पन्नता होगी. देश आर्थिक रूप से समृद्ध हो यह वामपंथी कैसे होने देंगे? इसीलिए इन्होंने बुद्धिविलासी होना स्वीकार किया ताकि विज्ञान का समाज से कटाव हो सके.

जनता को यही लगा कि विज्ञान तो समाज के किसी काम का नहीं है. यह सोचते हुए व्यक्ति अपनी जड़ों को ढूंढता है और वैदिक काल में पहुँच जाता है. वहाँ उसे गर्व की अनुभूति होती है.

वह सोचता है कि अरे यार, हज़ारों साल पहले तो हम इतने संपन्न थे. तत्पश्चात कुंठा जन्म लेती है. व्यक्ति आधुनिक अविष्कारों को वेदों में खोजने की चेष्टा करता है और पुनः वामपंथी चक्रव्यूह में फंस जाता है जब उसकी हंसी उड़ाई जाती है.

फेसबुक पर ही किसी ने लिखा था कि हमने 70 वर्षों में आयुर्वेद में कोई नयी खोज नहीं की, हम यही सिद्ध करने में लगे रहे कि प्राचीन ज्ञान अच्छा था और आज का कथित ‘आधुनिक’ विज्ञान बेकार है.

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