घोघाबापा का प्रेत – 14

गतांक से आगे…

वन में अग्निदहन से जो कुछ खाद्य सामग्री इत्यादि बच गई थी, उसको बचाने की कोशिश करते हुए डरी सहमी यवन सेना ने मैदान में पड़ाव डाला.

इतने में सूर्योदय हो ही चुका था. घायलों का उपचार इत्यादि शुरू कर दिया गया. महमूद पहले से ही घायल था.

अग्निकाण्ड का और बुरा प्रभाव हुआ, सेना का मनोबल वापस लाने के पहले उसको स्वयं ठीक होना जरुरी था.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

उसने सारे सिपहसालारों सहित मसूद को आदेश दे दिया कि जैसे ही गुप्तचर कोई सुरक्षित रास्ता ढूंढ लें, मुझे तुरंत समाचार मिलना चाहिए तथा कैसे भी करके सेना का मनोबल और उत्साह बढ़ाने के उपाय किये जाएं.

परन्तु जो भी गुप्तचर लौट कर आ पाया उसने यही बताया कि अभी शीघ्रता के लिए घाटी से होकर जाना ही सर्वोत्तम है. सेना बहुत बड़ी है, अगर हम पहाड़ियों के पीछे से निकले तो एक पखवाड़े का समय लग सकता है, तथा आसान और समतल रास्ते वह भी नहीं होंगे.

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

महमूद ने सेना में ढिंढोरा पिटवा दिया कि यह आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है, इसलिए केवल आज की रात यहाँ पर हम लोग रुकेंगे, तथा कल प्रातः ही हम घाटी में प्रवेश करेंगे. जितना शीघ्र हो सके, घाटी से निकल कर ही विश्राम किया जाना उचित रहेगा, अतः आज की रात सब लोग पर्याप्त मशालें जलाकर चौकन्ने रहें.

इधर सामन्त ने अपनी प्रेतसेना को भी योजनानुसार तीन टुकड़ियों में विभक्त किया. पहली और दूसरी टुकड़ी दोनों पहाड़ियों के सघन वन में, तीरों और पत्थरों के साथ छुप कर तैयार बैठी थी.

तीसरी टुकड़ी में सामन्त और आचार्य विष्णुदत्त स्वयं थे. इस टुकड़ी का कार्य अत्यंत ही दुस्साहस भरा होना था. निर्णय यह हुआ था कि समूची यवन सेना के घाटी में उतर जाने के बाद ही आक्रमण किया जाय ताकि सुल्तान और खजाना दोनों ही न बच सकें.

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

अतः तीसरी टुकड़ी, बिना किसी शोर के, वन में खुद को यत्नपूर्वक छिपाते हुए यवन सेना के घाटी में उतर जाने की प्रतीक्षा करने लगी,

अगले दिन महमूद को जैसे खतरे का आभास हो गया, उसने अलसुबह के अँधेरे में ही सेना को कूच करने का आदेश दे दिया, अनुमानतः यह बीस से पच्चीस कदम चौड़ी घाटी थी, जो कहीं अधिक चौड़ी थी, तो कहीं थोड़ी संकरी हो जाती थी.

महमूद ने ठीक वैसी ही योजना बनाई कि सेना के पहले हिस्से में वो अपने अंगरक्षकों के साथ उनके मध्य चलेगा, दूसरे में सेना के पैदल सैनिक होंगे और तीसरे तथा पीछे वाले हिस्से में खजाने रहेंगे.

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

पालकियों के साथ, सारी यवन सेना एक विशालकाय अजगर की भांति, शनैः शनैः उस घाटी में प्रवेश कर गई. यह देख कर, यवन सेना के पीछे वन में छिपे खड़े आचार्य विष्णुदत्त ने अपनी कमर में बांधा हुआ विशालकाय ‘रूद्र शंख’ निकाल कर उसको फूंक दिया.

उस शंख के गर्जन ने मानो दिशाएं गुंजित कर दीं. उस शंख की आवाज महमूद के कानों तक भी पहुंची, वो तत्क्षण समझ गया कि उसकी सेना, बहुत ही चतुराई से इस संकरी घाटी में घेर ली गई है, परन्तु उसने भी एक चातुर्य कर रखा था, जिसका किसी को भान ही नहीं हो सका.

सबको यही पता था कि महमूद अपने श्रेष्ठ सिपहसालारों के साथ, सेना के बीच में हाथियों पर रखी पालकियों में बैठा हुआ है, जबकि ऐसा था नहीं. वो साधारण सैनिकों के भेष में अपने सिपहसालारों के साथ, तेज चपल घोड़ों पर सबसे आगे-आगे चल रहा था.

[घोघाबापा का प्रेत – 5]

जैसे ही उसने शंख का भीषण जयघोष सुना, उसने तुरंत ही ऊपर पहाड़ियों पर तीक्ष्ण दृष्टि डाली, उसकी दृष्टि से पहाड़ियों पर चींटियों की तरह छुप कर रेंगते प्रेत सैनिक बच नहीं सके. महमूद इस व्यवस्था को देखते ही काँप उठा, और अपनी सेना को शीघ्रता का आदेश देते हुए, उस घुटने तक जल वाली नदी में अपना घोड़ा कुदा दिया.

क्षण भर में ही ऊपर से तीरों और पत्थरों की वर्षा आरम्भ हो गई. सम्पूर्ण यवन सेना में भगदड़ मच गई, परन्तु भागने और बचने का केवल एक ही रास्ता दिख रहा था, और वो था आगे की ओर बढ़ना.

अगल-बगल दोनों ओर तो अगम पहाड़ियां थीं, और शंखनाद पीछे से ही हुआ था तो निश्चित ही केवल आगे बढ़ना ही जीवित बच निकलने का रास्ता था.

सम्पूर्ण यवन सेना अपनी जान की बाजी लगाकर अपने ही सैनिकों, घोड़ों, हाथियों के ऊपर से होकर, यथाशीघ्र सामने के विशाल मैदान में पहुँच जाना चाहती थी. कितने इसी भगदड़ में अपनों द्वारा ही कुचल कर मारे गए.

अधिकांश जो बच रहे थे, वो ऊपर से तीर और पत्थरों की वर्षा से काल कवलित हुए जा रहे थे. पत्थरों की वर्षा से बचना तो तुलनात्मक रूप से आसान था, परन्तु तीरों की वर्षा बड़ी भयानक थी.

[घोघाबापा का प्रेत – 6]

पहले से घायल महमूद को पुनः कुछ तीर पीछे से लगे, लेकिन उसका ताकतवर घोड़ा इस बार महमूद को हवा की गति से उस घाटी से निकाल ले गया.

मनुष्य हो या पशु, सर्वाधिक भय तभी लगता है जब वो अपने हमलावर के विरुद्ध कुछ कर न सकें, अगर प्रत्युत्तर दिया जा सके, तो भय कम होने लगता है. यहाँ यवन सेना का यही हाल था, उनको दुश्मन नजर ही नहीं आ रहा था. अतः उनको सिर्फ शीघ्रातिशीघ्र भाग कर ही जान बचाना एक ठीक उपाय लगा,

पीछे उचित समय देखकर सामन्त और विष्णुदत्त ने मिलकर महमूद का खजाना बड़ी आसानी से लूट लिया, क्योंकि सारे सैनिक तो अपनी जान बचाने की कवायद में भागे चले जा रहे थे.

इस प्रकार सामन्त एक बार पुनः अपने एक भी सैनिक को खोये बिना, महमूद की सेना को एक स्थायी क्षति पहुंचा चुका था. परन्तु हताहतों की गिनती और पहचान करने से उसको ज्ञात हुआ, कि महमूद और उसके मुख्य सिपहसालार, इस बार भी बच निकले हैं.

[घोघाबापा का प्रेत – 7]

अपनी इस असफलता से सामन्त क्रोध और निराशा के भंवर में डूबने ही जा रहा था कि आचार्य विष्णुदत्त ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसको दिलासा देते हुए कहा, “सामन्त, व्यर्थ का विषाद न पालो पुत्र, हम अपना कार्य, पूरी निष्ठा और वीरता से कर रहे हैं, यह तो महमूद का भाग्य है जो वो हर बार काल के मुंह से निकल जाता है, संभव है कि सोमनाथ की यही इच्छा हो.“

सामन्त ने सायास खुद को व्यवस्थित किया और आचार्य विष्णुदत्त तथा राजगुरु नंदीदत्त से कहा, “आचार्यवर, अब आप लोग यह खजाना लेकर शीघ्रातिशीघ्र पाटन के महाराज भीमदेव के पास पहुँच कर, उन्हें हालात से अवगत कराएँ, तथा तैयार रहने के लिए कहें. मेरे कुछ सैनिक आपके साथ खजाने की सुरक्षा के लिए जायेंगे. मैं यहीं रहकर महमूद की सेना की गतिविधि पर ध्यान रखूँगा. वैसे भी अभी महमूद तथा उसकी सेना को संभलते-संभलते कम से कम एक पखवाड़ा तो अवश्य लगेगा. तत्पश्चात ही वह यहाँ से प्रस्थान करेगा.”

[घोघाबापा का प्रेत – 8]

नंदीदत्त ने इनकार में सिर हिलाया और कहा, “पुत्र, तुम्हारी योजना अच्छी है परन्तु इसमें मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ कि खजाना लेकर सैनिकों के साथ मैं चला जाता हूँ, लेकिन मेरी राय यह है कि आचार्य को तुम अपने साथ ही रखो. आचार्य इस भूभाग में वर्षों से रह रहे हैं अतः ये तुम्हें यहाँ की भौगोलिक परिस्थिति के बारे में अच्छी सूचना दे सकते हैं, और अच्छे योद्धा तो ये हैं ही.”

सामन्त ने कोई प्रतिवाद नहीं किया और हाथ जोड़कर कह उठा, “आचार्य का अधिक से अधिक सानिध्य तो मेरे लिए श्रेयस्कर ही होगा. मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझूंगा अगर ये हमारे साथ रहे तो. परन्तु बाबा, हम तो ठहरे अब प्रेत सैनिक, रात हमारी पेड़ों पर बीते या घोड़ों पर, नदी के पानी में या पत्थरों पर बैठकर, हमें कोई चिंता नहीं है. परन्तु विप्र आचार्य….?”

विष्णुदत्त कुपित होने के बजाय मुस्कुरा कर बोले, “पुत्र सामन्त, इस विप्र का शरीर पंचाग्नि में तपकर, भीषण वर्षा, हिमाद्री शीत इत्यादि में भी अचल रहा है अपनी तपश्चर्या में. तुम मेरी चिंता तनिक भी न करो.”

आचार्य ने राजगुरु की ओर मुड़कर कहा, “अग्रज आप यहाँ से शीघ्र प्रस्थान करें.”

[घोघाबापा का प्रेत – 9]

उधर महमूद की सेना सामने मैदान में ऐसे थर थर कांपती खड़ी थी, जैसे किसी कुत्ते को पानी में भिगो भिगो कर डंडों से पीटा गया हो. उसका लगभग सारा खजाना छिन चुका था.

कितने ही हाथी-घोड़े-सैनिक उस भीषण पत्थरों और तीरों की वर्षा की चपेट में आ चुके थे. सारी सेना ही सकते की हालत में थी. पहले अजमेर के युद्ध की भीषण पराजय, फिर वन का वो भयानक अग्निकांड और अब यह घाटी का छापामार युद्ध.

उसकी बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया कि, “आखिर यह सब हो क्या रहा है. कौन कर रहा है यह सबकुछ? कोई सामने भी तो नहीं आता. कहीं सच में घोघाबापा का कोई जिन्नात ही तो नहीं?:

इसके पहले भी वो हर बार यहाँ से सकुशल जीत कर शान से धन-दौलत, दास-दासियाँ, सुन्दर औरतें लूटकर वापस जा चुका था, तो इस बार आखिर ऐसा क्या हो रहा है जो कदम कदम पर उसको मौत का सामना करना पड़ रहा है. ऐसी कौन सी चमत्कारिक शक्ति है जो इस बार उसके कदम कदम पर उसको मौत के मुंह में धकेल रही है?

[घोघाबापा का प्रेत – 10]

उसने सेना को जैसे-तैसे सामने के विशाल मैदान में पड़ाव डालने का आदेश दे दिया. सिपहसालारों से कह दिया कि सैनिकों का मनोबल जैसे तैसे बढ़ाया जाय, अन्यथा अपने देश वापस पहुंचना भी संभव नहीं होगा.

मसूद ने सैनिकों को खुली छूट दे दी कि जैसे समझ आये अपना मन बहलाओ परन्तु यहाँ से अधिक दूर कोई भी अकेले न जाय. अगल बगल के गाँवों को लूटा जाने लगा, उनके धन-धान्य, स्त्रियाँ लूटी जाने लगीं. आखिर येन केन प्रकारेण खजाने को भरकर, यथाशीघ्र सेना को को सुदृढ़ करना था.

दिन में आस पास की छोटी मोटी जागीरों को भी लूटा जाता था, और रात में यवन सेना के चारण भाट, कवि गवैये इत्यादि सेना में जगह-जगह मजमा लगा कर सेना और महमूद का यशोगान करते थे.

वो यवन सेना को याद दिलाते थे कि, “यही है वो महान यवन सेना, जिसके घोड़ों के टापों तले भारत के हर राजा का गर्व कई कई बार रौंदा जा चुका है.“

इस तरह नृत्य-संगीत, कविता, ओजस्वी भाषण, धार्मिक पुस्तक से ‘काफिरों को हलाक करना ही असली बंदगी’ इत्यादि जैसे वक्तव्यों से सेना के मनोबल का स्तर पुनः उच्च करने के प्रयास शुरू हो गए.

[घोघाबापा का प्रेत – 11]

महमूद का लूटा हुआ खजाना लेकर राजगुरु नंदीदत्त पाटन पहुंचे. उनसे पहले ही प्रेत सेना की कीर्ति वहां तक पहुँच चुकी थी. दरबार में उपस्थित हर सदस्य ने भावातिरेक में हाथ जोड़कर प्रणाम किया नंदीदत्त को.

नंदीदत्त ने सबको ‘यशस्वी भवः’ का आशीर्वाद दिया. सभी लोग सामन्त चौहान के बारे में सुनने को उत्सुक थे, नंदीदत्त ने निराश नहीं किया, और आँखों देखा सब वृतांत कह सुनाया. पुनः सांयकाल की आरती के समय नंदीदत्त सोमनाथ मंदिर पहुंचे, वहां मुख्य पुजारी सर्वज्ञ जी को साष्टांग दंडवत किया.

सर्वज्ञ जी सर्वज्ञ ही थे, उन्होंने न कुछ पूछा, न नंदीदत्त को आवश्यकता पड़ी बताने की. आरती के बाद अतुल्य कमनीय सुंदरी देवदासी चौला का मनोहारी नृत्य हुआ देवों के देव महादेव के लिए, तत्पश्चात नंदीदत्त अपने विश्रामगृह पहुंचे.

[घोघाबापा का प्रेत – 12]

कुछ दिवस बीते. सामन्त चौहान, गजनवी की सेना के एकदम पास में मौजूद पहाड़ी पर एक वृक्ष के तने की ओट से महमूद की सेना की गतिविधि जांच रहा था. उसके हाथ में खोखला बांस था, जो उसने अपनी एक आँख से सटा रखा था. इस बांस के यंत्र को कारीगर ऐसे यत्न से बनाते थे जिससे दूर की वस्तुएं थोड़ी स्पष्ट दिख जाती थीं.

वो देख चुका था कि महमूद के साथ आये यवनी और मुग़ल वैद्य जी-जान से, घायल महमूद के स्वास्थ्य को सुधारने का प्रयत्न कर रहे थे. सेना के भीतर जगह जगह चिकित्सालयनुमा शिविर लग गए थे. जिससे सारे घायल सैनिकों का तेजी से उपचार चल रहा था.

अचानक उसको अपने पीछे बहुत तीव्र स्वर सुनाई दिया, “कौन है तू? और यहाँ क्या कर रहा है?”

[घोघाबाप का प्रेत – 13]

सामन्त के शरीर का समस्त रक्त तेजी से उबाल मार गया, उसकी भुजाएं अकड़ गयीं, उसके शरीर के सारे स्नायुतंत्र बहुत तेजी से चैतन्य हो गए. गाल का मांस कहीं छिप गया और चेहरे की हड्डियाँ उभर आईं. एक हाथ अपनी तलवार की मूंठ पर रखकर वो शनैः शनैः पीछे से आये स्वर की दिशा में घूमा.

उसने देखा कि सात यवनी घुड़सवार थे, बीच वाला उनका सरदार लग रहा था. इकहरे शरीर वाला वो घुड़सवार अधिक चुस्त और अपनी वीरता के गर्व में अकड़ा लग रहा था. उसने मुंह पर कपड़ा बाँध रखा था, जिससे केवल उसकी तीव्र आँखें ही दिख पा रही थीं. उसने एक लबादा ओढा हुआ था, और सीना सपाट था. सामन्त उस सरदार की आँखों में झांकता रहा, कुछ बोला नहीं.

“रे मूर्ख, जवाब क्यों नहीं देता?” फिर उस सरदार ने अपने सिपाहियों को कहा, “जल्द से इसका सिर काट कर लाओ.“

सामन्त ने वो बांस का यंत्र अपनी कमर में खोंस लिया, और अब उसके दोनों हाथ कमर में बंधी दोनों तलवारों की मूंठ पर कस गए. सरदार वहीँ खड़ा रहा घोड़े पर, और सिपाही अपने-अपने घोड़ों से कूद कर सामन्त की ओर आगे बढ़े. सामन्त और सरदार ने एक दूसरे की आँखों में घूरना नहीं छोड़ा.

धैर्य के साथ सामन्त ने उन सिपाहियों के अपने पास आने तक की प्रतीक्षा की, और तब जैसे अचानक से बिजली चमकी हो. पलक झपकने तक में सारे सैनिक जमीन पर गिरे तड़प रहे थे, और सामन्त रक्त से लाल हुई दोनों तलवारों को पकड़े हुए सरदार की आँखों में पुनः घूर रहा था.

यह देखकर सरदार की आँखों में एक क्षण के लिए प्रशंसा का भाव उभरा और शीघ्र ही विलुप्त हो गया. परन्तु सामन्त उसे पढ़ चुका था. अब सरदार धीरे-धीरे अपने घोड़े पर खड़ा हुआ, और उसके बाद यहाँ भी बिजली जैसी ही चमकी.

वो सरदार नटबाजों की तरह हवा में कलाबाजी खाते हुए अपने घोड़े से कूदा, और उसके पैर मजबूती के साथ जमीन पर आ टिके. उसने आहिस्ता से अपनी दोनों तलवारें निकालीं, और वहीँ खड़े-खड़े हवा में अपनी तलवार बाजी की चपलता दिखाने लगा.

सामन्त की आँखें हलकी सी सिकुड़ीं, जब उसने देखा कि वो सरदार किसी अत्यधिक दक्ष तलवारबाज की तरह तलवार घुमा रहा था. जिस तेजी तथा चपलता से वो चारों तरफ तलवार घुमा रहा था और खुद भी घूम रहा था, सामन्त को लग गया कि इस योद्धा से द्वन्द युद्ध रोचक होगा.

सामन्त अपनी ही जगह, उस पहाड़ी की चोटी के पास खड़ा रहा और वो योद्धा पास आता गया. पास आकर सामन्त की निश्चलता देख कर वो योद्धा एक पल को ठिठका, परन्तु अगले ही पल उसने तलवारें बरसाना प्रारंभ कर दिया सामन्त पर.

सामन्त को चैतन्य होने में क्षणांश भी नहीं लगता था, उसने अपनी तलवारों से उत्तर देना शुरू कर दिया. वातावरण में तलवारों की तीव्र चंचनाहट होने लगी. वृक्षों से पक्षी उड़ कर दूर भागने लगे.

वो योद्धा विद्युत् गति से वार कर रहा था सामन्त पर, परन्तु सामन्त स्वयं का बचाव कर ले रहा था. सामन्त ने अभी तक एक भी वार नहीं किया था, वो केवल मनोरंजन हेतु खेल रहा था उससे.

उस योद्धा में शारीरिक बल सामन्त की तुलना में कम था, अन्यथा उसकी चुस्ती फुर्ती देखकर सामन्त दंग होते हुए सोच रहा था कि अगर वो कम आँकता तो स्वयं के लिए खतरा हो सकता था.

सामन्त को उसके पिता सज्जन चौहान ने बचपन से ही ये सीख दिया था कि, “द्वन्द युद्ध में अच्छे योद्धा को सर्वप्रथम अपना बचाव करना चाहिए. विरोधी को वार कर-कर के थकने देना चाहिए. और जब विरोधी थक कर चूर हो जाए तो एक भरपूर वार करना चाहिए.” सामन्त इसी शिक्षा के अनुरूप चल रहा था.

थोड़ी देर के बाद जब वो योद्धा थकने लगा, तो सामन्त को इस खेल में आनंद आना कम हो गया. तब सामन्त उसके गले को लक्ष्य करके एक भरपूर शक्तिशाली वार कर दिया. वो योद्धा निसंदेह अत्यधिक चपल था, उसने अपनी तलवार बीच में अड़ा दिया. परन्तु सामन्त के प्रहार के वेग को झेल न सका और दूर जा गिरा.

गिरते ही सामन्त प्रेत की तेजी से उसके सिर पर पहुँच कर, सीने पर तलवार रख दिया. योद्धा चीखा, “मुझे मार सकते हो, लेकिन हरा अभी भी नहीं पाए. मैं आजीवन अविजित रहा हूँ. अगर मुझे हरा सकते हो तो उठने दो.“

उसके साहस को देखकर, सामन्त की पुतलियाँ सिकुड़ीं. कुछ सोचकर उसने उसको पुनः उठने का मौका दे दिया. अब वो योद्धा स्वयं की कमजोरी से क्षुब्ध होकर, अत्यधिक तड़ित गति से तलवार के वार करने लगा.

अब उसके वार सधे नहीं थे, अंधाधुंध थे. सामन्त को पीछे हट कर वार को बचाना पड़ रहा था. पीछे हटते-हटते ही वो गहरी खाई के मुहाने पर पहुँच गया. अब और पीछे हटना संभव नहीं था.

उधर वो योद्धा मानसिक विक्षिप्त की तरह ताबड़तोड़ प्रहार किये जा रहा था. जिससे सामन्त को क्रोध आ गया, और वो नीचे झुककर एक घेरा काटकर अति फुर्ती से उस योद्धा के पीछे पहुँच गया. अब योद्धा खाई की ओर हो गया, और इसी वक़्त सामन्त ने अपनी सारी उर्जा का उपयोग करते हुए, पुनः एक भरपूर वार उसके गले पर किया.

वो भी अविलम्ब ताड़ गया सामन्त का प्रहार, परन्तु प्रहार में इतनी तेजी थी कि उसे स्वयं को बहुत तेजी से नीचे झुकाना पड़ा बचने के लिए, लेकिन बचते-बचते भी तलवार उसकी पगड़ी को छू ही गई.

इस एक पल कई घटनाएँ तेजी से घटीं. प्रहार के वेग से वो योद्धा खाई में गिरने लगा. उसकी पगड़ी, मुंह का कपड़ा और लबादा भी अलग हुआ, और उसके मुंह से एक ‘सुरीली’ चीख निकली, “साSSSमन्त….!!”

क्षण में सामन्त ने तलवार की म्यान आगे कर दी, जिसे पकड़ कर वो योद्धा खाई में झूल गया.

सामन्त ने देखा, वो नीली आँखों वाली एक अति रूपसी युवती थी. उसके बाल सुनहले थे. सामन्त तो भौंचक्का होकर यह बदलाव देख रहा था. सामन्त को इस तरह देखकर वो फिर से कुहकी, “मुझे कब तक लटकाए रखोगे मूर्ख? ऊपर खींचो पहले.”

सामन्त ने उसको बाहर खींच लिया. वो एक शिला पर निढाल बैठ कर गहरी साँसें लेने लगी. जैसे ऊँचे आसन पर पैर लटका कर, पीठ सीधी करके बैठते हैं, वैसे बैठी. जब साँसें उसकी नियंत्रित होने लगीं तो वो अपने एक हाथ शिला पर पीछे करके, थोड़ा पीछे की ओर झुक कर अधलेटी हो गई. पलकें खुलीं हुई और आँखें दूर आसमान की गहराइयों में.

समय ठहर सा गया था, सामन्त अब भी कुछ नहीं बोला, केवल उसको देखता रहा, उसके मष्तिष्क में एक ही प्रश्न चल रहा था कि, “महमूद गजनवी का कोई व्यक्ति, सामन्त को उसके नाम और चेहरे से कैसे पहचानता है?”

क्रमशः…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY