आज दमादम मस्त कलंदर, कल गुमनामी के अंदर

दमादम मस्त कलंदर के पहले म्यूजिक डायरेक्टर आशिक हुसैन साहब की मार्मिक कहानी डॉन न्यूज की वेबसाइट पर देखने को मिली.. रिपोर्ट को पेश करने में कुछ गड़बड़ियां थीं तो थोड़ा रिसर्च करने का मन किया..

मैं ये तो जानता था कि बुल्ले शाह ने इसे लिखा था.. लेकिन जब और शोध किया तो पाया सबसे पहले अमीर खुसरों ने लिखा था फिर कुछ बदलाव बुल्ले शाह ने इसमें किए.. सिंध के सूफी संत शाहबाज कलंदर साहब की शान में ये लिखा गया था..

इस रिपोर्ट में जो दिलचस्प लगने वाली बात थी वो ये कि इसके फिल्मी वर्जन को लिखने वाले पाकिस्तान के मशहूर शायर साग़र सिद्दीकी साहब पाकिस्तान की फुटपाथ पर लावारिस मरे थे…. लगभग यही हाल इस मशहूर गीत को उसका चिर परिचित संगीत देने वाले आशिक हुसैन साहब का भी है.. जो इन्हीं हालात में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं.. उनका बेटा जो पकौड़े बनाकर घर चला रहा था वो भी अब चल बसा है..

डॉन न्यूज को भी इस कहानी में जबरदस्त मसाला दिखा… तो एक बढ़िया खबर बन गई.. हम भी कभी ए. के. हंगल तो कभी ललिता पवार, भगवान दादा, भारत भूषण और न जाने ऐसे कितने कलाकारों और एक जमाने की सेलीब्रिटीज की ऐसी कहानियों को खूब भुना चुके हैं..

इन सब कहानियों में असली मसाला है जिंदगी की एक कड़वी सच्चाई… आज जिसे देखिए मशहूर होना चाहता है… रिएलिटी शो ने तो सेलीब्रिटीज की बाढ़ ही ला दी है… लेकिन हकीकत ये है कि जल्दी मशहूर होना और अपने किसी एक काम की वजह से पहचान बनाना… इन सभी को एक दायरे में कैद कर देता है.. उससे बाहर न निकल पाना ऐसे कई लोगों की नाकामियों की कहानी है..

ये ऐसा सिद्धांत है जिससे कोई अछूता नहीं रहने वाला… जिन्हें आज आप बड़े नामों के तौर पर देख रहे हैं उनकी कहानी कोई बहुत अलग नहीं रहने वाली है.. इसीलिए बहुत जल्दबाजी में अपने खात्मे के पहले वो अपने बच्चों को अपनी जगह बैठा देने की जद्दोजेहद में दिखाई पड़ते हैं…

मुझे ये सारी बातें लिखने की गरज इसीलिए महसूस हुई कि कुछ लिखने के बहाने आत्म मंथन ही हो जाएगा.. और ये तुलसी बाबा की तरह स्वांत्यसुखाय ज्ञान ही है.. किसी सहमति या असहमति की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती…. कुछ खबरें भीतर तक हिला देती हैं.. और सच का आईना भी दिखा देती हैं..

ऐसी ही खबर दमादम मस्त कलंदर के मूल संगीतकार की बदहाली है.. निश्चित तौर पर बुल्ले शाह, अमीर खुसरो आदी का जीवन भी ऐशो आराम का नहीं था लेकिन एक बड़ा फर्क ये था कि उन्होंने फकीरी की हकीकत को समझकर उसका मजा लिया था.. यहीं मशहूर होने वाले चूक जाते हैं वो एक बार मशहूर होते हैं तो सोचते हैं ये काम अब पूरी जिंदगी काम आएगा..

उनका काम तो कई बार अमीर हो जाता है लेकिन इससे उनकी जिंदगी पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ता…. एक कार्यक्रम के दौरान अपने भावुक भाषण में राजेश खन्ना ने आज के दौर के कई सितारों की मौजूदगी में कहा था… इज्जतें, शोहरतें, उल्फतें, चाहतें सबकुछ इस दुनिया में रहता नहीं, आज मैं हूं जहां, कल कोई और था, ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था…

इस कार्यक्रम में विनोद खन्ना भी मौजूद थे.. कुछ दिनों बाद उनकी तस्वीरें भी वाइरल हुई.. चाहे राजेश खन्ना हों या विनोद खन्ना.. या ऐसे कई सितारे.. इन सभी के मार्मिक अंत से लोग बहुत प्रभावित होते हैं… वजह है इनका किसी समय पर बहुत शोहरतमंद होना और उस शोहरत को सहेज न पाना…

दरअसल शोहरत को सहेजने की जद्दोजेहद से ही समस्या की शुरूआत होती है… किसी काम को करें आगे बढ़ें और ठीक वैसे ही रहें जैसे कि काम को करने के पहले तब तो बात ठीक रहती है.. आपकी वो प्रतिभा बची रहती है.. लेकिन आप कुछ हो गए हैं.. आपने कुछ पा लिया है.. अब आपका कुछ सम्मान है जैसी गलतफहमियों से समस्या की शुरूआत होती है और उसका अंत उन सभी देखा है जहां पहुंचने की भागदौड़ में कई महत्वाकांक्षी सितारे लगे हुए हैं…

निश्चित तौर पर ऐसी कहानियां आती रहेंगी और मुझे कोई विशेष संवेदना भी ऐसे सितारों के प्रति महसूस नहीं होती क्यूंकि उन्हें मशहूर माने रखना लोगों की मजबूरी नहीं है.. वैसे भी वाहवाही करने वालों से ज्यादा दगाबाजा कौम कोई और नहीं होती.. जैसे ही सितारे अर्श से फर्श पर आते हैं सबसे ज्यादा मजा सितारों के इन फैन्स को ही आता है क्यूंकि अब उन्हें इन सितारों के बुझने की कहानियों में रस आने लगता है…

दमादम मस्त कलंदर का मतलब आशिक साहब जान जाते तो बेहतर होता.. मदद की उम्मीद तो बेमानी है….

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