व्यंग्य : स्नान पुराण

आप इतिहास, भूगोल जो-जो आप इस ठंड में उठा सकें, सब उठा कर देख लें. उन्हीं मुल्कों ने तरक्की की है जहाँ के बाशिंदे नहाते नहीं हैं.

नहाते नहीं से मेरा मतलब, जो रोज़ नहीं नहाते. अमेरिका हो, जर्मनी हो, जापान हो, इंगलैंड हो यहाँ के रहने वालो से पूछ कर देखिये. उन्हे रोज़ नहाने जैसी बात से ही ताज्जुब होगा.

वैसे मुझे कभी इस बात पर भी ताज्जुब होता था कि इन ठंडे मुल्क के रहने वालों ने अपने पाँव पूरी दुनिया में कैसे फैला रखे हैं.

ठंड के मौसम में तो हम अपने कम्बल में भी पाँव फैला नहीं पाते. मेरे ख्याल से ये केवल रोज़ ना नहाने की नीति से ही मुमकिन हो सका है.

पानी ही वो चीज़ है जो ठंड के डर को सौ गुना तक बढ़ा देती है. पिछले हज़ारों साल से हमारी मांएं बच्चों को सुबह सुबह ही नहाने का फरमान सुनाती आई हैं.

बच्चा धड़कता दिल लिये रजाई में पड़ा रहता है. डरते-डरते बड़ा होता है और फिर मन में बैठा यही डर उसे ज़िंदगी भर कभी कुछ नया नहीं करने देता.

इसी डर की वजह से हम हमेशा रजाई में घुसे रह गये और इन ठंडे देशों के रोज़ ना नहाने वाले हम पर सैकड़ों सालों तक राज करते रहे.

हम नहाने के ऐसे धुनी हुए कि नहाते ही रह गये. ये भी नहीं सोचा हमने कि दुनिया में नहाने के अलावा और भी बहुत से करने लायक काम है.

हमने ये भी नहीं सोचा कि नहाने के लिये पानी बचा रहे ये भी ज़रूरी है. नहा-नहा कर हमने इस देश की सारी नदियाँ, कुयें, तालाब, बावड़ियां खाली कर दीं. उन पर कॉलोनियाँ तान दी, बोरिंग कर-कर के ज़मीन का सारा पानी चूस लिया और अब आजकल नगर निगमों के मँहगे टैंकर के पानी से नहा रहे हैं.

ठंडे मुल्कों में रहने लोग इतने समझदार होते हैं कि नहाने की बात तो छोड़िये, पीने के लिये भी पानी का इस्तेमाल नहीं करते. ये जानते है कि दुनिया में पानी की कमी है इसलिये बीयर पीकर ही जिंदा रह लेते हैं.

रूस ने यही गलती की. हमारी देखा-देखी रोज़-रोज़ नहाने लगे रूसी. नतीजा देख ही रहे हैं हम लोग. दस टुकडे हो चुके उस महान देश के, अब कोई पूछता नहीं उन्हे.

रूस की दुर्दशा देख चीन की सरकार ने समझदारी दिखाई. बता दिया पब्लिक को कि बस माओ के जन्मदिन और मरणदिन पर ही नहाना है.

वहाँ की सरकार हमारे बापों से ज्यादा सख्त है. उसकी बात ना मानो तो लातों के साथ गोली भी लगने की ग्यारंटी है.

चीनियों ने अपनी सरकार की बात मानी. बिना नहाये-धोये, भूतो की तरह काम मे जुटे और नतीजा आप देख ही रहे है. हमारा सारा धन बह-बह कर चीन की तरफ चला जा रहा है.

वो सुबह-सुबह हमारे यहाँ सड़क बनाने चले आते हैं और हम केवल इसलिये अपनी रजाई से बाहर नहीं निकलते क्योंकि रजाई से निकलने का मतलब नहाना होता है.

और चीन ही क्यों उत्तर कोरिया वाले किम जोंग ने भी नहाने में लगने वक्त को मिसाईल बनाने मे लगाया. ना खुद नहाता है वो कभी ना अपने देशवासियों को नहाने देता है.

सोचिये यदि वो नहाता रह जाता तो क्या ट्रंप को डरा पाता. दरअसल ये रोज़-रोज़ ना नहाने वालों के बीच का झगडा है और इसमें वही जीतेगा जिसने दूसरों से कम बाथरूम इस्तेमाल किया होगा.

हमारी और हमारे बाप दादाओं की अम्माएं तो गलती कर चुकीं. ना वो हमें रोज़ नहाने के लिये मजबूर करतीं, ना हम इतने डरपोक होते.

नहाने के अंहकार ने हमें पसीना बहाने से रोका. नतीजतन देश लम्बे अरसे तक गुलाम रहा और अब तक ना नहाने वालों जितना अमीर और बहादुर ही नहीं हो पाया है.

इन सभी मुद्दों पर सोच-विचार करने के बाद आजकल की मम्मियों को मेरी यही सलाह है कि वे अपने बच्चों को नहाने के डर के साथ बड़ा ना करें. हमारे देश की तरक्की का, एकता-अंखडता का यही इकलौता रास्ता है. और ये रास्ता चाहे जहाँ से होकर गुज़रता हो, बाथरूम से होकर तो हरगिज़ नहीं गुज़रता.

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