कसप : एक कसक

यों अगर आप इस शीर्षक से चौंके हों तो भी कोई हर्ज नहीं. चौंका होना प्रेम की लाक्षणिक स्थिति जो है. जिन्दगी की घास खोजने में जुटे हुए हम जब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं, तभी प्यार का जन्म होता है.

या शायद इसे यों कहना चाहिए कि वह प्यार ही है जिसकी पीछे से आकर हमारी आँखें गदोलियों से ढँक देना हमें चौंकाकर बाध्य करता है कि घड़ी-दो घड़ी घास, घाम और खुरपा भूल जायें. चौंककर जो होता है उस प्यार को समझने में आपका स्वयं थोड़ा चौंका हुआ होना कदाचित सहायक ही हो.

ये बात जोशी जी जानते थे, बल्कि बहुत अच्छे से जानते थे सो खुद कह बैठे,

“इस कथा के जो भी सूझे मुझे शीर्षक विचित्र सूझे. कदाचित इसलिए कि इसे सीधी-सादी कहानी के पात्र सीधा-सपाट सोचने में असमर्थ रहे. या इसलिए कि यहाँ अपने एकाकीपन में न रम पाता हुआ मैं, द्वितीय की इच्छा करते हुए, किसी अन्य की भी पहले की गयी ऐसी ही इच्छा का अनुसरण करते हुए, स्वयं सीधी-सपाट सोचने में असमर्थ हो चला हूँ. तो विचित्र ही सूझे हैं शीर्षक, विचित्र ही रख भी, दिया है शीर्षक. किंतु मात्र आपको चौंकाने के लिए नहीं. आपकी तरह मैं भी मात्र चौंकानेवाले साहित्य का विरोधी हूँ. बल्कि मुझे तो समस्त ऐसे साहित्य से आपत्ति है जो मात्र यही या वही करने की कसम खाये हुए हो.“

यह कहानी भी हिल-स्टेशन नैनीताल में शुरू हो रही है. नायक-नायिका, डाक-बँगले में तो नहीं, बँगले में जरूर हैं. बँगला न नायिका का है, न नायक का. नायक भोंदू सा है और अपनी तीन एकतरफा विफल प्रेम कहानियों के बाद हार के जीन सिमंस से प्यार कर बैठा है क्यूंकि वहां कोई देखने वाला नहीं और फिर आखिरकार नायिका से मुलाकात होती है उसी बंगले में जहाँ नायिका के मौसा ने, जो नायक के बहुत दूर-दराज के चाचा भी हैं, अपनी बेटी के विवाह के निमित्त चार दिन के लिए ले रखा है.

नगरवासी इसे वर्त्तमान मालकिन के रूप-स्वभाव को लक्ष्य-कर भिसूँणी (फूहड़) रानी की कोठी कहते हैं, लेकिन अगर आप, नायक की तरह, कभी बँगले की ओर फूटनेवाली पगडण्डी की शुरुआत पर पाँगर1 के पेड़-तले स्थापित पत्थर की काई हटायें, तो इस बँगले का वह नाम पढ़ सकेंगे जो इस कथा के अधिक अनुकूल है- ‘राँदे वू’ –संकेत-स्थल.

कसप मनोहरश्याम जोशी वस्तुतः एक प्रेम-कथा है ‘कसप’. भाषा की दृष्टि से कुछ नवीनता लिए हुए. कुमाऊँनी के शब्दों से सजी ‘कसप’ की हिन्दी चमत्कृत करती है. इसी कुमाऊँनी मिश्रित हिन्दी में मनोहरश्याम जोशी ने कुमाऊँनी जीवन का चित्ताकर्षक चित्र उकेरा है – ‘कसप’ में. समीक्षकों ने ‘कसप’ को प्रेमाख्यानों में अज्ञेय के उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा है.

1910 के काशी से लेकर 1980 के हॉलीवुड तक की अनुगूँजों से भरा, गँवई, अनाथ, भावुक साहित्य-सिनेमा अनुरागी लड़के और काशी के समृद्ध शास्त्रियों की सिरचढ़ी, खिलन्दड़, दबंग लड़की के संक्षिप्त प्रेम की विस्तृत कहानी सुनानेवाला यह उपन्यास एक विचित्र-सा उदास-उदास, मीठा-मीठा-सा प्रभाव मन पर छोड़ता है. ऐसा प्रभाव जो ठीक कैसा है, यह पूछे जाने पर एक ही उत्तर सूझता है – ‘कसप!…और कुमाऊँनी में ‘कसप’ का मतलब होता है – ‘पता नहीं!’

पढ़ने में हिंदी पाठक को भी थोड़ी तकलीफ शुरू में आ सकती है पर जोशी जी ने जानते हुए कुमाऊँनी शब्दों के अर्थ ही दे दिए अपने पाठको के लिए . पर धीरे धीरे आप बहते चले जाय्नेग उन पगडंडियों पर जहाँ नायक दौड़ता है भागता है और फिर लौट लौट के नायिका के पास आता है .

नायिका जिस समय पैदा हुई थी पिताश्री एक मलेच्छ कन्या को देवभाषा ही नहीं वेद भी पढ़ा देने का दुस्साहस कर रहे थे, मालवीयजी के ‘नरो-वा-कुंजरों-वा’ आदेश पर, और वह मलेच्छ कन्या इस बच्ची को बेबी कहती थी. यह नाम उनके बड़े बेटे को, जो सेना में भरती होना चाह रहा था, पूरा अंग्रेज था, पसन्द आया था. उसके आग्रह से यही नाम चल भी गया.

बेबी अपना नाम सार्थक करने में यकीन रखती है. खिलन्दड़ है. लडकैंधी है. पेड़ पर चढ़ना हो, गुल्ली-डण्डा खेलना हो, कुश्ती लड़ना हो, कबड्डी खेलनी हो, बेबी हमेशा हाजिर है. उसके बायें हाथ की छोटी अँगुली क्रिकेट खेलने में टूटी है और अब थोड़ी-सी मुड़ी हुई रहती है. बेबी बैडमिण्टन में जिला-स्तर की चैम्पियन है, यह बात अलग है कि इस जिले में बैडमिण्टन स्तरीय नहीं !

नायक का नाम देवादत्त तिवारी है. बहुत गैर-रूमानी मालूम होता है उसे अपना यह नाम. यों साहित्यिक प्राणी होने के नाते वह जानता है कि देवदास, ऐसे ही निकम्मे नाम के बावजूद, अमर प्रेमी का पद प्राप्त कर सका. इससे आशा बँधती है. फिर भी निरापद यही है कि वह अपने को डी.डी. कहना-कहलाना पसन्द करे. इस पसन्द को कुछ मसखरे मित्रों ने उसे ‘डी.डी. द मूड़ी’ भी कहते हैं पर इससे उसे कोई आपत्ति नहीं क्योंकि मूड का इस छोर से उस छोर पर झटके से पहुँचते रहना उसे अपनी संवेदनशीलता का लक्षण मालूम होता है.

घरवाले उसे इसी मूड के मारे ‘सुरिया’ (जब जो स्वर साधा तब उसी में अटका रह जानेवाला धती) कहते हैं. घरवालों के नाम पर दूर के चचिया-ममिया-फुफिया-मौसिया रिश्तेदार ही बचे हैं. माँ-बाप दोनों अपने इस इकलौते को दुधमुँहा ही छोड़ गये थे. नायक बाईस साल का है. ढाई वर्ष पहले उसने इलाहाबाद से बी.ए. पास किया.

बाकी किताब में ………

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