UPCOCA : अब अपनी खैर मनाएं यूपी को संगठित अपराध का अड्डा बना देने वाले चूहे

उत्तर प्रदेश में बहुप्रतिक्षित ‘उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण एक्ट (UPCOCA)’ पास हो चुका है.

ये क़ानून उत्तरप्रदेश में बढ़ते संगठित अपराध के ख़ात्मे के उद्देश्य से बनाया गया है.

इसे अभी राष्ट्रपति की सहमति बाक़ी है, लेकिन इसके पास होते ही इसके दुरुपयोग का रोना शुरू हो चुका है.

संगठित अपराध का मतलब होता है कि पावरफुल लोगों जैसे राजनेता, बिज़नस टाईकून और अफ़सरशाही द्वारा कार्टेल बनाकर profit motive से नाना प्रकार के अपराध को अंजाम देना.

जैसे ज़मीन माफ़िया, अवैध खनन माफ़िया, ड्रग्स तस्करी, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति के अड्डे बनाना. लूट के लिए गैंग बनाना. बच्चियों को अगवा करके वेश्यावृत्ति में झोंकना. अवैध ठेका, जुआ का अड्डा, सुपारी किलिंग.

माने वो सारे काले कुकर्म जो पावरफुल लोगों द्वारा नियंत्रित एक काली दुनिया का निर्माण करते हैं. जिसमें बाक़ायदा आपराधिक तत्वों का recruitment होता है, गैंग बनता है.

देश समाज को तबाह कर देने के लिए पंचवर्षीय योजना जैसी योजना चलती है, ऐसे ही अपराध को संगठित अपराध कहते हैं. जैसे मुंबई का अंडरवर्ल्ड जिसके ख़ात्मे के लिए महाराष्ट्र ने कभी मकोका लागू किया था.

ये क़ानून पुलिस को परम शक्तिशाली बना देता है. फिर पुलिस ‘गंगाजल’ या ‘सिंघम’ के मजबूर अजय देवगन जैसी नहीं रहती कि अपराधी को पकड़ लिया और बाद में वो ज़मानत पर रिहा हो गया. फिर पीड़ित पक्ष पर दबाव डालकर और धन बल से सारे गुनाहों से मुक्त हो गया.

इस क़ानून के तहत गिरफ़्तारी काफ़ी सीनियर रैंक के अफ़सर के आदेश पर ही होती है, किसी सिपाही या इन्स्पेक्टर की मनमर्ज़ी इसमें नहीं चलती.

इसके तहत चालान होने पर ज़मानत नहीं होती. पुलिस कस्टडी में दिया गया स्टेटमेंट कोर्ट में मान्य होता है. अभियुक्त ये नहीं कह सकता कि उसपर दबाव बनाकर उससे स्टेटमेंट दिलवाया गया है.

अर्थात एक प्रकार से पुलिस अब Real Time Field Judge की भूमिका में आ जाती है, जो ख़ुद फ़ील्ड में जाकर सत्य व असत्य का निर्णय करती है.

कोर्ट में बैठे जज का कार्य केवल औपचारिक रूप से सज़ा सुनाना हो जाता है, वक़ील भी केवल औपचारिकता की पूर्ति करता है. उसकी कमाई ठप हो जाती. क्योंकि पुलिस उल्टा लटका के पहले ही सारे गुनाह क़ुबूल करा चुकी होती है.

वैसे भी प्यार से या कोर्ट में तर्क-वितर्क से कोई अपराध क़बूल नहीं करता और तारीख़ पर तारीख़ मिलती जाती है. लेकिन ऐसे में केस लटकता नहीं, अपराधी ख़ुद अपना गुनाह क़ुबूल करता है और न्याय बहुत तेज़ होता है.

इसमें तो ये भी प्रावधान है कि यदि आत्मरक्षा में पुलिस ने अपराधी पर गोली चला दी तो कोर्ट पुलिस को तलब नहीं करेगा. इसका मतलब तो समझ ही गए होंगे आप. इसी प्रावधान से अपराधी में पुलिस का असली खौफ़ आ जाता है.

इस क़ानून के बग़ैर वास्तव में पुलिस के पास अपराध नियंत्रण की कोई शक्ति नहीं होती. बिना इस क़ानून के पुलिस उस सर्प जैसी होती है जिसका विष निकाल दिया जाता है और वो मदारी द्वारा केवल शो पीस बनाया गया रहता है.

ऐसा सांप जो बस फुफकारता है, जिससे केवल आम लोग ही डरते हैं, खेले-खाए अपराधी नहीं, क्योंकि उन्हें पता है कि इस सर्प ने उन्हें कई बार डँसा है लेकिन उन्हें कुछ नहीं हुआ. लेकिन इस सर्प को उसका मारक विष मिलते ही अपराधी काँप उठते हैं.

अब बात आती है इस क़ानून के दुरुपयोग की.

मालूम हो साध्वी प्राची और कर्नल पुरोहित भी इसी प्रकार के क़ानून (महाराष्ट्र के मकोका) के वजह से अंदर थे, जिनकी लम्बे समय तक ज़मानत नहीं हो सकी.

उन्हें अनेकों यातनाएँ दी गई, लेकिन वो नहीं टूटे. अंततः आज वो बरी हैं. यानी इसके दुरुपयोग की बात मिथ्या नहीं है. पुलिस का भी ट्रैक रिकॉर्ड बहुत बढ़िया नहीं है.

लेकिन holistic view point लेना होगा. यदि इस क़ानून के बलबूते पुलिस द्वारा दस घटनाएँ दुरुपयोग की हो भी गयी, तो विधानसभा, संसद, मीडिया, कोर्ट ये सब हैं उनसे प्रश्न पूछने को. उन्हें जवाब देना होगा.

लेकिन इसके अभाव में अपराधी जो सिस्टम के कमियों का दुरुपयोग करते हैं, उनकी संख्या इन दस दुरुपयोग की घटनाओं से कई-कई गुना ज़्यादा हैं. आप उनसे प्रश्न नहीं कर सकते.

पुलिस के पास पावर न होने का अर्थ है, अपराधी के पास पावर है. खेतों में फ़सल नुक़सान करने वाले चूहे ज़्यादा हो तो किसान ख़ुद चाहता है कि उनके खेतों में साँप हो, जबकि वो साँप किसान के जान के लिए भी ख़तरा होता है. बिल्कुल ऐसी ही बात यहाँ भी है.

महाराष्ट्र, गुजरात में जब ये क़ानून लागू हुआ, अंडरवर्ल्ड का ख़ात्मा हो गया. कोर्ट, कचहरी, पुलिस को कठपुतली समझने वाले दाऊद गिरोह भारत छोड़ के भाग खड़ा हुआ.

अब ये क़ानून उत्तर प्रदेश में भी लागू होने को है, उत्तर प्रदेश को संगठित अपराध का अड्डा बना देने वाले चूहे बस केवल कुछ और दिन अपनी ख़ैर मनाएँ.

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