विषैला वामपंथ : यह जहाँ दिखाई दे, संघर्ष, अव्यवस्था, अशांति, उपद्रव ज्यादा दूर नहीं

हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री हमेशा वामपंथी रही है. 70 और 80 के दशक में यह प्रभाव सिनेमा के कथानकों में एक सतत थीम था.

80 के समानांतर सिनेमा में आक्रोश, अर्धसत्य, निशांत, पार, पार्टी, मिर्च-मसाला, दामुल जैसी फिल्में जिन्हें कोई नहीं देखता था और जिन्हें बाद में दूरदर्शन पर पब्लिक को परोस कर जीवन दिया गया… वे तो खुलेआम वामपंथी कथानक की फिल्में थीं.

पर मुख्यधारा के सतही कमर्शियल सिनेमा में भी यह प्रभाव स्पष्ट था. हर किसी ने बॉलीवुड मुझसे ज्यादा ही देखा होगा. सभी अपना संकलन बना सकते हैं.

सामान्य रोमांटिक फिल्मों में भी एक लड़के से एक लड़की को प्यार नहीं होता था. एक गरीब, रिक्शा चलाने वाले मेहनती ईमानदार मिथुन चक्रवर्ती से एक अमीर, बेईमान, निर्दयी पूंजीपति की बेटी को प्यार होता था…

[विषैला वामपंथ : बना दो इतने नियम कि ठप हो जाए व्यवस्था]

एक पुलिसवाला एक बेकसूर को नहीं पीटता था… एक ऊंची जाति के जमींदार के कहने पर एक ऊँची जाति का पुलिसवाला एक गरीब ईमानदार नीची जाति के बेकसूर को सताता था…

एक वामपंथी यह वर्ग संघर्ष हमेशा खोज लेता है… जहाँ वर्ग संघर्ष ना दिखे वहाँ वर्ण-संघर्ष खोज लेता है. बल्कि वर्ण-संघर्ष में वर्ग-संघर्ष से ज्यादा संभावनाएं हैं. वर्ग तो बदल सकता है.

संघर्ष करने के बजाय एक व्यक्ति मेहनत और होशियारी से अपना वर्ग बदल सकता है. एक गरीब मजदूर के अमीर पूंजीपति बनने के रास्ते हमेशा खुले हैं… कठिन है, पर संभव है, दूध बेचने वाले धीरूभाई का अम्बानी बन जाना…

पर जिग्नेश मेवानी बनना हमेशा फायदे का काम है. कितना भी पैसा कमा लें, आप हमेशा दलित और पीड़ित ही रहेंगे. आपने अपना नाम ही दलित रख लिया है… आप जेनेरिक विक्टिम हैं.

आप आईएएस बन कर भी विक्टिम रहेंगे, मुख्यमंत्री बन कर भी विक्टिम रहेंगे, राष्ट्रपति बन कर भी विक्टिम ही रहेंगे. आपसे इस विक्टिमहुड के फायदे कोई नहीं छीन सकता.

[विषैला वामपंथ : एक ऐसा विश्व जिसे ईश्वर ने त्याग दिया हो]

यह जेनेरिक विक्टिमहुड की कल्पना वामियों का मास्टरस्ट्रोक है. यह अमीर-गरीब या मजदूर-पूंजीपति के संघर्ष से ज्यादा स्कोप वाला संघर्ष है. इसमें उनकी कहानी का नायक अपनी विक्टिम-आइडेंटिटी से ज्यादा गहरे और अभिन्न तरीके से जुड़ा है.

यह विक्टिम-आइडेंटिटी का विचार और इस आइडेंटिटी से निकलने वाला वर्ग संघर्ष आज के उत्तर-आधुनिक वामपंथ की पहचान है. इनकी दुनिया में हर सामाजिक संपर्क एक संघर्ष है.

इनकी दुनिया में एक कार और एक साईकल में टक्कर नहीं होती… एक पूंजीपति की कार और एक मजदूर की साईकल में टक्कर होती है.

एक सवर्ण की मोटर-साईकल एक दलित के स्कूटर से टकराती है, एक बहुसंख्यक का बच्चा एक अल्पसंख्यक के बेटे को बिना बैटिंग दिए क्रिकेट के मैदान से भगा देता है…

दो कुत्ते भी एक दूसरे पर भौकेंगे तो ये यह देखने से नहीं चूकेंगे कि कैसे एक सवर्ण अमीर पूंजीपति का चिकन मटन खाया हुआ कुत्ता एक गरीब दलित की पाली हुई लेड़ी कुतिया पर भूँक रहा था…

यही दिव्यदृष्टि ही वामपंथ है… यह जहाँ दिखाई दे, संघर्ष, अव्यवस्था, अशांति और उपद्रव ज्यादा दूर नहीं हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY