तुम लूट रहे हो तो हमें भी लूटना है : आरक्षण से बस इतना ही हुआ

जैसा पहले भी लिख चुका हूँ कि प्राचीन भारत में वैद्य (डॉक्टर), न्यायविद (वक़ील), ऋषि-मुनि (प्रोफ़ेसर, नीति निर्माता, विधान निर्माता, दार्शनिक, वैज्ञानिक) आदि लोगों को धन संचय करने की परमिशन नहीं थी.

आजीवन भिक्षा माँगकर जीवन यापन करना होता था. भिक्षा में भी भोजन मात्र, संचय करने योग्य सवर्ण आभूषण नहीं.

न ही उन्हें अथवा उनके परिवार के किसी सदस्य को ब्यापार आदि करने की ही छूट थी. उन्हें योगियों जैसा सतोगुणी जीवन जीना होता था.

शास्त्रों में कहा जाता है कि ऐसा जीवन जीने वाला समय के साथ इस सृष्टि के रहस्य को सहजता से समझ जाता है और केवल ज्ञान व योग के सहारे परमार्थ हेतु ही जीवन व्यतीत करता है.

उसका अपना या अपने परिवार के लिए कोई जीवन नहीं होता. यही उसकी मर्यादा है.

यदि ऐसा न किया जाए और ये वर्ग मर्यादा से बाहर होकर धन संचय अथवा व्यापार आदि करने लगे तो समाज का शोषण शुरू हो जाएगा.

जैसे नीति-निर्माता को यदि धन संचय की छूट हो तो वो नीतियों का निर्माण इस प्रकार करेगा कि समाज का सारा धन स्वतः ही उसकी ओर शिफ़्ट हो जाए, उसकी झोली भरती जाएगी लेकिन समाज में ग़रीबी आती जाएगी.

वैद्य यदि धन संचय को स्वतंत्र होगा तो लालच में रोगों को बढ़ाएगा. वक़ील यदि धन संचय को स्वतंत्र होगा तो न्याय प्रक्रिया को लम्बा कर न्याय में देर करवाता रहेगा.

वैज्ञानिक यदि धन संचय को स्वतंत्र होगा तो ऐसे अविष्कार करेगा जिससे समाज को नुक़सान हो सकता है (जैसा कि आज घटित हो रहा है).

इसीलिए वैदिक समाज में power और money के combination को समाज के लिए deadly combination माना गया. अतः उनकी मर्यादा कठोरतापूर्वक तय की गयी.

इसी मर्यादा को परिभाषित करने का नाम है वर्ण व्यवस्था. ये कोई जाति नहीं अपितु पूर्ण रुपेण मर्यादा है. कर्म प्रधान मर्यादा. कुछ लोग इसे जन्म प्रधान कहते हैं…

यदि ऐसा होता तो ब्राह्मण कुल में जन्में रावण को राक्षस और शूद्र माँ के गर्भ से जन्में वेद व्यास को ब्राह्मण नहीं कहा जाता. ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं.

लेकिन चूँकि ब्राह्मण सहित उसके परिवार को भी कोई अन्य प्रोफ़ेशन में जाने की अनुमति नहीं थी ताकि नीति निर्माता ब्राह्मण व्यापार आदि करने वाले अपने सगे सम्बन्धियों को ख़ुद की पोज़ीशन का लाभ कभी न दे सके, अतः उसकी संतानों को यथा सम्भव प्रयत्न करके ब्राह्मण ही होना होता था.

आनुवंशिकता यहीं से शुरू हुई. लेकिन फिर भी कोई जन्म से ब्राह्मण नहीं हो सकता था, उसे ख़ुद को साबित करना होता था, तभी उसका उपनयन होता था, वरना उसे ब्राह्मण नहीं माना जाता था. अर्थात आनुवंशिक होते हुए भी प्रधानता तो कर्म की ही थी.

ब्राह्मण वर्ण की मर्यादा कठोर व त्यागपूर्ण थी अतः जिसका जितना बड़ा त्याग, उसे उतना ही सम्मान एवं समाज में उतना ही ऊँचा स्थान. फिर भी अन्य वर्ण उस स्थान को पाने के लिए उसी प्रकार लालायित नहीं होते थे जिस प्रकार गौरव व सम्मान होने के बावजूद आज कोई सेना में जाने को लालायित नहीं होता, क्योंकि ये बलिदान माँगता है. ये करियर नहीं है. इसीलिए यहाँ कोई आरक्षण की माँग नहीं करता.

समय के साथ वर्ण की मर्यादा क्षीण होती गई. ब्राह्मण अपने वर्णधर्म से भ्रष्ट होता गया और उसने धन संचय, व्यापार आदि करना शुरू किया जिससे समाज में असंतुलन उत्पन्न होता गया और रोष ने जन्म लेना शुरू किया.

विरोध होने पर उसने अपनी सत्ता की सुरक्षा हेतु अंधविश्वास के बीज बोए, भेदभाव पूर्ण नियम बना डाले. जातिगत भेदभाव यहीं से जन्मा. अर्थात जातिवाद तब जन्मा जब वर्ण व्यवस्था नष्ट हुई.

उसके बाद नए युग की शुरूवात हुई जब डॉक्टर, वक़ील, प्रोफ़ेसर, नीतिनिर्माता, विधान निर्माता का कार्य, दार्शनिक, वैज्ञानिक ये सारे ही प्रोफ़ेशन व्यापार में तब्दील हो गये, इसे करियर कहा जाने लगा, और तब से इसे पाने के लिए लड़ाई होने लगी. आरक्षण की माँग होने लगी.

बाबा साहब अम्बेडकर देश के संविधान निर्माता कहे जाते हैं. लेकिन यदि तत्कालीन परिस्थितियों के जातिगत भेदभाव को भ्रमपूर्वक वर्णव्यवस्था समझने की भूल करने वाले और इस भूल से करोड़ों लोगों में भ्रम फैलाने वाले अम्बेडकर बजाए आरक्षण के, संविधान में ये clause डाल देते कि अब नए भारत में डॉक्टर, वक़ील, प्रोफ़ेसर, नीतिनिर्माता, विधान निर्माता का कार्य, दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि सारे प्रोफ़ेशन बिना किसी धन की लालसा के सम्पादित होंगे.

सिविल सेवक आर्मी रूट से ही आएगा. ऐसे लोगों को या उनके परिवार के किसी सदस्य को धन संचय करने की छूट नहीं होगी. माने पावरफुल पोस्ट पर मलाई नहीं होगी. जिन्हें ये सम्मान प्राप्त करना हो वो त्याग करके उसे प्राप्त करें. माने संविधान के माध्यम से वर्ण की मर्यादा पुनः लागू कर दी जाती…

हालाँकि ये बात आज अव्यवहारिक व कठोर लग सकती हैं, लेकिन कल्पना कीजिए कि यदि ऐसा हो जाता तो आज जो आर्थिक असंतुलन बना है, कभी न बनता. शोषित व वंचित होने का रोना आज कोई न रोता.

आरक्षण से बस इतना हुआ है कि तुम लूट रहे हो तो हमें भी लूटना है क्योंकि तुमने हमें पहले कभी लूटा है. ये न कभी समाधान था और न ही कभी हो सकेगा.

दिक़्क़त ये है कि वर्ण व्यवस्था के बारे में बहुत बड़ा भ्रम विद्यमान है. (हालाँकि कुछ पोंगे पंडित भी इसके लिए उत्तरदायी हैं) इसे जातिवाद का मूल कारण माना जाता है, जबकि बात इसके विपरीत है.

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