वे औरतें समय में घुल गई हैं

एक समय बहुत से घर थे मेरे
हर जगह पीढ़ा था हर जगह बिछौना
कहीं भी खा लेता कहीं भी सो जाता
घट्टी पीसती औरतों की बातचीत के बीच
किसी की गोद में सिर रखे-रखे ऊँघ जाता
माँ भेजती बहन को मुझे ढूँढने के लिए
जो मुझे जगाए बगैर उठा कर ले आती

वे तमाम औरतें जो जाड़े में धूप ढूँढती रहतीं
जिसमें बैठ उन्हें भाजी तोड़नी होती थी
वे जो आपस में लड़तीं एक-दूजे के लिए अशुभ उचारतीं
और एक-दूसरे के दुख में रोती थीं

जो गाय और कुत्ते के लिए रोटी निकालती थीं
और नहा कर शंकर जी पर जल चढ़ाती थीं
औरतें जो बेझिझक एक कटोरी शक्कर एक-दूसरे से माँग लेती थीं

जो मिल बन्द हो जाने से बेकार हो गए
अपने पतियों को समेट कर आदमी बनाए रखती थीं
जिनके पल्लू में गुड़ीमुड़ी छोटे नोट और खुल्ले पैसे बँधे होते थे

जो सब्जी वाले की नाक में दम कर देती थीं
जो पढी-लिखी नहीं थीं मगर जिन्हें कोई ठग नहीं सकता था
जो अपनी सीधे पल्ले की साड़ी का आँचल सिर से खिसकने नहीं देती थीं
और जाड़े में उसी से नाक-मुँह ढँक लेने की जुगत करती थीं

जो मजदूरी करने जाती थीं
जो घर पर ही पापड़-अगरबत्ती बना कर अपना श्रम बेचती थीं
जो लीलावती और कलावती के सुख-दुख में डूबती-उतरती थीं

जिनको राजनीति के बारे में सिवा इसके कुछ पता नहीं था
कि देश में इन्द्रा गांधी का राज है
जो संतोषी माता का व्रत रखतीं थीं
खटाई से डरतीं और उद्यापन में चने की सब्जी बनाती थीं
जो शादियों में लम्बा घूँघट करके नाचतीं तो ढोली को थका देती थीं
जिनके पास अनंत कथाएँ थीं गीत थे और उतने ही दुख
लेकिन जिन्हें कभी पस्त देखा नहीं गया

नींद टूट गई है और जागने पर दिखता है
अब कहीं और जागा हूँ

वे घर अब कहीं नहीं हैं जिनमें पनाह थी
वे औरतें समय में घुल गई हैं
जो किसी शौर्य चक्र के बगैर भी जूझती रहीं लगातार
घट्टी के पाटों की रगड़ से रचती रहीं अपना जीवन संगीत

जिसे उनकी बातों के साथ सुनते सुनते
उन्हीं में से किसी की गोद में
न जाने कब आँख लगती रही उस छोटे से लड़के की

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