संगठित सामुदायिक हिंसा : मोदी सरकार की नाकामी और इससे निपटने के उपाय

कभी यह आग मालदा में लगी थी, कभी गुजरात में पटेल आरक्षण के रूप में, कभी हरियाणा में जाट आरक्षण के लिए, कभी राजस्थान में किसी दलित के विरुद्ध हिंसा के नाम पर, तो अब पुणे में… पैटर्न साफ है.

संगठित सामुदायिक हिंसा मोदी सरकार की सबसे कमजोर नाड़ी है. इससे निबटने में वे अब तक हमेशा नाकाम रहे हैं.

पैटर्न है, इसके आरंभिक क्षणों में पनप रहे खतरों को पहचानने में और उसे फैलने से रोकने में असफलता, इसके फैलने के बाद इसे संभालने और डैमेज कंट्रोल में असफलता, और एक बड़ी घटना होने के बाद उसके दोषियों पर करवाई करने में नरमी…

पिछले साढ़े तीन वर्षों में मोदी ने इस विषय पर कुछ नहीं सीखा… कुछ सीखने की क्षमता या इच्छा-शक्ति भी कहीं दिखाई नहीं देती है.

मूल पोस्ट 2015 की है. चार वर्षों में शायद पाँचवीं बार पोस्ट कर रहा हूँ.

भारत में ऐसे सैकड़ों मालदा हैं, जहाँ से दुश्मन हमारे ऊपर अंदर से हमले कर सकता है. और अगली बार वह सिर्फ पुलिस थाने और गाड़ियों पर हमले नहीं करेगा. वही करेगा जो विभाजन के समय पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब में किया था, कश्मीर में किया, या खिलाफत के समय मोपलाओं ने मलाबार में किया था.

हिन्दू सामान्यत: ना तो उतना हिंसक है, ना ही संगठित. यह मैच बराबरी का नहीं है. हम अपनी सुरक्षा के लिए अपनी सरकारों पर आश्रित हैं.

और हमारे देश में ऐसी राज्य सरकारें हैं जो पूरी तरह से मुसलमानों के हाथ में हैं. बंगाल, बिहार या उत्तर प्रदेश की सरकारों को दो-एक लाख हिन्दुओं के मरने या बेइज्जत होने की परवाह नहीं होने वाली.

ऐसे में केन्द्र सरकार के पास क्या तंत्र है कि वे राज्यों में होने वाली ऐसी संगठित हिंसा से हिन्दुओं की रक्षा कर सकें?

मेरा सुझाव है – एक केन्द्रीय संगठन बनाया जाए जो NSA के अधीन काम करे. जिसके अंदर पूरे देश में संवेदनशील इलाकों की निगरानी के लिए Zonal Alert Nodes बनाए जाएँ. इनमें चुनकर विश्वसनीय लोग नोडल ऑफिसर बनाए जाएँ.

ये किसी भी गड़बड़ी की सूचना मिलते ही सीधा National Security Advisor को रिपोर्ट करें, और NSA के पास केन्द्रीय पुलिस बल हों जो तुरत केन्द्रीय गृह मंत्रालय की आज्ञा से उस क्षेत्र का प्रशासन अपने अधीन ले लें.

इस संगठन के पास AFSPA की तर्ज पर विशेषाधिकार हों, जरूरत पड़ने पर भीड़ पर गोली चलाने के अधिकार हों, मीडिया के प्रवेश को प्रतिबंधित करने के अधिकार हों.

कुल मिला कर इसे युद्ध की स्थिति मान कर निबटने के अधिकार हों और जरूरत होने पर निकटतम सैनिक छावनी से मदद माँगने के अधिकार हों.

साथ ही पाँच या दस हजार से ज्यादा लोगों के एकत्र होने वाले आयोजनों के लिए प्रशासन से पूर्व अनुमति आवश्यक हो, एवं शांति-व्यवस्था के लिए आयोजकों की criminal liability तय की जाए.

यह करने के लिए विशेष कानून या तात्कालिक रूप से अध्यादेश की आवश्यकता पड़ेगी. साथ ही इस कदम के विरोध में शोर मचाने वाली मीडिया से निबटने की भी तैयारी की जरूरत होगी.

इसलिए इस तरह के कदम के पक्ष में जनमानस पहले तैयार होना जरूरी है. जिन मित्रों को यह व्यवस्था प्रभावी और प्रैक्टिकल लगे, इस सुझाव को केन्द्र सरकार के पास पहुँचाने में मेरी मदद करें, साथ ही फेसबुक या व्हाट्सऐप पर फैलाकर इस माँग के पक्ष में जनमत बनाने में भी मदद करें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY